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Friday, February 14, 2014

एक और मिथक को भेदकर निकला सच

- सुरेश पंडित

मिथक रचना और उन्हें धर्म के साँचे में ढालकर अतिमानवीय स्थिति तक पहुंचाना तथा उनसे जुड़ी घटनाओं को पराभौतिक गतिविधियों के रूप में पेश करना संभवत: प्रत्येक धर्माधिकारी, पंडों, पुरोहितों की मजबूरी रहा है क्योंकि इसी विधि से वे सामान्य जन के विवेक को अपनी गिरफ्त में रखते हुए अपने व्यावसायिक हित साधते रह सकते हैं। उनके  आस्तित्त्व पर सवाल उठाना तथा उनके क्रियाकलाप की आलोचना करना व्यक्ति को धर्मद्रोही बना सकता है। यही वह डर है जो अनादिकाल से धर्म के हर अविश्वसनीय पहलू को यथावत् बनाये रखने में सफल हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि संख्या या मात्रा में चाहे जितना कम हो इस तरह के पाखंडी कर्मकांडों के विरुद्ध विवेक शील लोगों की आवाजें भी समय समय पर उठती रही हैं और उन्हें जन समर्थन भी मिलता रहा है। ज्योति राव फुले, पेरियार और अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के अनेकों मिथकों को बेदर्दी से चीर फाडक़र उनमें अन्तर्निहित सचाइयों को बेनकाब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उसी परम्परा में प्रेम कुमार मणि और राजेन्द्र यादव का नाम भी रखा जा सकता है। यादव तो बार बार यह कहते रहे हैं कि हिन्दू धर्म का सबसे अधिक नुकसान गंगा और रामायण ने किया है। सारी दुनिया की गन्दगी अपने में समेटकर बहती गंगा आज भी परम पवित्र, पतित पावनी बनी हुई है और पाप के पंक में डूबे लोगों को साफ, शुद्ध कर उन्हें मृत्यु उपरान्त मोक्ष दिलाने की गारंटी भी दे रही है। इसी तरह उस  रामायण की सर्वश्रेष्ठता भी अक्षुण्ण बनी हुई है जिसके द्वारा रची गई धर्मसत्ता व राजसत्ता के आदर्श और मर्यादा की मानसिकता सदा प्रश्नों, शंकाओं से घिरी रही है। हिन्दी के प्रमुख विचारक प्रेमकुमार मणि ने महिषासुर मर्दिनी दुर्गा की सचाई की खोज करते हुए लगभग एक दशक पहले जो लेख लिखा था वह पहले पटना के दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में फिर ‘जन विकल्प’ में और उसके बाद अक्टूबर 2011 में ‘फारवर्ड प्रेस’ मासिक में छपा था। उसी लेख पर कुछ बुद्धिजीवियों और जे एन यू के छात्रों की नजर पड़ी और उन्होंने इसका एक पोस्टर यूनिवर्सिटी में लगाया। उसमें दुर्गा को महिषासुर पर किये गये अत्याचार और नृशंस हत्या का अपराधी घोषित किया गया था। इस पर सवर्ण छात्रों की हिंसक प्रतिक्रिया हुई। लेकिन महिषासुर के पक्ष में खड़ा किया गया वह आन्दोलन अभी थमा नहीं है। उसी के बारे में विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित नौ लेेखों का संग्रह ‘महिषासुर: एक पुनर्पाठ’ नामक पुस्तक के रूप में प्रमोद रंजन ने संपादित किया है

इस पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि आखिर महिषासुर नाम से शुरू किया गया यह आन्दोलन है क्या? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके निहितार्थ क्या हैं और हम इस आन्दोलन को किस नजरिये से देखें? संपादक का मानना है कि इस आन्दोलन की महत्ता इसी में है कि यह हिन्दू धर्म की जीवन-शक्ति पर गहरी चोट करने की क्षमता रखता है। जैसे जैसे यह प्रभावी व व्यापक होता जायेगा हिन्दू धर्म द्वारा उत्पीडि़त अन्य हाशियागत सामाजिक समूह भी धर्म ग्रन्थों के पाठों का विखंडन शुरू करेंगे और अपने पाठ निर्मित करेंगे। इन पाठों के स्वर जितने तीव्र और उग्र होंगे बहुजनों की सांस्कृतिक गुलामी के बंधन उतनी ही शीघ्रता से टूटेंगे।

इस आन्दोलन के बीज प्रेम कुमार मणि के अनुसार देवासुर संग्राम में देखे जा सकते हैं। वह दरअसल द्रविड़ और आर्यों का ही संग्राम था। आर्यों का नेता इन्द्र था जो उस समय शक्ति का केन्द्र माना जाता था। आर्यों का समाज पुरुष प्रधान था इसीलिये वे मातृभूमि की जगह पितृभूमि का नमन करते थे। उन्होंने अपने समाज के विस्तार के लिये पूरब अर्थात् बंगाल और असम से अपना तालमेल बढ़ाया। वह समाज मातृ सत्तात्मक था इसलिये आर्यों ने शक्ति के रूप में दुर्गा को भी अपनी देवी मान लिया। आज भी उत्तर भारत के अधिकतर हिन्दू जिन राम, कृष्ण, शिव, हनुमान आदि देवताओं की पूजा करते हैं वे पौरुष के प्रतीक हैं। लेकिन देवी के रूप में दुर्गा काली भी अब उन्हें मान्य हो गई है। दुर्गा को स्री शक्ति का प्रतीक बनाने के लिये ही महिषासुर की कल्पना की गई और उसे इस रूप में चित्रित किया गया जिससे वह समाज का शत्रु दिखाई दे और देवी दुर्गा उसका संहार कर धर्मानुयायियों के लिये पूज्य बन जाये। लेकिन मणि के अनुसार इस कथा का शुद्ध पाठ कुछ और तरह का है-महिष अर्थात् भैंस, महिषासुर अर्थात् महिष का असुर। असुर का मतलब जो सुर नहीं है। सुर का अर्थ देवता अर्थात् वे लोग जो कोई काम नहीं करते। परजीवी होते हैं। इसके अनुसार असुर वे हुए जो काम करके पेट भरते हैं। इस तरह महिषासुर का अर्थ होता है भैंस को पालकर धन्धा करने वाले=ग्वाले=अहीर। ये भैंस पालक अहीर बंगदेश में वर्चस्व प्राप्त लोग थे और द्रविड़ थे इसलिये आर्य संस्कृति के विरोधी थे। आर्यों ने इन्हें पराजित करने के लिये दुर्गा का अनुसंधान किया। बंगदेश में वेश्यायें दुर्गा को अपने कुल का मानती थी इसीलिये आज भी दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिये वेश्याओं के घर से थोड़ी सी मिट्टी जरूर लाई/मंगाई जाती है। भैंस पालकों के नायक या सामन्त की हत्या करने में दुर्गा को नौ दिन लगे। इसी की याद में नवरात्र मनाये जाते हैं। इस तरह एक पशुपालक समुदाय के नायक का वध करने वाली दुर्गा को शक्ति की देवी की प्रतिष्ठा मिली है। यह कैसा संयोग है कि विजयादशमी का पर्व दुर्गा को महिषासुर से हुए युद्ध में मिली विजय की स्मृति में तो मनाया जाता ही है राम के रावण पर विजय पाने की याद में भी मनाया जाता है।

लेखक और नाटककार अश्विनी कुमार पंकज तो यह सगर्व घोषणा करते हैं कि वे महाप्रतापी महिषासुर के वंशज हैं इसलिये विजयादशमी या दशहरा उनके लिये खुशियां मनाने का दिन नहीं है। वे कहते हैं कि सदियों से असुरों का वध किये जाते रहने के बावजूद आज भी झारखण्ड और छत्तीसगढ के कुछ इलाकों में असुरों का अस्तित्त्व बना हुआ है। लेकिन वे असुर किसी भी कोण से देखने पर राक्षस जैसे दिखाई नहीं देते। भारत सरकार ने इन्हें आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा है। अभी तक वे विकास के हाशिये पर हैं। 1981 की जनगणना के अनुसार उनकी कुल जनसंख्या 9100 थी जो वर्ष 2003 में घटकर 7793 रह गई जबकि आज की तारीख में छत्तीसगढ़ में उनकी कुल संख्या 301 मात्र है। कारपोरेट निगम जिस धरती पर ये असुर विचरते हैं उसके नीचे से बॉक्साइट निकालने को उतावले हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के निवासी अगरियां जाति के लोगों को भी को भी वैरियर आल्विन ने असुरों की श्रेणी में दिखाया है। जलपाईगुड़ी जिले के अलीपुर द्वार स्टेशन के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाले दहारू असुर कहते हैं कि महिषासुर दोनों लोकों अर्थात् स्वर्ग और पृथ्वी पर सबसे अधिक शक्तिशाली थे। देवताओं को लगता था कि जब तक ये जीवित रहेंगे उनको महत्त्व नहीं मिलेगा। इसीलिये उन्होंने दुर्गा के नेतृत्त्व में महिषासुर को ही नहीं उनके सहचरों को भी मार डाला और उनके गले काटकर एक मुंडमाला बनाई और दुर्गा को पहना दी। चित्रों में दुर्गा को महिषासुर की छाती पर चढ़े रौद्र रूप में ही दिखलाया जाता है।

अधिकतर आदिवासी रावण को भी अपना पूर्वज मानते हैं। दक्षिण के अनेक द्रविड़ समुदायों में रावण का पूजन आज भी किया जाता है। झारखण्ड और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में तो बाकायदा नवरात्र अर्थात् दशहरे पर रावणोत्सव मनाया जाता है। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन आज भी रावण को अपना कुल गुरू मानते हैं।

‘इन्डिया टुडे’ हिन्दी के संपादक दिलीप मंडल  इसी प्रसंग में यह सवाल उठाते हैं कि क्या धार्मिक ग्रन्थों की वैकल्पिक व्याख्या नहीं की जा सकती? सचाई यह है कि इसी पद्धति से उनमें वर्णित चरित्रों और घटनाओं के नये नये पहलू सामने आ सकते हैं और इससे वैज्ञानिक चिन्तन को बढ़ावा मिल सकता है। प्राचीन काल में शास्त्रों की व्याख्याओं को लेकर जो शास्त्रार्थ होते थे उन्होंने ही हिन्दू धर्म के अनेकों मतों, पन्थों, समुदायों और विचार परम्पराओं को जन्म दिया था। लेकिन जैसे जैसे समाज ज्ञान और विज्ञान से अधिक समृद्ध होता गया है लोगों की मानसिकता संकीर्ण होती गई है। उन्हें जो पाठ जिस तरह समझाया गया है वे उसी रूप में उसे अपनाना चाहते हैं। न स्वयं कोई नवीन चिन्तन करते हैं तथा न दूसरों के नये विचारों को अपनाने के लिये अपने मस्तिष्क के खिडक़ी दरवाजे खोलते हैं। वास्तव में पुनर्पाठ की प्रक्रिया तो लोकतांत्रिक विचार पद्धति को जीवन्त रखती है और उसे समृद्ध बनाती है। वे इस प्रसंग में फुले की कालजयी कृति ‘गुलाम गीरी’ और अम्बेडकर की ‘रिडल्ज आफ हिन्दूइज्म’ के उदाहरण सामने रखते है। फुले के अनुसार हिन्दुओं के धर्म ग्रन्थ ब्राह्मण पुरोहितों ने अपने हितों के संरक्षण के लिये निर्मित किये हैं और उन पर नई व्याख्याओं का इसलिये वे विरोध करते हैं ताकि समाज पर उनकी पकड़ बदस्तूर बनी रहें।

जे एन यू में आल इन्डिया बैकवर्ड स्टूडेन्ट्स फोरम द्वारा वर्ष 2011 में महिषासुर शहादत दिवस मनाने से देशभर में  एक नई बहस शुरू हुई। पूरी निर्भीकता के साथ अब यह प्रश्न किया जाने लगा है कि यदि दुर्गा इतनी बलशालिनी थी तो उसने गोरी, गजनी, बाबर, हिटलर जैसे लोगों का वध क्यों नहीं किया? जिस महिषासुर को एक ऐसे नृशंस राक्षस के रूप में चित्रित किया गया है जो लोगों को भयभीत व आतंकित करने वाला था वह वास्तव में इसी देश का सामान्य नागरिक था जो स्वभाव से हिंसा विरोधी और प्रकृति पूजक था। उसे असुर बताकर मारा गया। जबकि स्वयं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कष्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र ने जनवरी 2011 में अपने एक निर्णय मे कहा था- ‘राक्षस और असुर कहे जाने वाले लोग ही इस देश के मूल नागरिक हैं।’ अन्य विद्वानों का भी मत है कि असुर आर्यों से श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे सुरा-शराब का सेवन नहीं करते। ब्राह्मणवादी ग्रन्थों के अनुसार यज्ञ विरोधी महिषासुर के पिता रंभासुर असुरों के राजा थे तथा उनकी माँ का नाम श्यामला राजकुमारी था। इस देश के मूल निवासी जिन्हें आर्यों ने साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी की सभ्यता को नष्ट कर हजारों वर्ष चले युद्ध में छल, कपट से परास्त कर असुर, अछूत, शुद्र, राक्षस आदि बनाकर समााजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर एवं गुलाम बना लिया था उनके नायकों की हत्या कर उन्हें असुर व राक्षस घोषित कर दिया गया। कहा जाता है कि महिषासुर इतना पराक्रमी राजा था कि उसने देवताओं के राजा इन्द्र को भी युद्ध में परास्त कर दिया था, ऐसे राजा का वध करवाने के लिये देवताओं ने दुर्गा को भेज कर इस काम को सम्पन्न करवाया था। उधर लेखक जितेन्द्र यादव का कहना है कि पिछड़ी जाति बहुल उनके गांव में महिषासुर जैसी कद-काठी के तो कई व्यक्ति आज भी देखने को मिल जाते हैं पर दुर्गा जैसी कोई महिला कभी दिखाई नहीं दी है। ये जितेन्द्र यादव वही महानुभाव हैं जिन्हें जे एन यू के प्रशासन ने ‘महिषासुर का सच’ पर विमर्श के लिये परिसर में गोष्ठी आयोजित करने और पोस्टर लगा कर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में नोटिस थमाया था और बाद में देशभर के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बढ़ते विरोध प्रदर्शन के कारण क्षमा याचना करते हुए वह नोटिस वापिस ले लिया था। 2011 से यह आन्दोलन चालू है और सन् 2013 में देश के लगभग 60 नगरों में इसका आयोजन हुआ है जो इसको मान्यता मिलते जाने का प्रमाण है।

दरअसल इतिहास का कथ्य किसी ऐसे सत्य को प्रकट नहीं करता जिस पर पुनर्विचार किया ही नहीं जा सकता। हर पीढी अपने अर्जित ज्ञान और संचित अनुभवों के आधार पर अपना इतिहास निर्मित करती है। इस प्रक्रिया में अक्सर पूर्व में प्रतिष्ठित नायक खलनायक बन जाते हैं और खलनायक सम्मान के पात्र। जिन असुरों व राक्षसों को मानवता के शत्रु के रूप में निन्दनीय बनाया जाता है वे देश के मूल निवासी के रूप में सामने आते हैं और अपनी पहचान स्थापित करने के लिये अपनी गाथा स्वयं लिखने को तत्पर हो जाते हैं। महिषासुर की एक अमर शहीद के रूप में प्रतिष्ठा आदिवासी संस्कृति के पुनरोदय का परिचायक है। हो सकता है प्रचलित इतिहास के उत्खनन से ऐसे और महानायक सामने आयें जो मनुवादी पूर्वाग्रहों के शिकार हुए हों इसलिये उन्हें अब तक ध्यान देने योग्य समझा ही नहीं गया हो।

संपर्क : सुरेश पंडित 383 स्कीम नं. 2, लाजपत नगर, अलवर - 301001, मो. 8058725639

पुस्तक का नाम :  महिषासुर : एक पुनर्पाठ,
संपादक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : आल इन्डिया बैकवर्ड स्टूडेन्ट्स फोरम, जे एन यू, नई दिल्ली
मूल्य :  30 रुपये

Wednesday, January 22, 2014

Mahishasur : The need for reinterpretation



A booklet ‘Kiski Puja Kar Rahe Hain Bahujan? Mahishasur: Ek Punarpath’ (Whom are the Bahujans worshipping? Mahishahur: a reinterpretation), published by Baliraja Cultural Movement, is before me. In about two hours, I am done with the around 40 pages of the booklet, but it has already altered many of my established notions. Edited by Pramod Ranjan, advisory editor of FORWARD Press, the booklet was released on 17 October, 2013, at a function organized by Backward Students Forum to observe Mahishasur martyrdom day at Delhi’s prestigious Jawaharlal Nehru University. The booklet contains articles by seven prominent writers, journalists and researchers including Prem Kumar Mani, Ashwini Kumar Pankaj and Dileep Mandal, managing editor of Hindi India Today. Most of these articles were published in the FORWARD Press magazine. In fact, it was the articles published in the magazine that brought this discourse into public domain in the Hindi belt.
After I read this booklet, in the evening, the TV channels carried the stomach-churning details of how North Korean dictator Kim Jong-un served his uncle and his six aides to 120 wild dogs, who were starved for three days. In about an hour, the dogs devoured the men. Nothing was left.  From balconies around the huge cage, the viewers of the horrendous scene, including Kim Jong-un, clapped. Similar was the scene of the US hanging Saddam Hussein. These victors declared that the  persons killed were barbarians, cruel, and inhuman. This was the victor’s justice for the vanquished.
This was exactly how Mahishasur was treated. Over the centuries, his image has been grossly distorted so as to justify the killing of the great king. The Aryans (Surs who drank liquor and sacrificed their cattle in the name of yagnas and consumed the meat) declared themselves gods and branded the original inhabitants of Bang Pradesh Asurs (demons). Mahishasur was the powerful and justice-loving ruler of these Asurs (Non-Aryans). The Aryans were notorious for looting the forests, subterranean wealth and flora and fauna of the non-Aryans and of sacrificing their milch cows in Havans. To put a stop to this depredation, Mahishasur and his non-Aryan subjects fought with and defeated Indra’s Aryan army so many times that its backbone was broken. An exasperated Indra, then, sought Vishnu’s intervention, who entrusted the enticing Durga with the responsibility of killing Mahishasur.
These victors have prescribed animal sacrifice as part of the rituals to worship Durga. They argue that the sacrificial animal is meant for the tiger, which Durga rides on. They call themselves as vegetarians so as to reserve the right to malign the Asurs by branding them meat-eaters.
To a great extent, this booklet presents the reinterpretation of the legend of Mahishasur and Durga but there is a need for a deeper and more extensive research on this issue, which will reveal some hidden truths – truths that will be impossible for the ‘Arya Putras’ (Descendants of Aryans) of today to deny.
Meanwhile, I have bought a book called ‘Durga Saptashati’ from a shop selling religious literature. It is published by Randhir Book Sales, Haridwar. Though the book tells the tale from the perspective of the Surs yet, it reveals the character of the Surs and the deceit employed to kill Mahishasur. “In ancient times, the war between Gods-Goddesses and demons raged for a full hundred years. At that time, the master of the demons was Mahishasur while the king of the Gods was Indra. In this war, the army of the Gods lost to the demons and Mahishasur, by defeating all Gods, became Indra. In the end, all the Gods, led by Brahmaji, reached the place where Vishnu and Shankar were seated. There the Gods related the tale of the depredations of Mahishasur and their own downfall. They said that Mahishasur had deprived Surya, Agni, Yam, Varun and all other Gods of their powers and he had become their master. He had driven the Gods out of heaven. Mahishasur is an evil soul. The Gods have been forced to dwell on earth like mortals. Do something to get Mahishasur killed. When Madhusudan (Vishnu) and Mahadev ji heard all this, they became furious”. Then they sent Durga to kill Mahishasur. During the battle between the two “Devi ji, using her arrows, blew up the mountains hurled at her by Mahishasur to smithereens. Then Chandikaji whose eyes were reddish due to consumption of liquor, said in a spluttering voice, ‘Oh fool. Till I drink Madhu, you can roar for a while. After I have killed you in the battleground, it is the Gods who will roar”. Despite this threat, the demon did not give up the battle. “Then Deviji severed his head with her sharp sword. His head fell on the ground. The Gods were overjoyed. They  offered prayers along with celestial Maharishis. Gandharvas began singing and Apsaras began dancing”. Be that as it may, the Devi’s ‘Surapan’ (drinking of liquor) in itself gives rise to many speculations.
The story has many subtexts, which cannot be dealt with in a small piece; these need extensive research. The hidden meanings and the asides in the story can be construed as a comment on the current Indian politics as well. If Indra was the prime minister then who were Vishnu, Shiva, etc before whom Gandharvas sang and Apsaras danced? Can it be linked with the state of Backwards, Dalits, women and the deprived in today’s India? Can it be linked with how tribals are being driven out from their lands and their forests in the name of Naxalism? What all a reinterpretation and study of this story will reveal can well be imagined. Now, the Aryans coming from the West do not even need armies. Their capital is enough to drive out the non-Aryans and the rulers of our country are already the slaves of that capital.
As for now, I wish any Backward-Dalit scholar comes forward to launch an extensive research by placing the tragedy of tribals, especially Asur tribe, as described in Ranendra’s much-talked-about novel ‘Global Gaon Ke Devta’ (Gods of Global Village), in the context of this story. Mahishasur has thrown down the gauntlet.        

           
Editor :  Pramod Ranjan

Publisher :  Baliraja Cultural movement, P-22, South Ex-2, New Delhi – 110049
                        Tel: 011-26250778

Price :   Rs 30

 
( Book review published in Forward Press, February, 2014)

Saturday, May 18, 2013

Dalits – Hindu or Muslim – are non-existent in Bihar Media: Study

By Kashif-ul-Huda, TwoCircles.net,

A survey by media researchers has revealed that Dalit Hindus are only 1% in Bihari media. But senior journalists and editors are all upper caste Hindus.
Study conducted by Pramod Ranjan and published in a book, ‘Partnership in Media’- a study of Media in Bihar, looked at the caste affiliation of all journalists who occupy positions of influence in their respective organizations. Caste background of editors, news editors, bureau chiefs, senior journalists of Bihari media and media organizations with a presence in Bihar was documented for this study. They looked at journalists working in Hindi and English print publications and Hindi and English electronic media, a total of 78 journalsits working in 42 media organizations based in Patna. They found that almost all journalists with editorial influence in Hindi and English newspapers and electronic media are upper caste Hindu males.
Upper caste Hindus
OBCs
Ashraf Muslims
Dalit Muslims
Dalit Hindus
Hindi Print
87%
9%
1%
0%
3%
English Print
75%
19%
4%
0%
0%
Urdu Print
8%
66%
26%
0%
Electronic
90%
7%
3%
0%
0%
Total
73%
10%
12%
4%
1%
When Urdu newspapers were included and all journalists were considered i.e. 230 journalists in 47 media organizations, situation was only a bit better.
For all combined, upper caste Hindus are 73% in these 47 organizations. OBCs occupy 10%, Ashraf Muslims are 12% and Dalit or Pasmanda Muslims are 4%. Dalit Hindus are only 1% of the total jobs and that too all of them are in Hindi print journalism.
Dalit Musilms’ high number is because of their higher representation in Urdu newspapers. Three of the five Urdu newspapers published from Patna- Sangam, Pindar, and Farooqi Tanzeem are owned by Dalit Musilms and this gives the skewed figures for them otherwise they are not in Hindi, English, and electronic Media.
Ashraf Muslims are 1% in Hindi, 4% in English and 3% in electronic media. Muslim women are nowhere to be found in any media organization. Even Urdu newspapers have not given them position of influence.
Talking to TwoCircles.net, Pramod Ranjan, author of the study said that Dalits and OBCs exist in media structure but at a lower level and even there it is not proportional to their share in the population. He said that these marginalized people exist overwhelmingly in labour jobs e.g. machine operators, computer operators, news hawkers, etc.
Though a majority of Urdu newspapers are owned by Dalit and they seem to have more editorial control but still Ranjan laments that their coverage of issues is not much different than Qaumi Tanzeem and Roznama Rashtriya Sahara- the other two Urdu dailies.
Another interesting data is that there are 19% OBCs in English print but only 9% in Hindi print publications. Electronic media and English print is also better for women where they are 7% and 10% of total jobs, respectively.
The survey was conducted in June 2009 and looked at only those journalists who are directly associated with main news department. Journalisst doing sports, features etc. were not included in this survey. For bigger publications only 20 journalists starting from top most positions were included in this survey and all journalists from smaller publications.

http://twocircles.net/node/161932

Sunday, May 05, 2013

किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन?


- प्रेमकुमार मणि 
क्ति के विविध रूपों, यथा योग्यता, बल, पराक्रम, सामर्थ्‍य व ऊर्जा की पूजा सभ्यता के आदिकालों से होती रही है। न केवल भारत में बल्कि दुनिया के तमाम इलाकों में। दुनिया की पूरी मिथॉलॉजी के प्रतीक देवी-देवताओं के तानों-बानों से ही बुनी गयी है। आज भी शक्ति का महत्व निर्विवाद है। अमेरिका की दादागीरी पूरी दुनिया में चल रही है, तो इसलिए कि उसके पास सबसे अधिक सामरिक शक्ति और संपदा है। जिसके पास एटम बम नहीं हैं, उसकी बात कोई नहीं सुनता, उसकी आवाज का कोई मूल्य नहीं है। गीता उसकी सुनी जाती है, जिसके हाथ में सुदर्शन हो। उसी की धौंस का मतलब है और उसी की विनम्रता का भी। कवि दिनकर ने लिखा है: ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।’
दंतहीन और विषहीन सांप सभ्यता का स्वांग भी नहीं कर सकता। उसकी विनम्रता, उसका क्षमाभाव अर्थहीन हैं। बुद्ध ने कहा है – जो कमजोर है, वह ठीक रास्ते पर नहीं चल सकता। उनकी अहिसंक सभ्यता में भी फुफकारने की छूट मिली हुई थी। जातक में एक कथा में एक उत्पाती सांप के बुद्धानुयायी हो जाने की चर्चा है। बुद्ध का अनुयायी हो जाने पर उसने लोगों को काटना-डंसना छोड़ दिया। लोगों को जब यह पता चल गया कि इसने काटना-डंसना छोड़ दिया है, तो उसे ईंट-पत्थरों से मारने लगे। इस पर भी उसने कुछ नहीं किया। ऐसे लहू-लुहान घायल अनुयायी से बुद्ध जब फिर मिले तो द्रवित हो गये और कहा ‘मैंने काटने के लिए मना किया था मित्र, फुफकारने के लिए नहीं। तुम्हारी फुफकार से ही लोग भाग जाते।’
भारत में भी शक्ति की आराधना का पुराना इतिहास रहा है। लेकिन यह इतिहास बहुत सरल नहीं है। अनेक जटिलताएं और उलझाव हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता के समय शक्ति का जो प्रतीक था, वही आर्यों के आने के बाद नहीं रहा। पूर्व वैदिक काल, प्राक् वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में शक्ति के केंद्र अथवा प्रतीक बदलते रहे। आर्य सभ्यता का जैसे-जैसे प्रभाव बढ़ा, उसके विविध रूप हमारे सामने आये। इसीलिए आज का हिंदू यदि शक्ति के प्रतीक रूप में दुर्गा या किसी देवी को आदि और अंतिम मानकर चलता है, तब वह बचपना करता है। सिंधु घाटी की जो अनार्य अथवा द्रविड़ सभ्यता थी, उसमें प्रकृति और पुरुष शक्ति के समन्वित प्रतीक माने जाते थे। शांति का जमाना था। मार्क्‍सवादियों की भाषा में आदिम साम्यवादी समाज के ठीक बाद का समय। सभ्यता का इतना विकास तो हो ही गया था कि पकी ईंटों के घरों में लोग रहने लगे थे और स्नानागार से लेकर बाजार तक बन गये थे। तांबई रंग और अपेक्षाकृत छोटी नासिका वाले इन द्रविड़ों का नेता ही शिव रहा होगा। अल्हड़ अलमस्त किस्म का नायक। इन द्रविड़ों की सभ्यता में शक्ति की पूजा का कोई माहौल नहीं था। यों भी उन्नत सभ्यताओं में शक्ति पूजा की चीज नहीं होती।
शक्ति पूजा का माहौल बना आर्यों के आगमन के बाद। सिंधु सभ्यता के शांत-सभ्य गौ-पालक (ध्यान दीजिए शिव की सवारी बैल और बैल की जननी गाय) द्रविड़ों को अपेक्षाकृत बर्बर अश्वारोही आर्यों ने तहस-नहस कर दिया और पीछे धकेल दिया। द्रविड़ आसानी से पीछे नहीं आये होंगे। भारतीय मिथकों मे जो देवासुर संग्राम है, वह इन द्रविड़ और आर्यों का ही संग्राम है। आर्यों का नेता इंद्र था। शक्ति का प्रतीक भी इंद्र ही था। वैदिक ऋषियों ने इस देवता, इंद्र की भरपूर स्तुति की है। तब आर्यों का सबसे बड़ा देवता, सबसे बड़ा नायक इंद्र था। वह वैदिक आर्यों का हरक्युलस था। तब किसी देवी की पूजा का कोई वर्णन नहीं मिलता। आर्यों का समाज पुरुष प्रधान था। पुरुषों का वर्चस्व था। द्रविड़ जमाने में प्रकृति को जो स्थान मिला था, वह लगभग समाप्त हो गया था। आर्य मातृभूमि का नहीं, पितृभूमि का नमन करने वाले थे। आर्य प्रभुत्व वाले समाज में पुरुषों का महत्व लंबे अरसे तक बना रहा। द्रविड़ों की ओर से इंद्र को लगातार चुनौती मिलती रही।
गौ-पालक कृष्ण का इतिहास से यदि कुछ संबंध बनता है, तो लोकोक्तियों के आधार पर उसके सांवलेपन से द्रविड़ नायक ही की तस्वीर बनती है। इस कृष्ण ने भी इंद्र की पूजा का सार्वजनिक विरोध किया। उसकी जगह अपनी सत्ता स्थापित की। शिव को भी आर्य समाज ने प्रमुख तीन देवताओं में शामिल कर लिया। इंद्र की तो छुट्टी हो ही गयी। भारतीय जनसंघ की कट्टरता से भारतीय जनता पार्टी की सीमित उदारता की ओर और अंतत: एनडीए का एक ढांचा, आर्यों का समाज कुछ ऐसे ही बदला। फैलाव के लिए उदारता का वह स्वांग जरूरी होता है। पहले जार्ज और फिर शरद यादव की तरह शिव को संयोजक बनाना जरूरी था, क्योंकि इसके बिना निष्कंटक राज नहीं बनाया जा सकता था। आर्यों ने अपनी पुत्री पार्वती से शिव का विवाह कर सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की। जब दोनों पक्ष मजबूत हो तो सामंजस्य और समन्वय होता है। जब एक पक्ष कमजोर हो जाता है, तो दूसरा पक्ष संहार करता है। आर्य और द्रविड़ दोनों मजबूत स्थिति में थे। दोनों में सामंजस्य ही संभव था। शक्ति की पूजा का सवाल कहां था? शक्ति की पूजा तो संहार के बाद होती है। जो जीत जाता है वह पूज्य बन जाता है, जो हारता है वह पूजक।
हालांकि पूजा का सीमित भाव सभ्य समाजों में भी होता है, लेकिन वह नायकों की होती है, शक्तिमानों की नहीं। शक्तिमानों की पूजा कमजोर, काहिल और पराजित समाज करता है। शिव की पूजा नायक की पूजा है। शक्ति की पूजा वह नहीं है। मिथकों में जो रावण पूजा है, वह शक्ति की पूजा है। ताकत की पूजा, महाबली की वंदना।
लेकिन देवी के रूप में शक्ति की पूजा का क्या अर्थ है? अर्थ गूढ़ भी है और सामान्य भी। पूरबी समाज में मातृसत्तात्मक समाज व्यवस्था थी। पश्चिम के पितृ सत्तात्मक समाज-व्यवस्था के ठीक उलट। पूरब सांस्कृतिक रूप से बंग भूमि है, जिसका फैलाव असम तक है। यही भूमि शक्ति देवी के रूप में उपासक है। शक्ति का एक अर्थ भग अथवा योनि भी है। योनि प्रजनन शक्ति का केंद्र है। प्राचीन समाजों में भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जो यज्ञ होते थे, उसमें स्त्रियों को नग्न करके घुमाया जाता था। पूरब में स्त्री पारंपरिक रूप से शक्ति की प्रतीक मानी जाती रही है। इस परंपरा का इस्तेमाल ब्राह्मणों ने अपने लिए सांस्कृतिक रूप से किया। गैर-ब्राह्मणों को ब्राह्मण अथवा आर्य संस्कृति मे शामिल करने का सोचा-समझा अभियान था। आर्य संस्कृति का इसे पूरब में विस्तार भी कह सकते हैं। विस्तार के लिए यहां की मातृसत्तात्मक संस्कृति से समरस होना जरूरी था। सांस्कृतिक रूप से यह भी समन्वय था। पितृसत्तात्मक संस्कृति से मातृसत्तात्मक संस्कृति का समन्वय। आर्य संस्कृति को स्त्री का महत्त्व स्वीकारना पड़ा, उसकी ताकत रेखांकित करनी पड़ी। देव की जगह देवी महत्वपूर्ण हो गयी। शक्ति का यह पूर्व-रूप (पूरबी रूप) था जो आर्य संस्कृति के लिए अपूर्व (पहले न हुआ) था।
महिषासुर और दुर्गा के मिथक क्या है?
लेकिन महिषासुर और दुर्गा के मिथक हैं, वह क्या है? दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब तक हमने अभिजात ब्राह्मण नजरिये से ही इस पूरी कथा को देखा है। मुझे स्मरण है 1971 में भारत-पाक युद्ध और बंग्लादेश के निर्माण के बाद तत्कालीन जनसंघ नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अभिनव चंडी दुर्गा कहा था। तब तक कम्युनिस्ट नेता डांगे सठियाये नहीं थे। उन्होंने इसका तीखा विरोध करते हुए कहा था कि ‘अटल बिहारी नहीं जान रहे हैं कि वह क्या कह रहे हैं और श्रीमती गांधी नहीं जान रही हैं कि वह क्या सुन रही हैं। दोनों को यह जानना चाहिए कि चंडी दुर्गा दलित और पिछड़े तबकों की संहारक थी।’ डांगे के वक्तव्य के बाद इंदिरा गांधी ने संसद में ही कहा था ‘मैं केवल इंदिरा हूं और यही रहना चाहती हूं।’
महिषासुर और दुर्गा की कथा का शूद्र पाठ (और शायद शुद्ध भी) इस तरह है। महिष का मतलब भैंस होता है। महिषासुर यानी महिष का असुर। असुर मतलब सुर से अलग। सुर का मतलब देवता। देवता मतलब ब्राह्मण या सवर्ण। सुर कोई काम नहीं करते। असुर मतलब जो काम करते हों। आज के अर्थ में कर्मी। महिषासुर का अर्थ होगा भैंस पालने वाले लोग अर्थात भैंसपालक। दूध का धंधा करने वाला। ग्वाला। असुर से अहुर फिर अहीर भी बन सकता है। महिषासुर यानी भैंसपालक बंग देश के वर्चस्व प्राप्त जन रहे होंगे। नस्ल होगी द्रविड़। आर्य संस्कृति के विरोधी भी रहे होंगे। आर्यों को इन्हें पराजित करना था। इन लोगों ने दुर्गा का इस्तेमाल किया। बंग देश में वेश्याएं दुर्गा को अपने कुल का बतलाती हैं। दुर्गा की प्रतिमा बनाने में आज भी वेश्या के घर से थोड़ी मिट्टी जरूर मंगायी जाती है। भैंसपालक के नायक महिषासुर को मारने में दुर्गा को नौ रात लग गयी। जिन ब्राह्मणों ने उन्हें भेजा था, वे सांस रोक कर नौ रात तक इंतजार करते रहे। यह कठिन साधना थी। बल नहीं तो छल। छल का बल। नौवीं रात को दुर्गा को सफलता मिल गयी, उसने महिषासुर का वध कर दिया। खबर मिलते ही आर्यों (ब्राह्मणों) में उत्साह की लहर दौड़ गयी। महिषासुर के लोगों पर वह टूट पड़े और उनके मुंड (मस्तक) काटकर उन्होंने एक नयी तरह की माला बनायी। यही माला उन्होंने दुर्गा के गले में डाल दी। दुर्गा ने जो काम किया, वह तो इंद्र ने भी नहीं किया था। पार्वती ने भी शिव को पटाया भर था, संहार नहीं किया था। दुर्गा ने तो अजूबा किया था। वह सबसे महत्त्वपूर्ण थीं। सबसे अधिक धन्या शक्ति का साक्षात अवतार!
(प्रेमकुमार मणि। हिंदी के प्रतिनिधि कथाकार, चिंतक व राजनीति कर्मी। जदयू के संस्‍थापक सदस्‍यों में रहे। इन दिनों बिहार परिवर्तन मोर्चा के बैनर तले मार्क्‍सवादियों, आंबेडकरवादियों और समाजवादियों को एक राजनीति मंच पर लाने में जुटे हैं। उनसे manipk25@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

  1. उपरोक्‍त लेख  विकल्‍प के अक्‍टूबर, 2007 और फारवर्ड प्रेस के अक्‍टूबर, 2011 में   प्रकाशित हुआ था। 


क्‍या बिहार के मुखिया सांपों को दूध पिला रहे हैं?


बिहार में नीतीश सरकार द्वारा उच्च जाति आयोग के गठन के फैसले पर ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम (एआईबीएसएफ), जेएनयू ने कड़ा विरोध जताया है। संगठन ने इस संबंध में एक पुस्तिका ‘नीतीश के सवर्ण आयोग का सच’ जारी कर उत्तर भारत के छात्र संगठनों का आंदोलन के लिए आह्वान किया है।
संगठन द्वारा जारी पुस्तिका में संकलित लेख में जदयू के बागी विधान पार्षद व साहित्यकार प्रेमकुमार मणि ने बिहार सरकार को आडे़ हाथों लेते हुए कहा है कि ‘नीतीश सरकार बड़ी होशियारी से सामाजिक न्याय के आंदोलन और विचारघारा को हमेशा-हमेशा के लिए दफन करना चाहती है और बिहार में दक्षिणपंथी व दकियानूस राजनीति की स्थापना करना चाहती है’। पुस्तिका में प्रमोद रंजन व दिलीप मंडल के भी लेख संकलित हैं, जिनमें नीतीश कुमार की सामाजिक न्याय विरोधी गतिविघियों को विस्तार से बताया गया है। पुस्तिका को देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों के अलावा पिछड़े व दलित तबकों के सांसदों को पहुंचाया जा रहा है।
ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम (एआईबीएसएफ), के संयोजक अरुण कुमार, जितेंद्र कुमार यादव व अनूप पटेल ने बताया कि जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्रों का एक जत्था 23 फरवरी से 5 मार्च, 2011 तक बिहार का दौरा करेगा। इस दौरान संगठन के सदस्य विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिघियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा आयोग के गठन के विरोघ में पटना, छपरा व मुजफ्फरपुर में कॉलेजों में छात्रों की सभाएं आयोजित की जाएंगी।
उन्होंने बताया कि एआईबीएसएफ नीतीश सरकार के इस कदम की असलियत से बिहार और देश की जनता को अवगत कराएगा। संगठन का मानना है कि उच्च जाति आयोग का गठन कर बिहार की राजग सरकार ने इतिहास के चक्र को उलटने की कोशिश की है। यह राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक प्रतिक्रांति की भी शुरुआत है। इस फैसले का प्रभाव पूरे देश पर पड़ेगा तथा सामाजिक न्याय की ताकतें दिग्भ्रमित होंगी। उन्होंने कहा कि फोरम नीतीश कुमार के इस कदम का विरोघ करने के लिए हरसंभव कदम उठाएगा।

मोहल्‍ल लाइव, 22 फरवरी, 2011 

महिषासुर विवाद : जेएनयू प्रशासन झुका, मांगी लिखित माफी


नई दिल्‍ली। 5 नवंबर, 2011 : देश के जाने माने बुद्धिजीवियों और एकडमिशियनों के दबाव में जेएनयू प्रसाशन ने महिषासुर-दुर्गा विवाद में अनावश्‍यक हस्‍तेक्षप की अपनी गलती स्‍वीकार कर ली है। शनिवार को जेएनयू प्रशासन ने खुद इससे संबंधित नोटिस जेएनयू के सभी हॉस्‍टलों व स्‍टडी सेंटर में चिपकाया है। चीफ प्रोक्‍टर एचबी बोहिदार की ओर से जारी इस नोटिस में उन्‍होंने साफ शब्‍दों में कहा है एआइबीएसएफ पर इस मुददे पर अब कोई प्रोक्‍टोरियल जांच नहीं चल रही है। उन्‍होंने एक अंग्रेजी अखबार को दिये गये अपने बयान के लिए जेएनयू कम्‍यूनिटी से मांगते हुए है कि अखबार ने उनके बयान गलत ढंग से प्रकाशित किया गया था, लेकिन इससे जिन लोगों की भावनाएं आहत हुई है, उनके प्रति वे खेद प्रकट करते हैं। जेएनयू के छात्र आंदोलनों के इतिहास में प्रशासन की ओर से ऐसा माफीनाम पहली बार आया है।
गौरतलब है कि जेएनयू के छात्र संगठन 'ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंटस फोरम' (एआइबीएसएफ) ने दुर्गा पूजा के दौरान 'फारवर्ड प्रेस' में प्रकाशित लेख 'किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन?' के अंश को पोस्‍टर के रूप में कैंपस में जारी किया था। उक्‍त लेख में नये शोधों से हवाले से कहा गया था कि महिषासुर बहुजन तबके का न्‍यायप्रियऔर प्रतापी राजा था, आर्यों ने शूद्र कुल की ही कन्‍या दुर्गा के हाथों उनका छल पूर्वक वध करवाया था। एआइबीएसएफ ने बहुजन तबके के लोगों का आह्वान किया था वे महिषासुर को अपना नायक मानें न कि आर्यों (सवर्णों) का साथ देने वाली दुर्गा को। इस बात पर आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एवीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने एआइबीएसएफ के कार्यकर्ताओं पर हमला बोल दिया था, जिसकी रिपोर्ट वसंत कुंज थाने में की गयी थी। बाद में इस पर यूनिवर्सिटी की ओर, प्रोक्‍टेरियल जांच शुरू हुई, जिसमें उलटे एआइबीएसएफ के अध्‍यक्ष जितेंद्र कुमार यादव को ही 'धार्मिक भावनाओं को आहत' करने के आरोप में  नोटिस जारी कर दिया गया । साथ ही चीफ प्रोक्‍टर ने एक अंग्रेजी अखबार (संडे स्‍टैंडर्ड, 31 अक्‍टूबर) का दिये गये बयान में एआइबीएसएफ को जातिवादी संगठन करार देते हुए यूथ फॉर यूक्विलिटी और एबीवीपी जैसे संगठनों को क्लिन चिट दे दी। इसके बाद एआइबीएसएफ समेत सभी वाम संगठनों ने विरोध प्रदर्शन कर चीप प्रोक्‍टर से लिखित माफी मांगने की मांग की थी।
इस संबंध में आयोजित  जेएनयू प्रशासन की एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक में चीफ प्रोक्‍टर द्वारा दिये गये बयान को आपत्तिजनक पाया गया तथा उन्‍हें लिखित माफी मांगने के लिए कहा गयाविश्‍वविद्यालय प्रशासन के सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान 'फारवर्ड प्रेस', जिस द्विभाषिक पत्रिका में उक्‍त लेख छपा था, उसकी विश्‍वसनीयता पर भी विचार किया गया। बैठक में उपस्थित अधिकारियों व प्राध्‍यापकों  ने पाया कि पत्रिका का संपादकीय बोर्ड और नियमित लेखकों  में भारत के प्राय: सभी  प्रमुख बहुजन समर्थक एकडमिशयन और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल है, जिनकी सहमति से ही कोई भी सामग्री पत्रिका में प्रकाशित की जाती है। इनमें प्रमुख हैं इग्‍नू की आंबेडकर पीठ की अध्‍यक्ष गेल ऑमवेट, हैदाराबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफसर व चर्चित किताब  'मैं हिंदू क्‍यों नहीं हू?' के लेखक कांचा अयलैया, आयवन कोस्‍का, दिलीप मंडल, प्रमोद रंजन  व यूरोप में रहकर शोध कार्यों से जुडे  प्रभुगुप्‍त तारा, विशाल मंगलवादी आदि  हैं। इसके अलावा दिल्‍ली स्थित कई अन्‍य लेखकों व इतिहासकारों ने भी जेएनयू प्रशासन के इस कदम का विरोध किया था। खुद जेएनयू के कई प्रोफेसरों का मानना था कि जेएनयू वाद-विवाद और संवाद का केंद्र रहा है, जिससे नये शोधों को बढ्वा मिलता है। चीप प्रोक्‍टर का यह कदम अलोकतांत्रिक और जेएनयू की अकादमिक गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाला है।
चीफ प्रोक्‍टर के माफीनामे को जेएनयू प्रशासन द्वारा सार्वजनिक रूप से जारी किये जाने से जेएनयू के विद्याथिैयों में खुशी की लहर दौड गयी है। इस विषय पर सभी विद्यार्थी संगठनों की बैठक के बाद विजय जुलूस निकाला जाएगा। एआइबीएसएफ के अध्‍यक्ष जितेंद्र यादव, उपाध्‍यक्ष विनय कुमार, प्रवक्‍ता जिग्‍मी वांग्‍दी और आकाश टिर्की ने कहा कि संगठन हर वर्ष जेएनयू समेत अपने प्रभाव वाली सभी यूनिवर्सिटियों  25 अक्‍टूबर को महिषासुर की शहादत दिवस मानाएगा।
फोरम से प्रतिबंध हटाने की मांगएआइबीएसएफ ने मांग की है कि जेएनयू प्रशासन 'जेनयू फोरम अगेंस्‍ट वार एंड पीपुल' पर लगा प्रतिबंध भी जल्‍दी हटाये। संगठन के अध्‍यक्ष जितेंद्र कुमार यादव ने कहा कि प्रतिबंध हटाने के मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे विद्यार्थियों की लडाई में एआइबीएसएफ भी साथ है। गौरतलब है कि जेएनयू में इस फोरम द्वारा अरूंधति राय का एक कार्यक्रम करवाने के बाद से ही इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। फोरम पर राष्‍ट्र ध्‍वज का अपमान करने का आरोप है। एआइबीएएसएफ रविवार को अपनी आंतरिक बैठक आयोजित करेगा। बैठक में आगे की रणनीति पर विचार करने के साथ ही संगठन में नये सक्रिय हुए कार्यकर्ताओं को पदभार दिया जाएगा। संगठन के प्रवक्‍ता आकाश टिर्की ने बताया कि संगठन में पहले से पदभार संभाल रहे लोगों में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इस दौरान सिर्फ कुछ नये नाम जोडे जाएंगे।
http://bhadas4media.com/article-comment/303-2011-11-05-08-27-23.html

प्रमोद रंजन

प्रमोद रंजन 
15 वर्षो से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय प्रमोद रंजन विचारों की त्‍वरा और मौलिक विश्‍लेषण के लिए जाने जाते हैं। रंजन ने उत्‍त्‍र भारत के समाज, राजनीति, मीडिया के आंतरिक जनतंत्र आदि विषयों पर अपने शोधपूर्ण लेखन के माध्‍यम से हिंदी प‍त्रकारिता को समृद्ध बनाया है तथा हिंदी पत्रकारिता में हाशिए पर रहे दलित-ओबीसी मुद्दों को विमर्श के केंद्र लाने में योगदान किया है। पत्रकारिता के अलावा, हिंदी आलोचना में भी उन्‍होंने सशक्‍त हस्‍क्षेप किया है। 'बहुजन साहित्‍य'/ 'गैर द्विज साहित्‍य' की अवधारणा इन्‍हीं के आरंभिक लेखन की नींव पर खडी हुई है। जन्‍म : 22 फरवरी, 1980, पटना में। संप्रति : फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक।

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Pramod Ranjan

Pramod Ranjan

Active in Hindi journalism for the last 15 years, Pramod Ranjan is known for his simple, lucid and yet piercing language, quick thought-process and and original analyses. Shri Ranjan has enriched Hindi journalism through his well-researched writings on society, politics and internal democracy in media in North India. He has immensely contributed to bringing the discourse on Dalit-OBC issues from the margins of Hindi literature to its centre stage. He is credited with the re-interpretation of many Hindu legends from the Bahujan angle. Because of these reasons, he has gained considerable popularity among the youth, intellectuals and politicians of this class. Besides Journalism, this young critic has also dwelt in Hindi literature. His initial writings were the foundation on which the concept of Bahujan / Non-Brahmanical literature is based. Born on 22nd February 1980 in Patna. Presently Managing Editor of "Forward Press". 

Saturday, April 20, 2013

मीडिया में हिस्सेदारी के गम्भीर सवाल

(पुस्तिका 'मीडिया में हिस्‍सेदारी की यह समीक्षा इंडिया टुडे, हिंदी के 11 नवंबर, 2009 अंक में छपी है। पत्रिका में इसका आरंभिक हिस्‍सा संपादित हो गया है। यहां मूल रूप में) 

मीडिया में हिस्सेदारी के गम्भीर सवाल

- राजकुमार राकेश 

मीडिया में जातिगत हिस्सेदारी का सवाल एक विशुद्ध समाजशास्त्रीय अध्ययन है क्योंकि यह सीधे तौर पर इस राष्‍ट्र की सामाजिक चेतना, इसके लोकतन्त्र और कमजोर तबकों के सशक्तीकरण से अंर्न्तगुंफित है। शायद इसीलिए जब भी ऐसी कोशिश की जाएगी तो उसे खारिज करने वाले भी कम नहीं होंगें, विशेष तौर पर वे लोग जिनके वर्गहितों से उनका सीधा टकराव होगा।
भारतीय समाज में वर्ग की अवधारणा आर्थिक स्थापनाओं से अलग नहीं हो पाई है। उसके पुरोधा शायद इस सच्चाई से साक्षात्कार करना भूल गए कि यह एकदम वैसी अवधारणा नहीं ही हो सकती थी जो युरोपीय समाज में एक समय में जन्मी और विकसित हुई थी। वे अपने वर्गसमाज में इस सच्चाई को शामिल न करने की भूल कर बैठे कि भारतीय समाज जातिगत आधार पर इस कदर बंटा हुआ है तथा उसके बाहर जिस भी वर्ग समाज की बात की जाएगी वह महज अधूरी अवधारणाओं का द्योतक होगा। इस समाज की बुनाबट में अर्न्तनिहित वर्ग विभेद हर बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है और उसके अवचेतन में इस कदर खुंब आता है कि आजीवन यह उसकी सोच, संवेदन और अभिव्यक्तियों में केवल पदार्थीय रूप में ही नहीं, बल्कि उसके गहन अवचेतन में परिलक्षित होता चलता है। नतीजन ऊंची जातियों में पैदा हुए प्रगतिशील और खुद को हमेशा ज्यातिच्युत करने के आग्रही लोग तक अपने अवचेतन में शायद ही अपनी जातिगत चेतना से मुक्त हो पाते हैं। इसलिए इस तर्क में दम है कि अपने शोषण और सामाजिक पीड़ाओं की असल और सही अभिव्यक्ति वही व्यक्ति कर सकता है जिसने आजन्म वे पीड़ाएं अपने शरीर और आत्मा पर भोगी हैं। उनसे बाहर की जातियों के सदस्य अगर अब उनके शोषक नहीं भी रहे मान लिए जाएं, तो भी वे केवल सहानभूति ही जता सकते हैं तथा दलित पीड़ाओं पर शास्त्रीय विमर्श कर सकते हैं, लेकिन उनकी भोगी गई पीड़ाओं को सही अभिव्यक्ति नहीं दे सकते।
यह अकारण नहीं था कि इस देश को राजनैतिक आजादी प्राप्त होने के तत्काल बाद भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर आंबेडकर ने तंज किया था कि वे कुछ ब्राह्मण युवकों का टोला हैं। 
भारतीय समाज में वर्ग संघर्ष की कुल अवधारणा से जातियों के अस्तित्व का नकार एक ऐतिहासिक भूल थी जिस ओर दरअसल आंबेडकर संकेत कर रहे थे। और इस समाज की आज की स्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस भूल का निराकरण होने में बहुत वक्त लगेगा। समाज का कोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। पत्रकारिता जैसा क्षेत्र, जो लोकतन्त्र और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण खम्बा कहा जाता है, इस बीमारी से किस कदर ओतप्रोत है, प्रमोद रंजन की पुस्तिका 'मीडिया में हिस्सेदारी` उसी का समाजशास्त्रीय अध्ययन है।
तो इस समाज में जहां हर ऊंची जाति के व्यक्ति के दिमाग में जातिगत अंहकार और जातिगत हित इस कदर खुबे हों जिनके चलते वह बाहर कुछ देख पाने की क्षमता खो चुका हो, वहां पत्रकारिता जैसे पेशे के सामाजिक अध्ययन का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। प्रमोद रंजन के तर्कों से असहमत होना मुश्किल है। समाज में जाति का होना जितना खतरनाक है उससे भी ज्यादा खतरनाक है जातिगत मानसिकता, इस पर शोध की मानसिक प्रक्रिया के दौरान ही वे पूर्वग्रह से भरे इस समाज में एक आवाजहीन युद्ध से जा टकराते हैं। उनके सामने एक ऐसा अंधा समाज है जो हर समाचार को वस्तुनिष्‍ठ ढंग से देख पाने की नजर से वंचित कर दिया गया है।
प्रमोद रंजन इसी अंधत्व की प्रमाणिकता के लिए बिहारी मीडिया का शोध करते हुए इस डरावने निष्‍कर्ष पर पंहुचते हैं कि इस मीडिया पर ७३ प्रतिशत उच्च जाति हिन्दू मर्दों का कब्जा यहां सामान्य पदों पर ही है जबकि बिहार की कुल आबादी में उच्‍च जाति हिन्दुओं का कुल प्रतिशत महज तेरह है। इसके आगे निर्णय करने की क्षमता वाले पहले पॉंच पद तकरीबन सभी अखबारों में ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहारों से भरे पड़े हैं। सामान्य पदों पर दलित जातियों के लोग महज एक प्रतिशत, पिछड़ी जातियों के १० प्रतिशत, अशराफ मुसलमान १२ प्रतिशत, पसमांदा मुसलमान ४ प्रतिशत और महिलाओं की भागीदारी महज ४ प्रतिशत है जिनमें भी कोई भी दलित महिला नहीं है।
जातियों के इस चक्रव्यूह का नतीजा उन्होंने २००८ में कोसी की बाढ़ के दौरान महसूस किया था जब यादव और दूसरी दलित जातियों के गढ़ में आए भंयकर प्रलय के दौरान बिहार सरकार की निष्‍ि क्रयता का नोटिस लेने और बाकी के संसार तक इस सच्चाई को पंहुचाने की बजाए पत्रकारों में सरकार की तारीफ करने की होड़ मच गई थी। बहुत हद तक वे इसे पिछड़ों की राजनीति की नासमझी का परिणाम भी मानने को विवश हैं।
इस श्रृंखला में 'विश्वास का धंधा` नामक आलेख पत्रकारिता की उस नकारात्मक और निन्दनीय प्रवृति से जुड़ा है जिसके चलते चुनावों के दौरान प्रत्याशियों के पक्ष में खबरें उनसे पैसे लेकर बनाई और परोसी जाती रही हैं। यह जनमानस को गुमराह करने का ही धंधा नहीं है बल्कि पत्रकारिता के किसी भी मानदंड की ज्यामिती से भी निंदनीय है। प्रमोद रंजन जनता को दिगभ्रमित करने वाले इन खबरी पैकजों से भी आगे उस द्विज बर्चस्व की खबर लेते हैं जिसके चलते पत्रकारिता में इस तरह के अमानवीय विचलन देखे जाने लगे हैं। इतना ही नहीं यह मित्रधर्म और उससे भी आगे जातिधर्म से जुड़ा फंडा है इसलिए खबरों की उस पैकेज संस्कृति से भी ज्यादा खतरनाक है। प्रमोद के शोध में एक बहुमूल्य निष्‍कर्ष यह भी है कि भारतीय पत्रकारिता के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में सिवाय तकनीक के कोई परिवर्तन लक्षित नहीं किया जा सकता क्योंकि हमेशा ही से उसपर ब्राह्मणवाद की मानसिकता हावी रही है जो यथास्थिति की पोषक है। इससे भी आगे आज जो नया ब्राह्मणवाद पसर रहा है उसके पीछे इसी तकनीक का कमाल है। यानी चीज़ें जितना बदलती हुई दिख रही हैं उतना ही वे अपने मूल रूप में बनती चली जा रही हैं।
शोधकर्ता ने इस दुबले पतले से दिखने वाले इस काम में बहुत सी चीजों पर से नकाब हटाए हैं, जैसे आखिर खबर है क्या, फ्री प्रैस के भुलावे से जनता कैसे अनभिज्ञ बनी रहती है, मित्रधर्म और जातिधर्म के इस निर्वाह के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी कहां और कैसे पानी भरती रह जाती है, पढ़ने के चयन पर कैसे ताले आयत होते हैं, एक ही सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्‍ठभूमि वाले लोगों के बर्चस्व ने पत्रकारिता के स्वरूप को किस कदर एकांगी बना दिया है और अनन्तिम, कि कैसे कैसे चोलियां और दामन आपस में गुत्थमगुत्था होते चलते हैं। बहुत कुछ है जो सामान्य जन को सूचित ही नहीं करता उससे अपना ज्ञान बढ़ा कर आगे बढ़ने और इस व्यवस्था को बदलकर समग्र हिस्सेदारी की व्यवस्था बनाए जाने की ललकार भी लगाता है। पर फिर सवाल वही है कि यह कैसे मुमकिन होगा और इसका जवाब तलाशने की हर कोशिश ही सही जवाब होगा।

मीडिया में हिस्सेदारी : प्रमोद रंजन

मीडिया का स्टिंग आपरेशन


समीक्षा
-प्रमोद रंजन की पुस्तक ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ मीडिया पर किये गये सर्वे पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि वर्तमान समय में मीडिया में चयन का आधार गुणवत्ता अथवा बौद्धिकता नहीं है। अब उम्मीदवार के चयन का आधार यह है कि ऊंची जाति से संबंध रखता है या निम्न जाति से।
पुस्तक को पढ़कर पता चलता है कि बिहार के हिंदी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के पत्रकारों में 87 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण हिंदू हैं। इनमें 34 फीसदी ब्राह्मण, 23 फीसदी राजपूत, 14 फीसदी भूमिहार तथा 16 फीसदी कायस्थ हैं। मुसलमान और दलित समाज से आने वाले पत्रकार मात्र 13 फीसदी ही है।
इसके अलावा यह भी बताया गया है कि समाचार-पत्र और न्यूज चैनल पैसे लेकर खबरें छापते या दिखाते हैं। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने कई उदाहरण भी दिये हैं।मीडिया और राजनीति के संबंधों  का उदाहरण के साथ खुलासा करते हुए पुस्तक में बताया गया है कि किस तरह मीडिया पर राजनीतिक प्रभाव छाया हुआ है।यह पुस्तक ही नहीं बल्कि मीडिया का स्टिंग आपरेशन है जो मीडिया जगत की कटु सच्चाइयों से पाठक को परिचित कराता है।पुस्तक में भारत में मीडिया का आरंभ, उद्देश्य, कार्यों तथा बदलते परिवेश में उसके बदलते रूप का समीक्षात्मक बौद्धिक वर्णन मिलता है। पत्रकारिता एवं राजनीति में रूचि रखनेवाले व्यक्तियों के लिये यह पुस्तक महत्वपूर्ण है।
पुस्तक : मीडिया में हिस्सेदारी
लेखक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : प्रज्ञा सामाजिक शोध संस्थान,
कुम्हरार, पोस्ट- बहादुरपुर, पटना
मूल्य  : 25 रुपये
पृष्ठ   : 36
(भारतीय पक्ष में प्रकाशित) 

Wednesday, March 27, 2013

जन विकल्‍प : बहुजन नजरिये से महत्‍वपूर्ण मासिक पत्रिका

- मुसाफिर बैठाप्रभात खबर, पटना  के  13 फरवरी, 2007 अंक में प्रकाशित 

प्रेमकुमार मणि एवं प्रमोद रंजन के संयुक्त संपादकत्व में जन विकल्प नाम से सामाजिक चेतना की पक्षधर एक वैचारिक मासिक पत्रिका का पटना से प्रकाशन गंभीरमना पाठकों के लिए एक अच्छी खबर है। पत्रिका के अब तक प्रकाशित दो अंकों, प्रवेशांक (जनवरी०७तथा फरवरी०७ की सामग्री से आश्‍वस्ति मिलती है कि यदि पत्रिका सतत निकलती रही तो अलग पहचान बना सकेगी। इसकी अधिकांश सामग्री बहुजन नजरिये से बनी है। और वस्‍तुनिष्‍ठ व तार्किक-वैज्ञानिक सोच की आग्रही है। संपादकीय में प्रेमकुमार मणि ने भारतीय राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनतंत्र के क्षरण पर चिंता व्यक्त की है। देशकाल स्तंभ के आलेख अंक की रीढ हैं। अनिलचमड़िया के आलेख 'सामाजिक न्याय की सत्ता-संस्कृति` में सामाजिक न्याय की राजनीति के खेल को उघाड़ा गया है। अभय मोर्य ने 'एक नायक का पतन` के जरिये जार्ज फर्नांडीज के विद्रोही नायक के समझौतापरस्त व विरोधभासी चरित्र के राजनेता में तब्दील हो जाने की विडंबना की कथा कही है। प्रवेशांक में पत्रिका के संपादकद्वय में से एक, प्रमोद रंजन की कवि अरुण कमल से बातचीत भी विचारोत्तेजक है। प्रश्नकर्ता के सूझबूझ भरे प्रश्नों पर कहीं-कहीं अरुण कमल का जवाब राजनेताओं के जवाब-सा गोलमटोल, तो कहीं एकदम 'गोल` हो गया है। कंवल भारती का आलेख 'बहुजन नजरिए से 1857 का विद्रोह ' गवेषणात्‍मक अध्ययन पर आधारित एवं सबऑल्टर्न दृष्टि से लैस है। यह उक्त विद्रोह की स्थापित धारणा को सिरे से खंडित करता है। इस लेख के साथ की गयी संपादकीय टिप्पणी इस विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तो मानती है पर महज इस अर्थ में कि इंग्लैंड के अशराफ तबके द्वारा भारत के अशराफ तबके से किया गया सीमित समझौता भर था, जिसके तहत भारत में समाज सुधारों से अंगरेजों ने अपना हाथ खींच लिया थहा। अध्ययन कक्ष स्तंभ के तहत राजू रंजन प्रसाद का शोधआलेख 'प्राचीन भारत में वर्णव्यवस्था और भाषा` सम्मिलित है। यहां वर्ण और भाषा की भेदक विभिन्नता में ब्रह्मणवादी, सामंती मानस की छल-कपट बदबूदार संस्कृति के आमद के रूप में उभर कर सामने आती है। इस अंक में 'पुस्तक चर्चा` के अंतर्गत मुशरर्फआलम जौकी का लेख तथा 'अन्यान्य` के अंतर्गत् फजल इमाम मल्लिक का लेख भी पठनीय है। राजकुमार राकेश के 'आलोचनात्मक शीर्षक को भी कोई गंभीर पाठक पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। प्रवेशां मे मैथिली कवि जीवकांत की चारमैथिली (कवि द्वारा ही अनुदित) कवितायें हैं। इनमें 'सूखे पत्ते ढेर` में अच्छी भाव-व्यंजना है। 'नकली` और अग्नि प्रलय` शीर्षक कविताएं सामान्य हैं, जबकि 'शहर में` कविता का अंतिम अंतरा अटपटा व भ्रामक है। मसलन कविता की अंतिम तीन पंक्तियों , पुराने, विधि-व्यवाहर/पुराने लोकाचार/संस्कृति व धार्मिक कर्मकांड व बासी व तेबासी होकर फेंके जा रहे।` इस कवि सत्य के उलट सांस्कृति धार्मिक आडंबर का प्रकोप महामारी की तरह हमारे आधुनिक होते शहरी समाज को ग्रस ही रहा है। जीवकांत की इन कविताओं के अतिरिक्त 'जनविकल्प` के पहले अंक के साथ कविता पुस्तिक 'यवन की परी` भी जारी की गयी है। इसमें अरब की एक ऐसी कवयित्री 'परी` की कविता दर्ज है, जिसने पागलखाने में आत्महत्या कर ली। त्रिवेंद्रम की रति सक्सेना के सौजन्य से उपलब्ध यह कविता भी विमर्श व विश्व राजनीति को संवेदनशील ढंग से परिभाषित है।

'जनविकल्प` का फरवरी अंक भी खासा विचारोत्तेजक है। विख्यात इतिहासकार विपिनचंद्र ने रोहित प्रकाश से बातचीत में जहां १८५७ के विद्रारेह को पारंपरिक नजरिये से देखा हे, वहीं भगत सिंह पर उनके दृष्टिटकोण में नयापन है। उन्होंने भूमंडलीकरण को आवश्यक बताते हुए इसका विरोध करनेवालों को 'महा बेवकूफ ` करार दिया है। जाहिर है नामचीन मार्क्सवादी इतिहाकसकार की ऐसी टिप्पणी कई विवादों को जन्म दे सकती है। अपने लंबे आलेख 'धर्म की आलोचना कीआलोचनामें युवा समाजकर्मी अशोक यादव भारत में प्रचलित धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यर्थाथपरक निष्‍कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिंदू धर्म सबसे अमानवीय धर्म है।
संपादकीय के तहत प्रेम कुमार मणि ने एक ओर पिछले दिनों पटना में संपन्न ग्लोबल मीट को 'अपर कास्ट मीट` बताया है, वहीं यह भी कहा है कि नीतीश कुमार के सोच में सामाजिक न्याय का पुट होता है। उन्होंने बिहार के विकास के संदर्भ में 'बेयर फुट कैपिटलिज्म` (नंगे पांव पूंजीवाद) की प्रस्तावना की है। साहित्य अकादमी पुरस्कार के उपलक्ष्य में ज्ञानेंद्रपतिकी कविताओं का 'समकालीन कविता` के संपादक विनय कुमार द्वारा चयन प्रतिनिधिपरक है। कुछ ३२ पृष्‍ठों की यह दसटकिया पत्रिका अखबारी कागज पर मुद्रित है। सो इस वैचारिक पत्रिका के प्रकाशकों को मूल्य और कागज पर पुनर्विचार करना चाहिए।

फॉरवर्ड प्रेस : आइए, इसके नये कलेवर का स्‍वागत करें


♦ मुसाफिर बैठा, 21 जनवरी, 2011, मोहल्‍ला लाइव.
फारवर्ड प्रेस कई मायनों में अनूठी, तेजोदीप्‍त, बेबाक और क्रांतिकारी पत्रिका है। वैज्ञानिक और तार्किक सोच को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से निकाली गयी यह मासिक द्विभाषिक (हिंदी & अंग्रेजी) पत्रिका खास कर दलित और शूद्र समुदाय, जिन्हें हम बहुजन भी कह सकते हैं, के हितों को संबोधित प्रश्नों, वंचनाओं, अधिकारों, अस्मिताओं, आशा-आकांक्षाओं को लेकर बेहद संवेदनशील है। इस मिजाज की भारत की यह इकलौती वैचारिक पत्रिका है। यह पत्रिका मई 2009 से अस्तित्व मे आयी। पत्रिका के नाम के औचित्य पर बात करते हुए संपादक आइवन कोस्का कहते हैं, “…हम उत्तर भारत की पत्रकारिता की नयी दृष्टि लेकर आये हैं। इसे हम कहते हैं – फारवर्ड थिंकिंग अर्थात अगड़ी सोच। इससे हमारा अर्थ है कि हम भारत के सभी लोगों की प्रगति और विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं – केवल आर्थिक नहीं बल्कि सभी पक्षों में।”
अंतर्राष्ट्रीय प्रसार की यह पत्रिका देश-परदेस के हर कोने में मौजूद बहुजन समाज के हक-हुकूक की निगहबानी को प्रस्तुत दिखती है। पत्रिका का फलक काफी व्यापक और विस्तृत है। इतिहास और वर्तमान के तमाम पहलुओं पर समाज की मुख्यधारा के नजरिये को बहुजन दृष्टि से वैज्ञानिक-तार्किक पड़ताल करते हुए बात और विमर्श आपको यहां बिलकुल संजीदा और सजीव तरीके से घटित होते हुए मिलेगा।
पत्रिका पिछले मई 2011 में दो साल की उम्र की हो गयी। हालांकि जो इसका मिजाज है, जो इसके तेवर हैं, उस हिसाब से यह अपने पाठक वर्ग के अभीष्ट हिंदी हिस्से में बहुत असरदार दखल नहीं बना पायी है। वैसे, इधर, हाल के दिनों में पत्रिका की रीति-नीति में कुछ बदलाव आये हैं, जिससे आशा की जा सकती है कि पत्रिका के हिंदी पाठक वर्ग के बीच भी प्रचार-प्रसार निकट भविष्य में बढ़ता दिखाई देगा, जबकि पहले यह अंग्रजी पाठक वर्ग के मध्य ही यह अधिक प्रचलित थी।
पत्रिका का संपादन इधर तेजतर्रार युवा साहित्यकार और विचारक प्रमोद रंजन के हाथों में सौंपा गया है। समृद्ध और नवोन्मेषी दृष्टि रखने वाले प्रमोद पत्रकारिता का व्यापक अनुभव रखते हैं। प्रमोद ने बिहार के मीडिया मिजाज पर पैनी दृष्टि रखते हुए कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते हुए मीडिया के सवर्ण चरित्र और जनसरोकारों से बढती दूरी का खुलासा किया था। उन्होंने बिहार के कोशी क्षेत्र में कुछ साल पहले आयी भयंकर बाढ़ की त्रासदी, उस पर प्रशासन के उदासीन एवं शिथिल रवैये, चूक और लूट की पोल खोली थी। उनकी मेहनत और दृष्टि का असर यहां पत्रिका में भी दिखने लगा है।
जून 2011 अंक को बतौर बानगी देखा जा सकता है। ‘दिल्ली विश्वविद्यालय में सीटों की लूट’ नामक शोधपूर्ण और आंखखोलू रपट ओबीसी कोटे के छात्रों को उनको मिलने वाला कोटा न उपलब्ध करवा कर नामांकन से वंचित करने की अभी की ताजातरीन ‘वारदात’ से रूबरू करवाती है। इस रपट का नोटिस लेकर एक इलेक्ट्रौनिक चैनल ने भी समाचार चलाया। विश्वविद्यालय के इस द्वेष, ज्यादती और कपट-उद्भेदन से निहित स्वार्थी सवर्ण तत्व परेशान दिख रहे हैं। प्रमोद रंजन ने बिहार के समाज में व्याप्त सामाजिक भेदभाव, राजनीतिक प्रदूषण, अनगढ़ रुढ़‍ियों, चलनों आदि को भी पत्रिका का कंसर्न बनाना शुरू किया है। प्रगतिशील एवं विद्रोही तेवर के साहित्यकार एवं राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि का नियमित लेखन यहां देखना अतिरिक्त रूप से आह्लादक है। उनमें हमेशा नयी दृष्टि देखने को आपको मिलेगा जो बहुधा बहसतलब होती है।
मैं इस जरूरी पत्रिका के दीर्घ और क्रांतिधर्मी जीवन की कामना करता हूं।
(मुसाफिर बैठा। समालोचक-साहित्‍यकार। फेसबुक पर पाद टिप्‍पणियों के लिए इन दिनों चर्चा के केंद्र में। बिहार विधान परिषद की प्रकाशन शाखा में अधिकारी। अभी अभी एक कविता पुस्‍तक प्रकाशित हुई है, बीमार मानस का गेह। musafirbaitha68@yahoo.com पर संपर्क करें।)