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Sunday, May 11, 2014

Friends, Dalit daughters of Bhagana are still waiting to be heard at Jantar-Mantar



Afraid of Haryana’s Jat politics?
Friends, Dalit daughters of Bhagana are still waiting to be heard at Jantar-Mantar

 -PRAMOD RANJAN
The men, women and children of 100-odd poor, Dalit families of Bhagana have staged a sit-in at Delhi’s Jantar-Mantar since 14 April. Can you guess what must have prompted them to travel all the way to Delhi? They thought that the media of the national capital would lend its ears to their pain, secure justice for them. They had heard about the Nirbhaya incident. They thought that they would not get justice till they reach Delhi. That is why they also brought their four teenage daughters, who were victims of gang- rape, with them. Just spare a thought for the women of their families – the mental trauma they must be going through, as the girls are not allowed to leave their homes without covering their faces. And here, they are sitting in public, as if they are part of an exhibition!
I know, my journalist friends born in upper-caste families would insist that they never ignored the sit-in. The protestors were given coverage in proportion to their numbers. But my friend, does your responsibility end here? Should only the size of the crowd and its saleability be the determinants of the space a news story will get in the media? Does the media not have an additional moral responsibility towards the deprived sections of society? Can you put your hand on your heart and say that on the first day of Anna agitation, the number of people present at the venue qualified it for the massive nationwide coverage it got? Was the number of those who lit candles in memory of Nirbhaya more than the number of Bhagana protestors? In 2012, at the same Jantar-Mantar, just next to the Anna Hazare protestors, sat hundreds of Dalit-OBCs who were victims of social boycott in their villages. But the media took no notice of them. Needless to say, had the media given them adequate coverage then, these gang rapes would not have happened.
When the Bhagana protestors did not get any coverage for four days, they thought that maybe, Nirbhaya got justice because of the protest by JNU students. They reached the JNU campus on 19 April and begged the students to take up their cause. On 22 April, JNU Students’ Union (JNUSU) held a big demonstration at Jantar-Mantar and in front of the Haryana Bhawan. But what happened? Aaj Tak, ABP News and NDTV were nowhere to be seen. All were informed but only the representatives of local TV channels of Haryana turned up and they only broke the morale of the protestors by announcing their boycott of the sit-in! The same evening, they telephoned the demonstrators to tell them that they were not boycotting the demonstration and that visuals of the demonstration would be aired. That probably was a face-saving move because the news of the boycott had been posted on the widely read Bhadas for media and other websites.
Friends, this is the season of elections. Haryana is being ruled by a Congress government. Socially boycotted by the Jats, the Chamars and Kumhars of Bhagana have been forced to live outside their villages for more than two years. The members of the Dhanuk caste did not leave their villages despite the boycott. The four girls, two of whom are sisters, are from Dhanuk families. After being abducted together on 23 March, for two days, a dozen men gang-raped them. This was the horrific punishment for not complying with the diktat for boycott. FIRs were lodged, statements under section 164 of the CrPC recorded, medical examination done. Everything is on record. In this situation, was it not your duty to ask top Congress leaders how the Dalit-OBCs were being treated under the party’s rule? Should you not have asked them on what basis are they seeking the votes of the Dalits and OBCs? Shouldn’t you not have asked the BJP leaders, tom-tomming Modi’s OBC credentials, why they have been ignoring the series of incidents of rapes of Dalit and OBC girls in Haryana for the past four-five years and why their politics is still centred on the appeasement of Jats?
Bhai, at least now you can tell us who is the aam aadmi?” – you could have well asked Arvind Kerjriwal. Incidentally, Kejriwal hails from Hisar district and both Bhagana and Mirchpur are in Hisar. Have you ever seen AAP raising any issue related to the Dalits of Haryana? And, mind you, Yogendra Yadav, AAP’s probable chief ministerial candidate for Haryana, has been repeating ad nauseum that in Delhi, the party got the highest number of votes from areas where the poor, the Dalits and the OBCs reside in sizeable numbers. Why don’t you ask him if this was how AAP was rewarding the Dalit-OBCs for voting for the party? Why hasn’t a single MLA from AAP, which usually launches agitations at the drop of a hat, cared to visit Jantar-Mantar? Why did AAP’s socialist professor, Anand Kumar, not attend the meeting convened at JNU on 19 April to get justice for these girls, even though he was invited and was on campus at the time?
Friends, there is still time. Bhagana’s Dalit daughters are still waiting to be heard by you at Jantar-Mantar.

MEDIA ANALYSIS, Forward Press, JUNE 2014

Saturday, April 20, 2013

गैर-द्विज पत्रकार को अश्‍लीलता के चक्रव्‍यूह में घेरा गया है!


अविनाश जी, मोहल्‍ला पर आज इंडिया टुडे की ‘कथित अश्‍लील’ स्‍टोरी पर फेसबुक पर चली बहस देख रहा था। कई प्रबुद्ध लोगों ने इस बहस में भाग लिया है। सब को तो नहीं, लेकिन अधिकांश पढ़ गया। अधिकांश ने बहुजन समाज से आने वाले पत्रकार मित्र दिलीप मंडल की लानत-मानत की है। आपने फेसबुक पर अपनी टिप्‍पणी में तंज किया है कि ऐसे ‘अश्‍लील’ पत्रकार को फारवर्ड प्रेस ने सम्‍मानित किया।
अश्‍लीलता को लेकर मेरा नजरिया अलग रहा है। जरा, गाव-तकिया लगाकर अपनी कोठी की ड्योढ़ी पर नाच देख रहे सामंत के नौकर-नौकरानियों की नजर से भी इसे देखें। देखिए, वे पान पहुंचाने आते है, शराब की बोतल मालिक के सामने रखते हैं और कनखियों से नाच को देखते हैं। कोठी की नौकरानियां छुप-छुप कर देखने की कोशिश कर रही हैं। ये वे भाग्‍यशाली लोग हैं, जो क‍नखियों से भी देख पाते हैं। वरना, गांव के अन्‍य लोग तो बस उस गाड़ी को ही देखकर संतोष कर लेते हैं, जिसके पर्दे के भीतर लाल पान की बेगम गुजरती है।
- प्रमोद रंजन, मोहल्‍ला लाइव पर। 25 अप्रैल, 2012 को 

Friday, April 12, 2013

बहुजन साहित्य और आलोचना


(संपादकीय लेख, बहुजन साहित्‍य वार्षिकी, फारवर्ड प्रेस, अप्रैल, 2013) 

- प्रमोद रंजन

अगर आप मानते हैं कि आलोचना के लिए साहित्यएकमात्र साध्य होना चाहिए और विचारउसे दूषित  करता है, तो मुझे आपसे इस समय कुछ नहीं कहना है.

ब्लैक साहित्य
, दलित साहित्य, बहुजन साहित्य आदि अवधारणाएं सीधे तौर पर विचार’, दृष्टिकोण पर आधारित हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्य, साहित्य होता है. जैसे, दुनिया, दुनिया होती है. लेकिन मनुष्‍य के लिए दुनिया सिर्फ दुनिया नहीं होती. वह इसका विभाजन भौगोलिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, नस्ली आदि अनेक आधारों पर करता है ताकि उसे जीवन को जीने तथा उसे समझने में सुविधा हो. ज्ञानइसी विभाजन से जन्म लेता है, दरअसल, विभाजन और ज्ञान अन्योन्याश्रति हैं. अन्यथा  पशु के लिए दुनिया सिर्फ दुनिया है.
साहित्य का विभाजन ही आलोचनाके उत्स में है. हम किसी साहित्य को कैसे देखें, कैसे उसे दूसरे अलगाएं और उसकी विशेषता , उसके महत्व, उसके उद्देश्य, उसके प्रभाव को कैसे समझें; किस कोण से उसका आस्वाद सबसे अधिक से अधिक ग्रहण किया जा सकता है - क्या यही बताना आलोचना का दायित्व नहीं है?

अरसे से हिंदी साहित्यिक आलोचना इस दायित्व को नहीं निभा रही. रामचंद्र शुक्ल
, रामविलास शर्मा और बाद में नामवर सिंह आदि कई मुर्द्धन्य आलोचकों ने इस दायित्व को अपने-अपने समय में निभाया. पुराने अनेक प्रकार के साहित्यों की पहचान, प्रगतिशील  आंदोलन से लेकर नई कहानी आंदोलन आदि तक के अनेक प्रकार के विभाजन, इसी आलोचकीय दायित्व की देन हैं. लेकिन, अपनी द्विज सामाजिक पृष्ठभूमि  के कारण हिंदी के इन आलोचकों ने शूद्रों और अतिशूद्रों के साहित्य को अलग से अपने आलोचकीय संज्ञान में नहीं लिया. साहित्य की अन्य धाराओं की तरह उन्होंने उसे एक स्पष्‍ट और स्वायत्त पहचान नहीं दी. कारण चाहे जो भी रहे हों.
इसी कारण, हम दलित साहित्य को मराठी साहित्य से चलकर हिंदी में राजेंद्र यादव जैसे शूद्र लेखक के हाथों में आते देखते हैं. हिंदी में इसका जन्म क्यों नहीं हुआ? महाराष्ट्र  में ही पिछले कुछ वर्र्षों  में ओबीसी साहित्य की धारा और उनके सम्मेलनों का पता भी हमें मिलता है लेकिन आज हिंदी के आलोचकों के लिए यह आष्चर्यचकित करने वाली हास्यास्पद अवधारणा है. क्यों?

बहरहाल, ‘बहुजन साहित्यकी अवधारणा का जन्म फारवर्ड प्रेस के संपादकीय विभाग में हुआ तथा इसका श्रेय हमारे मुख्य संपादक आयवन कोस्का, आलोचक व भाषा विज्ञानी राजेंद्र प्रसाद सिंह तथा लेखक प्रेमकुमार मणि को है. यह पिछले लगभग डेढ वर्षों  में हमारे बीच चले वाद-विवाद और संवाद का नतीजा था. राजेंद्र प्रसाद सिंह ओबीसी साहित्यकी अवधारणा लेकर सामने आये थे लेकिन प्रेमकुमार मणि ने इस शब्दवाली का घनघोर विरोध किया था. मैं भी इस शब्दावली से सहमत नहीं था. (  मैंने हमेशा  ओबीसी साहित्यकी जगह शूद्र साहित्यकहने का प्रस्ताव किया. शूद्रशब्द संस्कृति और धर्म द्वारा प्रदत्त है तथा शूद्रों तथा अतिशूद्रों की एक लंबी साहित्यक परंपरा भी हिंदी पटटी में मौजूद रही है.
अंततः हम बहुजन साहित्यनाम की एक बड़ी छतरी के नाम पर सहमत हुए और वर्ष  2012 में फारवर्ड प्रेस ने पहली बहुजन साहित्य वार्षिकी प्रकाशित की . अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उस वार्षिकी  की चर्चा हुई, लेकिन इस वर्ष  बहुजन साहित्य वार्शिकी का संपादन करते हुए मुझे महसूस हुआ कि हम हिंदी के साहित्यकों को इस अवधारणा के बारे में बताने में शायद असफल रहे हैं.
बहुजन साहित्य क्या है?

*     बहुजन साहित्य को उस बडी छतरी की तरह देखा जाना चाहिए जिसके अंतर्गत दलित साहित्य, (सुविधा के लिए इसे हम अतिशूद्रों का साहित्य भी कह सकते हैं) के अतिरिक्त शूद्र साहित्य, आदिवासी साहित्य, तथा स्त्री साहित्य समाहित  है. आम्बेडकरवादी साहित्य, ओबीसी साहित्य आदि जैसी अनेक शब्दवालियां, विचार, दृश्टिकोण इसके आंतरिक विमर्श में समाहित हैं.
* हिंदी में पिछले दो दषकों के दौरान  दलित साहित्य की अवधारणा को स्वीकृति मिली है. लेकिन इसके दो बडे़ विरोधाभास भी हैं. पहला, इसे यह स्वीकृति हाशिये  के साहित्यके रूप में मिली है. यानी मुख्यधारा में कोई औरसाहित्य है. कम्युनिस्ट लेखक इस कोई औरसाहित्य को प्रगतिशील / जनवादी साहित्य कहते हैं. जबकि राजेंद्र यादव समेत सभी दलित साहित्य के लेखकों और समर्थकों का मत है कि जो दलित साहित्य नहीं है, वह सवर्ण साहित्य है.यानी, उनके अनुसार, हिंदी की मुख्यधारा का साहित्य सवर्ण साहित्यहै. दूसरी ओर, प्रगतिशील साहित्य के नाम पर अनेक ऐसे द्विजों के साहित्य की भी गणना की जाती है, जिनके लेखन की अंतर्वस्तु का बड़े भाग पर उनकी द्विज चेतना हावी रही है.

   दलित साहित्य का दूसरा विरोधाभास यह है कि वह सिर्फ अनुसूचित जाति तक सीमित रह गया है यानी जो जातियां भारतीय संविधान के अनुसार एससीसुची में दर्ज हैं, उन्हीं में पैदा हुए लेखक का साहित्य दलित साहित्य होगा. यानी वह सिर्फ अतिशूद्रों का साहित्य है, जिन्होंने अस्पृश्य  होने की पीड़ा झेली है. शूद्र भी इससे बाहर हैं.

* हिंदी साहित्य के इतिहास में जो भी बड़े आंदोलन हुए चाहे वह भक्ति आंदोलन हो या प्रगतिशील आंदोलन, नई कहानी आंदोलन सभी मुख्य धाराका साहित्य बने. क्या यह एक प्रश्न नहीं बनता कि अपनी बौद्धिक गुणवत्ता और विराट परिर्वतनकामी चेतना के बावजूद दलित साहित्य को क्यों हाशियेके साहित्य के रूप में देखा गया और द्विज साहित्य’ ‘मुख्यधारा का साहित्यकी पदवी को इंज्वाय कर रहा है. अगर इसमें षड्यंत्र  की बू नहीं भी आती हो तब भी क्या यह तथ्य दलित लेखकों को अपने भीतर झांकने, अपनी अवाधारणात्मक गलतियों को सुधारने के लिए नहीं उकसाता?

* दलित साहित्य की नींव कबीर, जोतिबा फूले और डॉ आम्बेडकर के विचारों पर टिकी है. इनमें से कबीर (जुलाहा) और जोतिबा फूले (माली) अतिशूद्र नहीं थे बल्कि वे शूद्र परिवार में पैदा हुए थे, जो आज संवैधानिक रूप से ओबीसी समुदाय का हिस्सा है.
 
* हम कबीर और रैदास के साहित्य में अगर समानताएं पाते हैं तो क्या पर्याप्त फर्क भी नहीं पाते? इसी तरह, जोतिबा फूले और आंबेडकर के चिंतन में अनेक समानताएं हैं तो अनेक फर्क भी हैं. अतिशूद्र और शूद्रों और आदिवासियों तथा स्त्रियों के बीच मुख्य समानता उन्हें ब्रह्मणवादी व्यवस्था द्वारा प्रताड़ित किये जाने तथा उसके विरुद्ध उनका संघर्ष  है. यह समानता इनके साहित्य को भारत के संदर्भ में बहुजन साहित्यके खाते में रखती है तथा असमानताएं (जो न सिर्फ जीवन मूल्यों में बल्कि उसकी साहित्यक अभिव्यक्ति में साफ तौर पर झलकती है) उन्हें अपने अपने साहित्य (दलित साहित्य, ओबीसी साहित्य, आदिवासी साहित्य) को बनाए रखने का उचित आधार प्रदान करती है.
* बहुजन साहित्य की अवधारणा का विकास वस्तुतः हिंदी साहित्य की आलोचना के विकास का सवाल है. जैसे-जैसे हम बहुजन साहित्य को चिन्हित करते जाएंगे, द्विज साहित्य स्वतः हाशिये का का साहित्य बनता जाएगा क्योंकि हिंदी साहित्य का अधिकांश हिस्सा बहुजन साहित्य ही है. जरूरत इस बात की है कि हम कितने कोणों से अपने साहित्य को परखते हैं.

Thursday, March 28, 2013

Bahujan Literature and Criticism



EDITORIAL ESSAY, Published in Forward Press,  Bahujan Literary AnnualAPRIL 2013
COVER PAGE

Bahujan Literature and Criticism
-PRAMOD RANJAN

If you believe that literary criticism is aimed only at ‘“literature”“ and that “thinking” contaminate  it, then I have nothing to say to you, at least for now. Concepts like Black literature, Dalit literature and Bahujan literature are directly based on thinking and outlook. There is little doubt that literature is literature, just as the world is the world. But for humans, the world is not just the world.  They have divided it into many parts on geographical, political, cultural and ethnic considerations so as to facilitate their life and to give it a meaning. In fact, division and wisdom are mutually interdependent. Otherwise, like for an animal, the world is just the world
In fact, the division of literature is fundamental to criticism. How do we look at  literature, how do we make distinctions between it, its characteristics, its importance, its objectives, its impact, from which angle can it be understood the best - shouldn’t criticism answer all these questions? For quite some time now, Hindi literary criticism is not discharging this responsibility.  Ramchandra Shukla, Ramvilas Sharma and later Namvar Singh and other eminent critics discharged this responsibility in their own times. The classification of Progressive literature, “Nayee Kahani,” and so on were all born out of the discharge of this responsibility. But due to their ‘Dwij’ social background, these Hindi critics did not take cognizance of the literature of ‘Shudras’ and ‘Atishudras’ as a separate genre. They did not give a clear, distinct identity to this literature, whatever might have been the reasons.
That is why Dalit literature originated in Marathi and thence reached Shudra writers like Rajendra Yadav. Why was it not born in Hindi? We are aware of the existence of a distinct stream of OBC literature and of its literary congregations in Maharashtra but today, for the Hindi critics, it  is nothing except an astounding but laughable concept. Why?
Be that as it may, the concept of ‘Bahujan literature’ was born in the editorial department of FORWARD Press and the credit  must go to our chief editor Ivan Kostka, critic and linguist Rajendra Prasad Singh and writer Premkumar Mani. The evolution of the concept was the outcome of the debate and discussions between us, which lasted for well over  a year and a half. It was Rajendra Prasad Singh who came out with the concept of ‘OBC literature’ while Prem Kumar Mani doggedly opposed this terminology. I too was not agreeable to the use of this term. I preferred using the term “Shudra literature” rather than “OBC literature”. The word ‘Shudra’ has its origins in culture and religion and there is a long literary tradition of Shudras and Atishudras in the Hindi belt.
  Ultimately, we agreed on the umbrella term “Bahujan literature” and in the year 2012, FORWARD Press published its first Bahujan Literature Annual. The publication was discussed and debated in many newspapers and magazines but while editing the Bahujan Literature Annual this year, I realized that perhaps we have failed to apprise Hindi litterateurs of the concept of “Bahujan literature”.

WHAT IS BAHUJAN LITERATURE?
·                   Bahujan literature  is a big umbrella, under which fall Dalit literature (For convenience sake we can describe it as “Atishudra literature”), Shudra literature, Tribal literature and  Women’s literature. Terminologies, thoughts and viewpoints like Ambedkarite literature, OBC literature, etc. can be included in its internal discourse.
·                   In Hindi, the concept of Dalit literature has gained acceptance only over the last  two decades. But there are two contradictions inherent in it. First, it has only been accepted as a marginal literary genre, which means that some “other literature” constitutes the mainstream. Communist writers call this other literature Progressive or People’s literature. Whereas, Rajendra Yadav and all writers and supporters of Dalit literature insist that “what is not Dalit literature is ‘Savarna literature’” Thus, according to them, the mainstream Hindi literature is ‘Savarna literature’. On the other hand, the compositions of many ‘Dwij’ writers, a major part of the contents of which is dominated by their ‘Dwij’ consciousness, is also counted in Progressive literature. The second contradiction of Dalit literature is that it has been confined to the Scheduled Castes i.e. only the writings of persons born in one of the castes listed in the SC list of India’s constitution is qualified to be described as Dalit literature. This means that it is only the literature of the Atishudras, who underwent the agony of untouchability. Even the Shudras are out of its ambit.
·                   All the major movements in Hindi literature - whether it was Bhakti movement or Progressive movement or “Nayee Kahani” movement - ultimately went on to become “mainstream” literature. Does this not beg the question, despite its intellectual promise and its powerful pro-change thrust, why only Dalit literature was designated as marginal literature whilst ‘Dwij’ literature enjoyed the status of mainstream literature? Even if this does not smell of a conspiracy, shouldn’t it make  Dalit writers introspect and correct  their conceptual mistakes?
·                   The foundation of Dalit literature lies are the thoughts of Kabir, Phule and Dr. Ambedkar. Of  these , Kabir (weaver) and Jotiba Phule (gardener) were not Atishudras. They were Shudras and the communities they were born in are, today, constitutionally speaking, part of the OBC community. If we find many similarities in the writings of Kabir and Raidas can’t we comprehend the differences thereof? Similarly, if there are similarities in the thoughts of Jotiba Phule and Ambedkar, there are ample differences too. The similarity between Atishudras, Shudras, tribals and women is that they all were victims of the Brahmanical system and they all struggled against it. This similarity, in the Indian context, places their literature in the category of Bahujan literature. The dissimilarities (which are evident not only in their values but also in their literary expressions) affords them the rationale to maintain a distinct identity of their own literature (Dalit literature, OBC literature, Tribal literature).
·                   The question of the growth of the concept of Bahujan literature is, in reality, the question of the growth of criticism in Hindi literature. As we go on identifying Bahujan literature, ‘Dwij’ literature will automatically shift to the margins. Because, the majority of Hindi literature is Bahujan literature. The need of the hour is to examine our literature from all possible angles.

Wednesday, March 27, 2013

उपभोक्तावाद और परिवार


- प्रमोद रंजन


उपभोक्तावाद परिवार की सामंती संरचना पर मर्मांतक प्रहार कर रहा है। बेशक, यह ऐतिहासिक कार्य है। लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को अपवाद मानकर उपेक्षित कर देना या इतिहास को घटते हुए महज देखते रहना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में कानूनों के माध्यम से इसके दुष्‍प्रभावों को नियंत्रित किए जाने की कोशिश की जानी चाहिए। -



एक भारतीय मां ने संपत्ति के लिए जवान पुत़्र की हत्या कर दी !! पिछले दिनों पटना से निकली इस खबर को तर्कसंगत बनाने के लिए मीडिया को मां के अवैध प्रेम संबंध की तलाश करनी होगी या फिर पुत्र के दुश्चरित्र होने की उपकथा ढूंढनी होगी। ऐसा संभव न हो सका तो अखबार और टीवी चैनल संपत्ति विवाद की इस कथा को ज्यादा नहीं बेच पाएंगे। कारण? भारत में यौन शुचिता और चरित्र समानार्थी हैं। यहां किसी को बेईमान होने, धूसखोर होने, जातिवादी होने, ब्लैकमार्केटियर होने, असमानता का व्यवहार करने से या फिर हत्या करने पर भी दु चरित्र नहीं कहा जाता। अगर हत्यारी माता 'सचरित्र` पाई जाती है तो भारतीय मीडिया के पास भी इसे अपवाद मान कर मौन हो जाने के अलावा कोई चारा नहीं। लेकिन क्या यह वास्तव में अपवाद मात्र है?

भारतीय समाज मौजूदा दशक में तेजी से बदल रहा है। हालांकि यह प्रक्रिया इससे काफी पहल आरंभ हो गई थी, लेकिन सुविधा के लिए इसे १९९० के आसपास से माना जाता है। यह बदलाव प्राथमिक रूप से आर्थिक रहे हैं। आर्थिक उछाल और शिक्षा दर की बढ़ोत्तरी ने एक ऐसे तबके को निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग में ला दिया जिनके लिए इंदिरा गांधी के समय चलाए गए बड़े नोटों को देखना भी सपना रहा था। लेकिन सामंतवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़े कदमों ने भारतीय समाज की संलिष्‍ट संरचना में बाहरी तौर पर ही हस्तक्षेप किया। जातिगत वर्चस्व के समीकरण बदले, वंचित तबकों की जुबान पर भी सत्ता-स्वाद की कुछ बूंदें टपकीं। किन्तु इससे समाजिक संरचना की मूल ईकाई परिवार अप्रभावित ही रहा। पूंजीवाद जैसे बाहरी उपकरण के लिए यहां तक पहुंच पाना संभव भी नहीं था। (पूंजीवाद की ही तरह कम्यूनिज्म़ भी समाज की आंतरिक संरचना को प्रभावित करने में विफल रहता है, रूस के कम्यूनिस्ट काल में चर्च की लोकप्रियता इसका उदाहरण है) वास्तव में भारतीय संदर्भ में जिस १९९० को हम विभाजक रेखा मानते हैं वह पूंजीवाद के आगमन का नहीं बल्कि भूमंडलीकरण के कारण पूंजीवाद के तेज होने तथा उपभोक्तावाद के आगमन का काल है। यही उपभोक्तावाद अब भारतीय परिवारों के सामंती दरवाजों पर अपने जूतों से ठोकर मार रहा है। मूल्य दरक रहे हैं और अजीबो-गरीब लगने वाली घटनाएं घट रही हैं। 'सचरित्र` हत्यारिन मां या 'दु चरित्र` मटुकनाथों की अपवाद लगने वाली घटनाएं इस विध्वंस के आरंभिक संकेत हैं। उपभोक्तावाद परिवार की सामंती संरचना पर मर्मांतक प्रहार कर रहा है। बेशक, यह ऐतिहासिक कार्य है। लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को अपवाद मानकर उपेक्षित कर देना या इतिहास को घटते हुए महज देखते रहना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में कानूनों के माध्यम से इसके दु प्रभावों को नियंत्रित किए जाने की कोशिश की जानी चाहिए।


मध्यवर्ग में माता-पिता और संतान के पारंपरिक संबंध त्रासद स्थिति में पहुंचने लगे हैं। शहरों का तो निम्नमध्यवर्ग भी इससे अछूता नहीं रहा है। पूंजीवाद के आगमन के कारण सामंती जकड़न से आजाद हुई जातियों की पहली पीढ़ी के लोग भी बड़ी संख्या में इस विध्वंस के शिकार हुए हैं। बल्कि थोड़ी सी समृद्ध की पहली बरसात के साथ-साथ टेलीविजन के पर्दे से आती उद्दाम लालसाओं की आंधियों को रोक पाने की अक्षमता ने उनके साथ ही ज्यादा तोड़-फोड़ की है। एक स्थूल उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी के एकलौते बेटे ने लगभग दो वर्षों पहले अपने दाहिने हाथ पर किरोसीन छिड़क कर आग लगा ली थी। जब मैं उससे मिला तो उसने बताया कि उसकी मां ने उस पर पीटने का आरोप लगाया था। मामला कुछ इस तरह था कि उस लड़के ने मां से पच्चास रुपए मांगे थे। नहीं देने पर माता से उसकी झड़प हुई। लेकिन उसका कहना था कि उसने मां पर हाथ नहीं उठाया। कि वह ऐसा सोच भी नहीं सकता। हां, इतना जरूर था कि वह मां को उस पैसे के खर्च का हिसाब नहीं बताना चाहता था। इस पर उसका बाप अपना सिर मुंडा कर मुहल्ले (पटना सिटी) भर में यह कहता घूमता रहा कि मेरा बेटा मर गया। लड़के ने क्षोभ से भर कर उस हाथ को ही पूरी तरह नष्‍ट कर देना चाहा था जिस हाथ पर माता को पीटने का आरोप था। उसने बताया था कि उसे पैसे पत्नी के अंत:वस्‍त्रों व और गर्भनिरोधक उपायों के लिए चाहिए थे। मां को कैसे बताता? मैंने कहा, तुम खुद कुछ करते क्यों नहीं? तो उसने बताया था कि दहेज से बचे ३० हजार रुपयों से मुर्गी पालन का धंघा अपने आधा कट्ठा के मकान की छत पर आरंभ किया था। लेकिन चल नहीं सका। दहेज वाले पैसे भी पिता ने बहुत हुज्जत करने पर दिए थे। अब वे कुछ भी न देंगे। कोई पैतृक संपत्ति है नहीं। पटना शहर में बना दो कमरों का वह मकान मां के नाम है। नौकरी मिलती नहीं। मजदूरी मैं कर नहीं सकता।

जाहिर है उद्दाम लालसाओं की गिरफ्त दोनों ओर थी। कम साधन के बावजूद अधिकाधिक उपभोग की प्रवृत्ति माता-पिता में थी तो पुत्र भी अपनी आर्थिक वास्तविकता को समझने को तैयार न था। पिछले सप्ताह वह सुदर्शन युवक मुझे विक्षिप्तावस्था में मिला।

यदि किसी में शहरी बेरोजगार लड़कों से मिलने का माद्दा हो तो उसे अधिकांश जगह कमोबेश ऐसी ही कहानियां मिलेंगी। मेरी जानकारी में कम-ज्यादा ऐसी पच्चासों घटनाएं हैं। और मुझे नहीं लगता कि राजनीति, साहित्य अथवा किसी अन्य प्रकार की अकादमिक दुनिया के प्रतिभाशाली युवाओं के रूझानों के आधार पर समाज की मति-गति का आकलन करना किसी भी दृष्टि से उचित नि क र्ा की ओर ले जाएगा। अपवाद वे प्रतिभाशाली युवा हैं, बहुसंख्या इन सामान्य लोगों की है, इन्हें ही सामाजिक प्रवृति के रूप में समझा जा सकता है। इस बहुसंख्या में अर्ध-रोजगार भी शामिल हैं। तकनीक ने श्रम को बेहद सस्ता कर दिया है। महंगे से महंगे शहरों में भी १ हजार से ३ हजार तक की नौकरी करने वाले युवा हर जगह अंटे पड़े हैं। कंम्प्यूटर आपरेटर, रिसेप्निस्ट, नर्सें, सेल्स मैन, कूरियर पहुंचाने वाले, सूपरवाइजर नुमा लोग और अन्य नई सेवाओं में लगे इन युवाओं को भवि य में भी अच्छा वेतन मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। सेवा प्रदाता क्षेत्रों में श्रम लगातार और सस्ता होता जा रहा है। मीडिया में काम करते हुए मैंने देखा कि शिमला जैसे मंहगे शहर में ७० फीसदी पत्रकार १ से १.५ हजार रूपए वेतन पा रहे थे। लगभग २० फीसदी जो उत्तरांचल, बिहार और उत्तरप्रदेश से पलायन कर वहां पहुंचे थे, हाड़-तोड़ मेहनत कर ३ से ४ हजार तक पाते हुए सपरिवार गुजारा कर रहे थे। हिन्दी के जिस 'इंडियाज नं वन डेली` में मैं काम कर रहा था उसमें अनुसेवक को वर्ष २००१ में २५०० हजार रुपया वेतन दिया जाता था। उस अनुसेवक ने काम छोड़ा तो नए को १८०० पर रखा गया। २००५ आते-आते दो और अनुसेवक बदले। जब मैं वहां पहुंचा तो नया अनुसेवक ८०० रुपए पर बहाल हुआ था, वह भी 'इंटरव्यू` के बाद। शायद विश्वास न आए पर हिन्दी समाचार पत्रों में तो ऐसी स्थिति हो गई है कि मुफ्त काम करने वाले पत्रकारों को भी 'बर्खास्त` किया जाता है। यानी श्रम का मूल्य तो दूर, काम करने का अवसर देना भी अब एक अनुकंपा है। प्राय: सभी संस्थानों में ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनसे काम सीखने के नाम पर २-२ वर्ष तक मुफ्त काम करवाया जाता है। कथित रूप से काम सीखने तक टिके रहे तो वही ८००-१००० रुपए मासिक वेतन।

इस तरह के अर्ध-रोजगार लोग भी पैतृक संपत्ति पर निर्भर रहने के लिए अभिशप्त हैं। लेकिन पहली बार समृद्धि का स्वाद चखने वाले परिवारों में पैतिर्क संपत्ति नाम की कोई चीज प्राय: नहीं होती। वंचित समुदायों से आनेवाले इन लोगों ने अपनी शिक्षा से कुछ हासिल कर शहरों में एकल परिवार बसाया होता है। उत्तराधिकार कानूनों (भारतीय उत्तदाधिकार अधिनियम तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम) के तहत उनकी संतानों को महज खेती योग्य भूमि में हिस्सा मिल सकता है। जबकि इनके पास देहात में जो थोड़ी बहुत जमीन होती है, वह अक्सर पहले ही बिक चुकी होती है। अगर कुछ बची भी रह गई तो शहर के नगदी जीवन के सामने उनका कोई मोल नहीं। अगर जायज-नाजायज कुछ कमाया-बचाया भी तो उपभोग की असीम इच्छाओं के सामने खेती योग्य जमीन जोड़ने की फिक्र किसे? यह भी एक कारण है कि जहां शहरों में जमीन के भाव आसमान छू रहे हैं वहीं गांवों में आज खेत मिट्टी के भाव बिक रहे हैं । भारतीय गांवों से पैसों का शहरों की ओर आना अनवरत जारी है, शहरों से गांवों की ओर यह प्रवाह ठप है। उपभोक्तावाद ने बाहरी चमक-दमक के साथ-साथ देह और स्वास्थ तक को उपभोग के दायरे में ला दिया है। आखिर उपभोग तो इस नश्वर देह को ही करना है। और यह तभी संभव हो सकता है जब आप अधिकाधिक स्वस्थ, चिर युवा रहें। ब्यूटी पार्लर, जिम से लेकर बाबा रामदेव जैसों के धंधे इसी कारण फल-फूल रहे हैं। इन नव स्वास्थ केंद्रों में जाने वाला शायद ही कोई यह सोचता हो कि, स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्ति क का वास होता है। विज्ञापनी दुनिया उन्हें लगातार बताती रहती है कि 'स्वस्थ शरीर में मंहगे वस्‍त्राभूषण फबते हैं।` बहरहाल, अनेक कारणों से भारतीयों की औसत आयु, उनका यौवन काल बढ़ा है। निश्चित रूप से इस औसत के बढ़ने में नव मध्यम वर्ग के ही बेहतर होते स्वास्थ का योगदान रहा है। अच्छे स्वास्थ ने उनकी लालसाओं की अवधि को लंबा कर दिया है। उपभोग के उत्‍कर्ष को छूते हुए उन्हें बुढ़ापा कभी न आने वाले दु:स्वप्न की तरह लगता है, तो आश्चर्य नहीं। बुढ़ापे का पारंपरिक सहारा मानी जाती रही संतान भी उन्हें अपने तात्कालिक सुखों में कटौती करती प्रतीत होती है। भारतीय उत्तराधिकार विधान भी उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित करता है कि उनकी पूरी संपत्ति (स्वयं द्वारा अर्जित तथा संयुक्त परिवार से मिला हिस्सा भी) सिर्फ उनके उपभोग के लिए है। अपनी संतान (पुत्री अथवा पूत्र) के प्रति उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं है।

भूमंडलीकरण की तरह उपभोक्तावाद भी एक यथार्थ है। इसे किसी धार्मिक नैतिकता या भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर रोका नहीं जा सकता। न इसे अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान आदि में इस्लामिक तालिबान रोक पाए न ही भारत के हिन्दू तालिबानों में यह कुव्वत है। अक्सर मुगालते में रहने वाले कम्यूनिस्ट मित्र चाहें तो चीन घूम कर आ सकते हैं। वहां के शहरों में महज कुछ वर्ष में यूरोपिय शहरों से कहीं अधिक आलीशान मॉल, शापिंग काम्पलेक्सों ने आकार ले लिया है। जैसे समाजवाद के पूर्व पूंजीवाद का आना प्रक्रिया का हिस्सा है उसी तरह उपभोक्तावाद परिवार के आंतरिक सामंतवाद की समाप्ति में अपना ऐतिहासिक अवदान देने को उद्धत है। वस्तुत: यह कुछ और नहीं परिवार का आंतरिक 'पूंजीवाद` ही है। इसलिए जनतांत्रिक परिवार (अथवा कहें समतामूलक) के बड़े स्वप्न के संदर्भ में उपभोक्तावाद पर बात करते हुए यह आवश्यक है कि हम सिर्फ इसकी लानत-मानत करने की बजाय इसके गुण-दोषों को तटस्थता से समझें। इसके दु प्रभावों को कम करने के लिए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जो भी कानून संभव हो बनाएं। यह किसी नैतिकता के रोके नहीं रूकने वाला। इसके जिम्मे एक नया समाजशा गढ़ने की जिम्मेवारी है। इसने जहां नए मध्यवर्ग में अभिभावक और संतान के संबंधों को कटूतापूर्ण बना दिया है वहीं इस तबके की महिलाओं के लिए आर्थिक मुक्ति के द्वार भी खोले हैं। यह छोटी उपलब्धि नहीं है। यौन शुचिता संबंधी दुराग्रहों की समाप्ति की राह भी आने वाले समय में यहां से निकलेगी। दूसरी ओर, यह भी देखने की बात है कि अभिजात तबके में इसका असर कुछ अलग तरह का है। वहां इसने अभिभावक-संतान के संबंधों को मित्रतापूर्ण बनाया है। कौमार्य के बंधनों को ढीला किया है। तात्कालिक उदाहरण के तौर पर अमिताभ-जया और अभि षेक बच्चन के संबंधों तथा सलमान, विवेक ओबराय और ऐश्वर्या राय के त्रिकोणात्मक प्रेम संबधों के बाद अभि षेक बच्चन से उसकी शादी को समझा जा सकता है। पूंजीपति परिवारों के बदलावों को पेज थ्री पार्टियों का निरंतर अध्ययन करते हुए भी देखा जा सकता है। वे अब तोंदियल सेठ-सेठानियां नहीं रहे हैं। अंधानुकरण की नकारात्मक प्रवृति पर पलने वाला उपभोक्तावाद भूल वश ही सही, अनेक सकारात्मक प्रवृतियों को भी मध्यमवर्ग तक पहुंचा रहा है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

( पटना से प्रकाशित जनविकल्‍प, संपादक प्रेमकुमार मणि व प्रमोद रंजन,  के मई, 2007 अंक में प्रकाशित)