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Friday, February 14, 2014

एक और मिथक को भेदकर निकला सच

- सुरेश पंडित

मिथक रचना और उन्हें धर्म के साँचे में ढालकर अतिमानवीय स्थिति तक पहुंचाना तथा उनसे जुड़ी घटनाओं को पराभौतिक गतिविधियों के रूप में पेश करना संभवत: प्रत्येक धर्माधिकारी, पंडों, पुरोहितों की मजबूरी रहा है क्योंकि इसी विधि से वे सामान्य जन के विवेक को अपनी गिरफ्त में रखते हुए अपने व्यावसायिक हित साधते रह सकते हैं। उनके  आस्तित्त्व पर सवाल उठाना तथा उनके क्रियाकलाप की आलोचना करना व्यक्ति को धर्मद्रोही बना सकता है। यही वह डर है जो अनादिकाल से धर्म के हर अविश्वसनीय पहलू को यथावत् बनाये रखने में सफल हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि संख्या या मात्रा में चाहे जितना कम हो इस तरह के पाखंडी कर्मकांडों के विरुद्ध विवेक शील लोगों की आवाजें भी समय समय पर उठती रही हैं और उन्हें जन समर्थन भी मिलता रहा है। ज्योति राव फुले, पेरियार और अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के अनेकों मिथकों को बेदर्दी से चीर फाडक़र उनमें अन्तर्निहित सचाइयों को बेनकाब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उसी परम्परा में प्रेम कुमार मणि और राजेन्द्र यादव का नाम भी रखा जा सकता है। यादव तो बार बार यह कहते रहे हैं कि हिन्दू धर्म का सबसे अधिक नुकसान गंगा और रामायण ने किया है। सारी दुनिया की गन्दगी अपने में समेटकर बहती गंगा आज भी परम पवित्र, पतित पावनी बनी हुई है और पाप के पंक में डूबे लोगों को साफ, शुद्ध कर उन्हें मृत्यु उपरान्त मोक्ष दिलाने की गारंटी भी दे रही है। इसी तरह उस  रामायण की सर्वश्रेष्ठता भी अक्षुण्ण बनी हुई है जिसके द्वारा रची गई धर्मसत्ता व राजसत्ता के आदर्श और मर्यादा की मानसिकता सदा प्रश्नों, शंकाओं से घिरी रही है। हिन्दी के प्रमुख विचारक प्रेमकुमार मणि ने महिषासुर मर्दिनी दुर्गा की सचाई की खोज करते हुए लगभग एक दशक पहले जो लेख लिखा था वह पहले पटना के दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में फिर ‘जन विकल्प’ में और उसके बाद अक्टूबर 2011 में ‘फारवर्ड प्रेस’ मासिक में छपा था। उसी लेख पर कुछ बुद्धिजीवियों और जे एन यू के छात्रों की नजर पड़ी और उन्होंने इसका एक पोस्टर यूनिवर्सिटी में लगाया। उसमें दुर्गा को महिषासुर पर किये गये अत्याचार और नृशंस हत्या का अपराधी घोषित किया गया था। इस पर सवर्ण छात्रों की हिंसक प्रतिक्रिया हुई। लेकिन महिषासुर के पक्ष में खड़ा किया गया वह आन्दोलन अभी थमा नहीं है। उसी के बारे में विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित नौ लेेखों का संग्रह ‘महिषासुर: एक पुनर्पाठ’ नामक पुस्तक के रूप में प्रमोद रंजन ने संपादित किया है

इस पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि आखिर महिषासुर नाम से शुरू किया गया यह आन्दोलन है क्या? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके निहितार्थ क्या हैं और हम इस आन्दोलन को किस नजरिये से देखें? संपादक का मानना है कि इस आन्दोलन की महत्ता इसी में है कि यह हिन्दू धर्म की जीवन-शक्ति पर गहरी चोट करने की क्षमता रखता है। जैसे जैसे यह प्रभावी व व्यापक होता जायेगा हिन्दू धर्म द्वारा उत्पीडि़त अन्य हाशियागत सामाजिक समूह भी धर्म ग्रन्थों के पाठों का विखंडन शुरू करेंगे और अपने पाठ निर्मित करेंगे। इन पाठों के स्वर जितने तीव्र और उग्र होंगे बहुजनों की सांस्कृतिक गुलामी के बंधन उतनी ही शीघ्रता से टूटेंगे।

इस आन्दोलन के बीज प्रेम कुमार मणि के अनुसार देवासुर संग्राम में देखे जा सकते हैं। वह दरअसल द्रविड़ और आर्यों का ही संग्राम था। आर्यों का नेता इन्द्र था जो उस समय शक्ति का केन्द्र माना जाता था। आर्यों का समाज पुरुष प्रधान था इसीलिये वे मातृभूमि की जगह पितृभूमि का नमन करते थे। उन्होंने अपने समाज के विस्तार के लिये पूरब अर्थात् बंगाल और असम से अपना तालमेल बढ़ाया। वह समाज मातृ सत्तात्मक था इसलिये आर्यों ने शक्ति के रूप में दुर्गा को भी अपनी देवी मान लिया। आज भी उत्तर भारत के अधिकतर हिन्दू जिन राम, कृष्ण, शिव, हनुमान आदि देवताओं की पूजा करते हैं वे पौरुष के प्रतीक हैं। लेकिन देवी के रूप में दुर्गा काली भी अब उन्हें मान्य हो गई है। दुर्गा को स्री शक्ति का प्रतीक बनाने के लिये ही महिषासुर की कल्पना की गई और उसे इस रूप में चित्रित किया गया जिससे वह समाज का शत्रु दिखाई दे और देवी दुर्गा उसका संहार कर धर्मानुयायियों के लिये पूज्य बन जाये। लेकिन मणि के अनुसार इस कथा का शुद्ध पाठ कुछ और तरह का है-महिष अर्थात् भैंस, महिषासुर अर्थात् महिष का असुर। असुर का मतलब जो सुर नहीं है। सुर का अर्थ देवता अर्थात् वे लोग जो कोई काम नहीं करते। परजीवी होते हैं। इसके अनुसार असुर वे हुए जो काम करके पेट भरते हैं। इस तरह महिषासुर का अर्थ होता है भैंस को पालकर धन्धा करने वाले=ग्वाले=अहीर। ये भैंस पालक अहीर बंगदेश में वर्चस्व प्राप्त लोग थे और द्रविड़ थे इसलिये आर्य संस्कृति के विरोधी थे। आर्यों ने इन्हें पराजित करने के लिये दुर्गा का अनुसंधान किया। बंगदेश में वेश्यायें दुर्गा को अपने कुल का मानती थी इसीलिये आज भी दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिये वेश्याओं के घर से थोड़ी सी मिट्टी जरूर लाई/मंगाई जाती है। भैंस पालकों के नायक या सामन्त की हत्या करने में दुर्गा को नौ दिन लगे। इसी की याद में नवरात्र मनाये जाते हैं। इस तरह एक पशुपालक समुदाय के नायक का वध करने वाली दुर्गा को शक्ति की देवी की प्रतिष्ठा मिली है। यह कैसा संयोग है कि विजयादशमी का पर्व दुर्गा को महिषासुर से हुए युद्ध में मिली विजय की स्मृति में तो मनाया जाता ही है राम के रावण पर विजय पाने की याद में भी मनाया जाता है।

लेखक और नाटककार अश्विनी कुमार पंकज तो यह सगर्व घोषणा करते हैं कि वे महाप्रतापी महिषासुर के वंशज हैं इसलिये विजयादशमी या दशहरा उनके लिये खुशियां मनाने का दिन नहीं है। वे कहते हैं कि सदियों से असुरों का वध किये जाते रहने के बावजूद आज भी झारखण्ड और छत्तीसगढ के कुछ इलाकों में असुरों का अस्तित्त्व बना हुआ है। लेकिन वे असुर किसी भी कोण से देखने पर राक्षस जैसे दिखाई नहीं देते। भारत सरकार ने इन्हें आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा है। अभी तक वे विकास के हाशिये पर हैं। 1981 की जनगणना के अनुसार उनकी कुल जनसंख्या 9100 थी जो वर्ष 2003 में घटकर 7793 रह गई जबकि आज की तारीख में छत्तीसगढ़ में उनकी कुल संख्या 301 मात्र है। कारपोरेट निगम जिस धरती पर ये असुर विचरते हैं उसके नीचे से बॉक्साइट निकालने को उतावले हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के निवासी अगरियां जाति के लोगों को भी को भी वैरियर आल्विन ने असुरों की श्रेणी में दिखाया है। जलपाईगुड़ी जिले के अलीपुर द्वार स्टेशन के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाले दहारू असुर कहते हैं कि महिषासुर दोनों लोकों अर्थात् स्वर्ग और पृथ्वी पर सबसे अधिक शक्तिशाली थे। देवताओं को लगता था कि जब तक ये जीवित रहेंगे उनको महत्त्व नहीं मिलेगा। इसीलिये उन्होंने दुर्गा के नेतृत्त्व में महिषासुर को ही नहीं उनके सहचरों को भी मार डाला और उनके गले काटकर एक मुंडमाला बनाई और दुर्गा को पहना दी। चित्रों में दुर्गा को महिषासुर की छाती पर चढ़े रौद्र रूप में ही दिखलाया जाता है।

अधिकतर आदिवासी रावण को भी अपना पूर्वज मानते हैं। दक्षिण के अनेक द्रविड़ समुदायों में रावण का पूजन आज भी किया जाता है। झारखण्ड और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में तो बाकायदा नवरात्र अर्थात् दशहरे पर रावणोत्सव मनाया जाता है। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन आज भी रावण को अपना कुल गुरू मानते हैं।

‘इन्डिया टुडे’ हिन्दी के संपादक दिलीप मंडल  इसी प्रसंग में यह सवाल उठाते हैं कि क्या धार्मिक ग्रन्थों की वैकल्पिक व्याख्या नहीं की जा सकती? सचाई यह है कि इसी पद्धति से उनमें वर्णित चरित्रों और घटनाओं के नये नये पहलू सामने आ सकते हैं और इससे वैज्ञानिक चिन्तन को बढ़ावा मिल सकता है। प्राचीन काल में शास्त्रों की व्याख्याओं को लेकर जो शास्त्रार्थ होते थे उन्होंने ही हिन्दू धर्म के अनेकों मतों, पन्थों, समुदायों और विचार परम्पराओं को जन्म दिया था। लेकिन जैसे जैसे समाज ज्ञान और विज्ञान से अधिक समृद्ध होता गया है लोगों की मानसिकता संकीर्ण होती गई है। उन्हें जो पाठ जिस तरह समझाया गया है वे उसी रूप में उसे अपनाना चाहते हैं। न स्वयं कोई नवीन चिन्तन करते हैं तथा न दूसरों के नये विचारों को अपनाने के लिये अपने मस्तिष्क के खिडक़ी दरवाजे खोलते हैं। वास्तव में पुनर्पाठ की प्रक्रिया तो लोकतांत्रिक विचार पद्धति को जीवन्त रखती है और उसे समृद्ध बनाती है। वे इस प्रसंग में फुले की कालजयी कृति ‘गुलाम गीरी’ और अम्बेडकर की ‘रिडल्ज आफ हिन्दूइज्म’ के उदाहरण सामने रखते है। फुले के अनुसार हिन्दुओं के धर्म ग्रन्थ ब्राह्मण पुरोहितों ने अपने हितों के संरक्षण के लिये निर्मित किये हैं और उन पर नई व्याख्याओं का इसलिये वे विरोध करते हैं ताकि समाज पर उनकी पकड़ बदस्तूर बनी रहें।

जे एन यू में आल इन्डिया बैकवर्ड स्टूडेन्ट्स फोरम द्वारा वर्ष 2011 में महिषासुर शहादत दिवस मनाने से देशभर में  एक नई बहस शुरू हुई। पूरी निर्भीकता के साथ अब यह प्रश्न किया जाने लगा है कि यदि दुर्गा इतनी बलशालिनी थी तो उसने गोरी, गजनी, बाबर, हिटलर जैसे लोगों का वध क्यों नहीं किया? जिस महिषासुर को एक ऐसे नृशंस राक्षस के रूप में चित्रित किया गया है जो लोगों को भयभीत व आतंकित करने वाला था वह वास्तव में इसी देश का सामान्य नागरिक था जो स्वभाव से हिंसा विरोधी और प्रकृति पूजक था। उसे असुर बताकर मारा गया। जबकि स्वयं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कष्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र ने जनवरी 2011 में अपने एक निर्णय मे कहा था- ‘राक्षस और असुर कहे जाने वाले लोग ही इस देश के मूल नागरिक हैं।’ अन्य विद्वानों का भी मत है कि असुर आर्यों से श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे सुरा-शराब का सेवन नहीं करते। ब्राह्मणवादी ग्रन्थों के अनुसार यज्ञ विरोधी महिषासुर के पिता रंभासुर असुरों के राजा थे तथा उनकी माँ का नाम श्यामला राजकुमारी था। इस देश के मूल निवासी जिन्हें आर्यों ने साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी की सभ्यता को नष्ट कर हजारों वर्ष चले युद्ध में छल, कपट से परास्त कर असुर, अछूत, शुद्र, राक्षस आदि बनाकर समााजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर एवं गुलाम बना लिया था उनके नायकों की हत्या कर उन्हें असुर व राक्षस घोषित कर दिया गया। कहा जाता है कि महिषासुर इतना पराक्रमी राजा था कि उसने देवताओं के राजा इन्द्र को भी युद्ध में परास्त कर दिया था, ऐसे राजा का वध करवाने के लिये देवताओं ने दुर्गा को भेज कर इस काम को सम्पन्न करवाया था। उधर लेखक जितेन्द्र यादव का कहना है कि पिछड़ी जाति बहुल उनके गांव में महिषासुर जैसी कद-काठी के तो कई व्यक्ति आज भी देखने को मिल जाते हैं पर दुर्गा जैसी कोई महिला कभी दिखाई नहीं दी है। ये जितेन्द्र यादव वही महानुभाव हैं जिन्हें जे एन यू के प्रशासन ने ‘महिषासुर का सच’ पर विमर्श के लिये परिसर में गोष्ठी आयोजित करने और पोस्टर लगा कर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में नोटिस थमाया था और बाद में देशभर के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बढ़ते विरोध प्रदर्शन के कारण क्षमा याचना करते हुए वह नोटिस वापिस ले लिया था। 2011 से यह आन्दोलन चालू है और सन् 2013 में देश के लगभग 60 नगरों में इसका आयोजन हुआ है जो इसको मान्यता मिलते जाने का प्रमाण है।

दरअसल इतिहास का कथ्य किसी ऐसे सत्य को प्रकट नहीं करता जिस पर पुनर्विचार किया ही नहीं जा सकता। हर पीढी अपने अर्जित ज्ञान और संचित अनुभवों के आधार पर अपना इतिहास निर्मित करती है। इस प्रक्रिया में अक्सर पूर्व में प्रतिष्ठित नायक खलनायक बन जाते हैं और खलनायक सम्मान के पात्र। जिन असुरों व राक्षसों को मानवता के शत्रु के रूप में निन्दनीय बनाया जाता है वे देश के मूल निवासी के रूप में सामने आते हैं और अपनी पहचान स्थापित करने के लिये अपनी गाथा स्वयं लिखने को तत्पर हो जाते हैं। महिषासुर की एक अमर शहीद के रूप में प्रतिष्ठा आदिवासी संस्कृति के पुनरोदय का परिचायक है। हो सकता है प्रचलित इतिहास के उत्खनन से ऐसे और महानायक सामने आयें जो मनुवादी पूर्वाग्रहों के शिकार हुए हों इसलिये उन्हें अब तक ध्यान देने योग्य समझा ही नहीं गया हो।

संपर्क : सुरेश पंडित 383 स्कीम नं. 2, लाजपत नगर, अलवर - 301001, मो. 8058725639

पुस्तक का नाम :  महिषासुर : एक पुनर्पाठ,
संपादक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : आल इन्डिया बैकवर्ड स्टूडेन्ट्स फोरम, जे एन यू, नई दिल्ली
मूल्य :  30 रुपये

Saturday, April 20, 2013

मीडिया में हिस्सेदारी के गम्भीर सवाल

(पुस्तिका 'मीडिया में हिस्‍सेदारी की यह समीक्षा इंडिया टुडे, हिंदी के 11 नवंबर, 2009 अंक में छपी है। पत्रिका में इसका आरंभिक हिस्‍सा संपादित हो गया है। यहां मूल रूप में) 

मीडिया में हिस्सेदारी के गम्भीर सवाल

- राजकुमार राकेश 

मीडिया में जातिगत हिस्सेदारी का सवाल एक विशुद्ध समाजशास्त्रीय अध्ययन है क्योंकि यह सीधे तौर पर इस राष्‍ट्र की सामाजिक चेतना, इसके लोकतन्त्र और कमजोर तबकों के सशक्तीकरण से अंर्न्तगुंफित है। शायद इसीलिए जब भी ऐसी कोशिश की जाएगी तो उसे खारिज करने वाले भी कम नहीं होंगें, विशेष तौर पर वे लोग जिनके वर्गहितों से उनका सीधा टकराव होगा।
भारतीय समाज में वर्ग की अवधारणा आर्थिक स्थापनाओं से अलग नहीं हो पाई है। उसके पुरोधा शायद इस सच्चाई से साक्षात्कार करना भूल गए कि यह एकदम वैसी अवधारणा नहीं ही हो सकती थी जो युरोपीय समाज में एक समय में जन्मी और विकसित हुई थी। वे अपने वर्गसमाज में इस सच्चाई को शामिल न करने की भूल कर बैठे कि भारतीय समाज जातिगत आधार पर इस कदर बंटा हुआ है तथा उसके बाहर जिस भी वर्ग समाज की बात की जाएगी वह महज अधूरी अवधारणाओं का द्योतक होगा। इस समाज की बुनाबट में अर्न्तनिहित वर्ग विभेद हर बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है और उसके अवचेतन में इस कदर खुंब आता है कि आजीवन यह उसकी सोच, संवेदन और अभिव्यक्तियों में केवल पदार्थीय रूप में ही नहीं, बल्कि उसके गहन अवचेतन में परिलक्षित होता चलता है। नतीजन ऊंची जातियों में पैदा हुए प्रगतिशील और खुद को हमेशा ज्यातिच्युत करने के आग्रही लोग तक अपने अवचेतन में शायद ही अपनी जातिगत चेतना से मुक्त हो पाते हैं। इसलिए इस तर्क में दम है कि अपने शोषण और सामाजिक पीड़ाओं की असल और सही अभिव्यक्ति वही व्यक्ति कर सकता है जिसने आजन्म वे पीड़ाएं अपने शरीर और आत्मा पर भोगी हैं। उनसे बाहर की जातियों के सदस्य अगर अब उनके शोषक नहीं भी रहे मान लिए जाएं, तो भी वे केवल सहानभूति ही जता सकते हैं तथा दलित पीड़ाओं पर शास्त्रीय विमर्श कर सकते हैं, लेकिन उनकी भोगी गई पीड़ाओं को सही अभिव्यक्ति नहीं दे सकते।
यह अकारण नहीं था कि इस देश को राजनैतिक आजादी प्राप्त होने के तत्काल बाद भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर आंबेडकर ने तंज किया था कि वे कुछ ब्राह्मण युवकों का टोला हैं। 
भारतीय समाज में वर्ग संघर्ष की कुल अवधारणा से जातियों के अस्तित्व का नकार एक ऐतिहासिक भूल थी जिस ओर दरअसल आंबेडकर संकेत कर रहे थे। और इस समाज की आज की स्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस भूल का निराकरण होने में बहुत वक्त लगेगा। समाज का कोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। पत्रकारिता जैसा क्षेत्र, जो लोकतन्त्र और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण खम्बा कहा जाता है, इस बीमारी से किस कदर ओतप्रोत है, प्रमोद रंजन की पुस्तिका 'मीडिया में हिस्सेदारी` उसी का समाजशास्त्रीय अध्ययन है।
तो इस समाज में जहां हर ऊंची जाति के व्यक्ति के दिमाग में जातिगत अंहकार और जातिगत हित इस कदर खुबे हों जिनके चलते वह बाहर कुछ देख पाने की क्षमता खो चुका हो, वहां पत्रकारिता जैसे पेशे के सामाजिक अध्ययन का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। प्रमोद रंजन के तर्कों से असहमत होना मुश्किल है। समाज में जाति का होना जितना खतरनाक है उससे भी ज्यादा खतरनाक है जातिगत मानसिकता, इस पर शोध की मानसिक प्रक्रिया के दौरान ही वे पूर्वग्रह से भरे इस समाज में एक आवाजहीन युद्ध से जा टकराते हैं। उनके सामने एक ऐसा अंधा समाज है जो हर समाचार को वस्तुनिष्‍ठ ढंग से देख पाने की नजर से वंचित कर दिया गया है।
प्रमोद रंजन इसी अंधत्व की प्रमाणिकता के लिए बिहारी मीडिया का शोध करते हुए इस डरावने निष्‍कर्ष पर पंहुचते हैं कि इस मीडिया पर ७३ प्रतिशत उच्च जाति हिन्दू मर्दों का कब्जा यहां सामान्य पदों पर ही है जबकि बिहार की कुल आबादी में उच्‍च जाति हिन्दुओं का कुल प्रतिशत महज तेरह है। इसके आगे निर्णय करने की क्षमता वाले पहले पॉंच पद तकरीबन सभी अखबारों में ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहारों से भरे पड़े हैं। सामान्य पदों पर दलित जातियों के लोग महज एक प्रतिशत, पिछड़ी जातियों के १० प्रतिशत, अशराफ मुसलमान १२ प्रतिशत, पसमांदा मुसलमान ४ प्रतिशत और महिलाओं की भागीदारी महज ४ प्रतिशत है जिनमें भी कोई भी दलित महिला नहीं है।
जातियों के इस चक्रव्यूह का नतीजा उन्होंने २००८ में कोसी की बाढ़ के दौरान महसूस किया था जब यादव और दूसरी दलित जातियों के गढ़ में आए भंयकर प्रलय के दौरान बिहार सरकार की निष्‍ि क्रयता का नोटिस लेने और बाकी के संसार तक इस सच्चाई को पंहुचाने की बजाए पत्रकारों में सरकार की तारीफ करने की होड़ मच गई थी। बहुत हद तक वे इसे पिछड़ों की राजनीति की नासमझी का परिणाम भी मानने को विवश हैं।
इस श्रृंखला में 'विश्वास का धंधा` नामक आलेख पत्रकारिता की उस नकारात्मक और निन्दनीय प्रवृति से जुड़ा है जिसके चलते चुनावों के दौरान प्रत्याशियों के पक्ष में खबरें उनसे पैसे लेकर बनाई और परोसी जाती रही हैं। यह जनमानस को गुमराह करने का ही धंधा नहीं है बल्कि पत्रकारिता के किसी भी मानदंड की ज्यामिती से भी निंदनीय है। प्रमोद रंजन जनता को दिगभ्रमित करने वाले इन खबरी पैकजों से भी आगे उस द्विज बर्चस्व की खबर लेते हैं जिसके चलते पत्रकारिता में इस तरह के अमानवीय विचलन देखे जाने लगे हैं। इतना ही नहीं यह मित्रधर्म और उससे भी आगे जातिधर्म से जुड़ा फंडा है इसलिए खबरों की उस पैकेज संस्कृति से भी ज्यादा खतरनाक है। प्रमोद के शोध में एक बहुमूल्य निष्‍कर्ष यह भी है कि भारतीय पत्रकारिता के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में सिवाय तकनीक के कोई परिवर्तन लक्षित नहीं किया जा सकता क्योंकि हमेशा ही से उसपर ब्राह्मणवाद की मानसिकता हावी रही है जो यथास्थिति की पोषक है। इससे भी आगे आज जो नया ब्राह्मणवाद पसर रहा है उसके पीछे इसी तकनीक का कमाल है। यानी चीज़ें जितना बदलती हुई दिख रही हैं उतना ही वे अपने मूल रूप में बनती चली जा रही हैं।
शोधकर्ता ने इस दुबले पतले से दिखने वाले इस काम में बहुत सी चीजों पर से नकाब हटाए हैं, जैसे आखिर खबर है क्या, फ्री प्रैस के भुलावे से जनता कैसे अनभिज्ञ बनी रहती है, मित्रधर्म और जातिधर्म के इस निर्वाह के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी कहां और कैसे पानी भरती रह जाती है, पढ़ने के चयन पर कैसे ताले आयत होते हैं, एक ही सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्‍ठभूमि वाले लोगों के बर्चस्व ने पत्रकारिता के स्वरूप को किस कदर एकांगी बना दिया है और अनन्तिम, कि कैसे कैसे चोलियां और दामन आपस में गुत्थमगुत्था होते चलते हैं। बहुत कुछ है जो सामान्य जन को सूचित ही नहीं करता उससे अपना ज्ञान बढ़ा कर आगे बढ़ने और इस व्यवस्था को बदलकर समग्र हिस्सेदारी की व्यवस्था बनाए जाने की ललकार भी लगाता है। पर फिर सवाल वही है कि यह कैसे मुमकिन होगा और इसका जवाब तलाशने की हर कोशिश ही सही जवाब होगा।

मीडिया में हिस्सेदारी : प्रमोद रंजन

मीडिया का स्टिंग आपरेशन


समीक्षा
-प्रमोद रंजन की पुस्तक ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ मीडिया पर किये गये सर्वे पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि वर्तमान समय में मीडिया में चयन का आधार गुणवत्ता अथवा बौद्धिकता नहीं है। अब उम्मीदवार के चयन का आधार यह है कि ऊंची जाति से संबंध रखता है या निम्न जाति से।
पुस्तक को पढ़कर पता चलता है कि बिहार के हिंदी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के पत्रकारों में 87 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण हिंदू हैं। इनमें 34 फीसदी ब्राह्मण, 23 फीसदी राजपूत, 14 फीसदी भूमिहार तथा 16 फीसदी कायस्थ हैं। मुसलमान और दलित समाज से आने वाले पत्रकार मात्र 13 फीसदी ही है।
इसके अलावा यह भी बताया गया है कि समाचार-पत्र और न्यूज चैनल पैसे लेकर खबरें छापते या दिखाते हैं। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने कई उदाहरण भी दिये हैं।मीडिया और राजनीति के संबंधों  का उदाहरण के साथ खुलासा करते हुए पुस्तक में बताया गया है कि किस तरह मीडिया पर राजनीतिक प्रभाव छाया हुआ है।यह पुस्तक ही नहीं बल्कि मीडिया का स्टिंग आपरेशन है जो मीडिया जगत की कटु सच्चाइयों से पाठक को परिचित कराता है।पुस्तक में भारत में मीडिया का आरंभ, उद्देश्य, कार्यों तथा बदलते परिवेश में उसके बदलते रूप का समीक्षात्मक बौद्धिक वर्णन मिलता है। पत्रकारिता एवं राजनीति में रूचि रखनेवाले व्यक्तियों के लिये यह पुस्तक महत्वपूर्ण है।
पुस्तक : मीडिया में हिस्सेदारी
लेखक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : प्रज्ञा सामाजिक शोध संस्थान,
कुम्हरार, पोस्ट- बहादुरपुर, पटना
मूल्य  : 25 रुपये
पृष्ठ   : 36
(भारतीय पक्ष में प्रकाशित) 

Wednesday, March 27, 2013

जन विकल्‍प : बहुजन नजरिये से महत्‍वपूर्ण मासिक पत्रिका

- मुसाफिर बैठाप्रभात खबर, पटना  के  13 फरवरी, 2007 अंक में प्रकाशित 

प्रेमकुमार मणि एवं प्रमोद रंजन के संयुक्त संपादकत्व में जन विकल्प नाम से सामाजिक चेतना की पक्षधर एक वैचारिक मासिक पत्रिका का पटना से प्रकाशन गंभीरमना पाठकों के लिए एक अच्छी खबर है। पत्रिका के अब तक प्रकाशित दो अंकों, प्रवेशांक (जनवरी०७तथा फरवरी०७ की सामग्री से आश्‍वस्ति मिलती है कि यदि पत्रिका सतत निकलती रही तो अलग पहचान बना सकेगी। इसकी अधिकांश सामग्री बहुजन नजरिये से बनी है। और वस्‍तुनिष्‍ठ व तार्किक-वैज्ञानिक सोच की आग्रही है। संपादकीय में प्रेमकुमार मणि ने भारतीय राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनतंत्र के क्षरण पर चिंता व्यक्त की है। देशकाल स्तंभ के आलेख अंक की रीढ हैं। अनिलचमड़िया के आलेख 'सामाजिक न्याय की सत्ता-संस्कृति` में सामाजिक न्याय की राजनीति के खेल को उघाड़ा गया है। अभय मोर्य ने 'एक नायक का पतन` के जरिये जार्ज फर्नांडीज के विद्रोही नायक के समझौतापरस्त व विरोधभासी चरित्र के राजनेता में तब्दील हो जाने की विडंबना की कथा कही है। प्रवेशांक में पत्रिका के संपादकद्वय में से एक, प्रमोद रंजन की कवि अरुण कमल से बातचीत भी विचारोत्तेजक है। प्रश्नकर्ता के सूझबूझ भरे प्रश्नों पर कहीं-कहीं अरुण कमल का जवाब राजनेताओं के जवाब-सा गोलमटोल, तो कहीं एकदम 'गोल` हो गया है। कंवल भारती का आलेख 'बहुजन नजरिए से 1857 का विद्रोह ' गवेषणात्‍मक अध्ययन पर आधारित एवं सबऑल्टर्न दृष्टि से लैस है। यह उक्त विद्रोह की स्थापित धारणा को सिरे से खंडित करता है। इस लेख के साथ की गयी संपादकीय टिप्पणी इस विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तो मानती है पर महज इस अर्थ में कि इंग्लैंड के अशराफ तबके द्वारा भारत के अशराफ तबके से किया गया सीमित समझौता भर था, जिसके तहत भारत में समाज सुधारों से अंगरेजों ने अपना हाथ खींच लिया थहा। अध्ययन कक्ष स्तंभ के तहत राजू रंजन प्रसाद का शोधआलेख 'प्राचीन भारत में वर्णव्यवस्था और भाषा` सम्मिलित है। यहां वर्ण और भाषा की भेदक विभिन्नता में ब्रह्मणवादी, सामंती मानस की छल-कपट बदबूदार संस्कृति के आमद के रूप में उभर कर सामने आती है। इस अंक में 'पुस्तक चर्चा` के अंतर्गत मुशरर्फआलम जौकी का लेख तथा 'अन्यान्य` के अंतर्गत् फजल इमाम मल्लिक का लेख भी पठनीय है। राजकुमार राकेश के 'आलोचनात्मक शीर्षक को भी कोई गंभीर पाठक पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। प्रवेशां मे मैथिली कवि जीवकांत की चारमैथिली (कवि द्वारा ही अनुदित) कवितायें हैं। इनमें 'सूखे पत्ते ढेर` में अच्छी भाव-व्यंजना है। 'नकली` और अग्नि प्रलय` शीर्षक कविताएं सामान्य हैं, जबकि 'शहर में` कविता का अंतिम अंतरा अटपटा व भ्रामक है। मसलन कविता की अंतिम तीन पंक्तियों , पुराने, विधि-व्यवाहर/पुराने लोकाचार/संस्कृति व धार्मिक कर्मकांड व बासी व तेबासी होकर फेंके जा रहे।` इस कवि सत्य के उलट सांस्कृति धार्मिक आडंबर का प्रकोप महामारी की तरह हमारे आधुनिक होते शहरी समाज को ग्रस ही रहा है। जीवकांत की इन कविताओं के अतिरिक्त 'जनविकल्प` के पहले अंक के साथ कविता पुस्तिक 'यवन की परी` भी जारी की गयी है। इसमें अरब की एक ऐसी कवयित्री 'परी` की कविता दर्ज है, जिसने पागलखाने में आत्महत्या कर ली। त्रिवेंद्रम की रति सक्सेना के सौजन्य से उपलब्ध यह कविता भी विमर्श व विश्व राजनीति को संवेदनशील ढंग से परिभाषित है।

'जनविकल्प` का फरवरी अंक भी खासा विचारोत्तेजक है। विख्यात इतिहासकार विपिनचंद्र ने रोहित प्रकाश से बातचीत में जहां १८५७ के विद्रारेह को पारंपरिक नजरिये से देखा हे, वहीं भगत सिंह पर उनके दृष्टिटकोण में नयापन है। उन्होंने भूमंडलीकरण को आवश्यक बताते हुए इसका विरोध करनेवालों को 'महा बेवकूफ ` करार दिया है। जाहिर है नामचीन मार्क्सवादी इतिहाकसकार की ऐसी टिप्पणी कई विवादों को जन्म दे सकती है। अपने लंबे आलेख 'धर्म की आलोचना कीआलोचनामें युवा समाजकर्मी अशोक यादव भारत में प्रचलित धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यर्थाथपरक निष्‍कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिंदू धर्म सबसे अमानवीय धर्म है।
संपादकीय के तहत प्रेम कुमार मणि ने एक ओर पिछले दिनों पटना में संपन्न ग्लोबल मीट को 'अपर कास्ट मीट` बताया है, वहीं यह भी कहा है कि नीतीश कुमार के सोच में सामाजिक न्याय का पुट होता है। उन्होंने बिहार के विकास के संदर्भ में 'बेयर फुट कैपिटलिज्म` (नंगे पांव पूंजीवाद) की प्रस्तावना की है। साहित्य अकादमी पुरस्कार के उपलक्ष्य में ज्ञानेंद्रपतिकी कविताओं का 'समकालीन कविता` के संपादक विनय कुमार द्वारा चयन प्रतिनिधिपरक है। कुछ ३२ पृष्‍ठों की यह दसटकिया पत्रिका अखबारी कागज पर मुद्रित है। सो इस वैचारिक पत्रिका के प्रकाशकों को मूल्य और कागज पर पुनर्विचार करना चाहिए।