Showing posts with label Report. Show all posts
Showing posts with label Report. Show all posts

Sunday, May 11, 2014

Friends, Dalit daughters of Bhagana are still waiting to be heard at Jantar-Mantar

Afraid of Haryana’s Jat politics?
Friends, Dalit daughters of Bhagana are still waiting to be heard at Jantar-Mantar

The men, women and children of 100-odd poor, Dalit families of Bhagana have staged a sit-in at Delhi’s Jantar-Mantar since 14 April. Can you guess what must have prompted them to travel all the way to Delhi? They thought that the media of the national capital would lend its ears to their pain, secure justice for them. They had heard about the Nirbhaya incident. They thought that they would not get justice till they reach Delhi. That is why they also brought their four teenage daughters, who were victims of gang- rape, with them. Just spare a thought for the women of their families – the mental trauma they must be going through, as the girls are not allowed to leave their homes without covering their faces. And here, they are sitting in public, as if they are part of an exhibition!
I know, my journalist friends born in upper-caste families would insist that they never ignored the sit-in. The protestors were given coverage in proportion to their numbers. But my friend, does your responsibility end here? Should only the size of the crowd and its saleability be the determinants of the space a news story will get in the media? Does the media not have an additional moral responsibility towards the deprived sections of society? Can you put your hand on your heart and say that on the first day of Anna agitation, the number of people present at the venue qualified it for the massive nationwide coverage it got? Was the number of those who lit candles in memory of Nirbhaya more than the number of Bhagana protestors? In 2012, at the same Jantar-Mantar, just next to the Anna Hazare protestors, sat hundreds of Dalit-OBCs who were victims of social boycott in their villages. But the media took no notice of them. Needless to say, had the media given them adequate coverage then, these gang rapes would not have happened.
When the Bhagana protestors did not get any coverage for four days, they thought that maybe, Nirbhaya got justice because of the protest by JNU students. They reached the JNU campus on 19 April and begged the students to take up their cause. On 22 April, JNU Students’ Union (JNUSU) held a big demonstration at Jantar-Mantar and in front of the Haryana Bhawan. But what happened? Aaj Tak, ABP News and NDTV were nowhere to be seen. All were informed but only the representatives of local TV channels of Haryana turned up and they only broke the morale of the protestors by announcing their boycott of the sit-in! The same evening, they telephoned the demonstrators to tell them that they were not boycotting the demonstration and that visuals of the demonstration would be aired. That probably was a face-saving move because the news of the boycott had been posted on the widely read Bhadas for media and other websites.
Friends, this is the season of elections. Haryana is being ruled by a Congress government. Socially boycotted by the Jats, the Chamars and Kumhars of Bhagana have been forced to live outside their villages for more than two years. The members of the Dhanuk caste did not leave their villages despite the boycott. The four girls, two of whom are sisters, are from Dhanuk families. After being abducted together on 23 March, for two days, a dozen men gang-raped them. This was the horrific punishment for not complying with the diktat for boycott. FIRs were lodged, statements under section 164 of the CrPC recorded, medical examination done. Everything is on record. In this situation, was it not your duty to ask top Congress leaders how the Dalit-OBCs were being treated under the party’s rule? Should you not have asked them on what basis are they seeking the votes of the Dalits and OBCs? Shouldn’t you not have asked the BJP leaders, tom-tomming Modi’s OBC credentials, why they have been ignoring the series of incidents of rapes of Dalit and OBC girls in Haryana for the past four-five years and why their politics is still centred on the appeasement of Jats?
Bhai, at least now you can tell us who is the aam aadmi?” – you could have well asked Arvind Kerjriwal. Incidentally, Kejriwal hails from Hisar district and both Bhagana and Mirchpur are in Hisar. Have you ever seen AAP raising any issue related to the Dalits of Haryana? And, mind you, Yogendra Yadav, AAP’s probable chief ministerial candidate for Haryana, has been repeating ad nauseum that in Delhi, the party got the highest number of votes from areas where the poor, the Dalits and the OBCs reside in sizeable numbers. Why don’t you ask him if this was how AAP was rewarding the Dalit-OBCs for voting for the party? Why hasn’t a single MLA from AAP, which usually launches agitations at the drop of a hat, cared to visit Jantar-Mantar? Why did AAP’s socialist professor, Anand Kumar, not attend the meeting convened at JNU on 19 April to get justice for these girls, even though he was invited and was on campus at the time?
Friends, there is still time. Bhagana’s Dalit daughters are still waiting to be heard by you at Jantar-Mantar.

MEDIA ANALYSIS, Forward Press, JUNE 2014

Thursday, May 08, 2014

हरियाणा का दलित आंदोलन और वेदपाल तंवर

 - प्रमोद रंजन

पिछले महीने हरियाणा की राजनीति में उफान लाने वाली दो घटनाएं हुईं. 5 अगस्त को प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन उर्फ चांद मोहम्मद की पत्नी रहीं अनुराधा बाली उर्फ फिजा की लाश मिली और इसी दिन राज्यमंत्री गोपाल कांडा के एयरलाइंस में काम करने वाली गीतिका शर्मा ने मंत्री पर प्रताडना का आरोप लगाते हुए खुदकुशी कर ली. जाट वर्चस्व वाले हरियाणा में इन दोनों मामलों में शक की सूई गैरजाट नेताओं चंद्रमोहन विश्नोई (विश्नोई)  गोपाल कांडा (सोनार) की ओर रही. मीडिया को दौलत, सत्ता और सेक्स के संबंधों को खंगालने का खूब मौका मिला. यह उचित भी था, आखिर जो बिकेगा, वही तो दिखेगा!
लेकिन उत्तर भारत का मीडिया इतनी सीधी और सरल रेखा पर नहीं चलता.

इसी दौरान हरियाणा में एक और बडी हलचल चल रही थी, जिसके कारण सूबे के सत्ता संस्थानों में भारी खलबली थी. हिसार से महज 19 किलोमीटर दूर स्थित भगाना गांव के दलितों ने जाटों के खिलाफ विद्रोह का आगाज कर दिया था. सामाजिक वहिष्कार का विरोध करते हुए वे हिसार स्थित उपायुक्त कार्यालय तथा दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंच गये थे. (देखें, फारवर्ड प्रेस, अगस्त,2012 की कवर स्टोरी ‘हरियाणा में दलित दमन’) और लगभग दो महीने से उन्होंने हरियाणा सरकार की नाक में दम कर रखा था. फिजा और गीतिका शर्मा की मौत के दिनों में भी उनका आंदोलन जारी था लेकिन मीडिया को इसकी सुध न थी. आंदोलनकारी परिवार हिसार उपायुक्त कार्यालय में अपने गाय, गोरूओं, घोड़ों के साथ जमे थे जबकि दिल्ली के जंतर-मंतर पर अर्धनग्न होकर प्रदर्शन कर रहे थे. 21 वीं सदी में जाति आधारित दमन की इस खबर के लिए बड़ा बाजार मौजूद था लेकिन खबरों के दुकानदारों को इसे बेचने में कोई रूचि नहीं थी.

अंततः हरियाणा के इस दलित आंदोलन का पटाक्षेप एक राजपूत वेदपाल तंवर की गिरफ्तारी से हुआ.यह पिछले एक महीने में हरियाणा की राजनीतिक दृष्टि से तीसरी बड़ी घटना थी. लेकिन इसे मीडिया की नजरों से तो ओझल रहना ही था, जब दलितों के आंदोलन में ही मीडिया की कोई रूचि नहीं थी तो भला इस आंदोलन की हिमायत कर रहे व्यक्ति की उसके लिए क्या अहमियत हो सकती थी?

वेदपाल सिंह तंवर से मेरा परिचय मई, 2012 में उस समय हुआ था, जब मैं तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह के उम्र विवाद पर कवर स्टोरी (देखें, फारवर्ड प्रेस, जून,2012 ‘सेना के भीतर युद्ध’)पर काम कर रहा था. उस समय तंवर का फोन नंबर देते हुए हरियाणा के मेरे एक सीनियर पत्रकार साथी ने बताया था कि ‘वीके सिंह के पक्ष में जो राजपूत रैलियां हो रही हैं, उसका कर्ताधर्ता यही हैं’. इस बीच सेना के कुछ बड़े अधिकारियों से मेरी बात हो चुकी थी और मैं इस निर्णय पर पहुंच चुका था कि वीके सिंह विवाद वास्तव में ब्राह्मण-राजपूत संघर्ष की ही एक कडी है, जिसमें एक ओर रक्षा मंत्रालय पर काबिज ब्राह्मण लॉबी है तो दूसरी ओर वीके सिंह व उनके कुछ विश्वस्त राजपूत, गैर ब्राह्मण व गैर खत्री-सिख सेना-सरदार. (हाल के दिनों में सेना प्रमुख बनने के बाद सिख जनरल विक्रम सिंह द्वारा वीके सिंह के विश्वस्तों को उनके पदों से हटाने तथा उनके विरोधियों पर कृपा बरसाने से यह बात और साफ हो गयी है. दूसरी ओर वीके सिंह ने अन्ना के मंच से पूर्व सैनिकों का देश की कमान संभालने के लिए आह्वान करके अपनी राजनीतिक मंशा का भी संकेत कर दिया है.)

बहरहाल, ‘राजपूत संघर्ष समिति के संयोजक कुंवर वेदपाल तंवर’ में मेरी क्या दिलचस्पी हो सकती थी? इसलिए फोन पर बातचीत में मैंने उनसे वीके सिंह के पक्ष में हिसार और भिवानी में आयोजित राजपूत रैलियों के फोटोग्राफ चाहे, जिनसे मेरी रिपोर्ट के उपरोक्त तथ्य स्थापित होते थे.

तंवर ने बताया कि ‘फोटोग्राफ मेरे इमेल पर हैं’. मैंने तस्वीरें फारवर्ड कर देने की गुजारिश की तो उन्होंने जबाब में एक मोबाइल फोन का नंबर दे डाला. मैंने पूछा क्या इस नंबर पर फोन करके मुझे तस्वीर मांगनी है तो उन्होंने कहा कि नहीं यह मेरे इमेल का पासवर्ड है. मैं इंटरनेट नहीं चलाता, आप मेरे ईमेल से तस्वीरें निकाल लें. मैं हैरान रह गया. उन दिनों पूरे देश को वीके सिंह प्रकरण मथ रहा था और इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साईटें जनरल द्वारा की गयी कथित तख्ता पलट की कोशिशों के कारण हंगामा बरपा हुआ था. और, वीके सिंह का यह करीबी आदमी, उनके पक्ष में रैलियां आयोजित करने वाला मुख्य शख्स इतनी मासूमियत से एक अपरिचित पत्रकार को अपने इमेल का पासवर्ड दे रहा है! बहरहाल, मेरी पत्रकारिक बुद्धि ने पासवर्ड मिलते ही उनका इमेल एकाउंट खंगालने के लिए उकासाया.

उस कवर स्टोरी के छपने के तुरंत बाद तंवर का फोन आया. ‘भाई साहब, आपकी पत्रिका देखकर ऐसा लगा कि आप दलितों की हिमायत करते हो. यहां हरियाणा में दलितों के साथ बड़ा जुल्म हो रहा है. पास के ही एक गांव ;भगानाद्ध मंें दबंगों ने दलितों का बहिष्कार कर दिया है. मैं इन दिनों उनकी ही लडाई लड रहा हूं. बडी कृपा होगी अगर आप यहां आकर खुद सारा हाल देखंे’. उसके बाद कुछ ही दिन बाद भागाना के दलितों के बहिष्कार की एक छोटी खबर किसी हिंदी अखबार ने नेट संस्करण पर दिखी और मैंने अपनी टीम के साथ हरियाणा जाना तय किया. हमने तय किया कि हम तंवर से सबसे अंत में मिलेंगे पहले भगाना के पीडितों से मिलेंगे उसके बाद मिर्चपुर जाएंगे. लेकिन हम एक बार फिर आश्चर्यचकित रह गये जब हमने पाया कि मिर्चपुर के दलित आज तक अपने गांव नहीं लौट सके हैं और तंवर ने पिछले दो सालों से लगभग 30 दलित परिवारों को स्थानीय जाटों व पुलिस-प्रशासन के तमाम विरोध के बावजूद अपने फार्म हाउस में पनाह दे रखी है.

किस्सा-कोताह यह कि, न सिर्फ भगाना गांव के दलितों का आंदोलन बल्कि मिर्चपुर में जिंदा जला दिये गये बाप-बेटी को न्याय की लड़ाई भी यह तंवर ही पर्दे के पीछे से लड रहे थे. इस लडाई ने दलितों के बीच एक नया युवा नेतृत्व पैदा किया था, उनमें अपने अधिकारों के लिए जागरूकता लायी थी लेकिन आर्थिक संबल तंवर का ही थे.

अब मेरे सामने सवाल था कि यह तंवर वास्तव में है कौन? जाटों से ऐसी खुली लड़ाई लेने के पीछे इसकी कैसी राजनीतिक मंशा है? वेदपाल तंवर ने अपनी जिंदगी की शुरूआत एक ट्रैक्टर ड्राइवर के रूप में की, हरियाणा के गिट्टी खदानों में वह मजदूर यूनियन का नेता बना और बाद में खदानों का ठेका लेकर खूब पैसा बनाया लेकिन हरियाणा में जाटों का वर्चस्व उन्हें खलता रहा. वर्ष 2008 में हरियणा का खरक गांव आंदोलन, जो दो राजपूत लडकों  की रहस्यमयी मौत के बाद फूट पड़ा था, में तंवर ने बढ चढ कर हिस्सा लिया. एक दिन प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोली चलाई जिसमें चार लोगों की मौत हो गयी. तंवर का कहना है कि तत्कालीन राज्य सरकार (तत्कालीन मुख्यमंत्री, भूपेंद्र सिंह हुड्डा)  के इशारे पर उनपर मुकदमा हुआ और उन्हें जेल भेज दिया गया. लगभग 9 महीने वह जेल में रहे. इसी बीच तंवर का एकलौता बेटा एक सड़क दुर्घटना में मारा गया. तंवर का विश्वास है कि उनके बेटे की दुर्घटना में मौत नहीं हुई बल्कि जाटों ने उसकी हत्या की है. इस दुर्घटना में उनके साले के बेटे की भी मौत हो गयी थी.

जेल से छूटने के बाद, बेटे की हत्या से गमजदा तंवर को हरियाणा से तडीपार घोषित कर दिया गया. एक साल तक वे हरियाणा से बाहर अपने रिश्तेदारों के यहां भटकते रहे. जब वे वर्ष 2010 में हरियाणा लौटे तो मिर्चपुर कांड हो चुका था. तंवर ने मिर्चपुर के दलितों का संबंल लेकर अपने पुत्र की हत्या का बदला लेने की ठानी. उसके बाद से हरियाणा में जाटों के विरूद्ध उनका संघर्ष शुरू हुआ, जिसकी परिणति में उनका पहले से ही बरबाद हो चुका व्यापार और भी तबाह हो गया. बचे-खुचे पैसे (जो अब भी काफी बचे हैं)  के सहारे वे दलितों की लडाई लड रहे हैं और हरियाणा में एक गैर जाटों का राजनीतिक मोर्चा बनाने की कोशिश में हैं.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना ने 29 जुलाई से अनशन शुरू किया था. यह अनशन ठीक उस जगह के बगल में हो रहा था, जहां भगाना के वहिष्कृत दलित लगभग एक पखवाड़े से धरना पर बैठे थे. अनशन के पहले ही दिन तंवर अन्ना के आंदोलन को अपना समर्थन देने हिसार से चलकर आए थे. उस दिन शाम में उनका फोन आया - ‘भाई साहब, आप मीडिया वालों को अन्ना टीम का समर्थन नहीं करना चाहिए. मैं बहुत दुःखी होकर यहां से लौट रहा हूं. अन्ना के मंच पर ;जाटद्ध ‘खाप पंचायतें’ बैठी हैं. ये सिर्फ बडे लोगों की बात करने वाले लोग हैं. यह अरविंद केजरीवाल खुद हिसार का है, लेकिन दलितों के उपर जुल्म पर ये लोग एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं हैं’. ‘खाप पंचायत’ से तंवर का आशय हरियाणा के खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों के अन्ना के मंच पर मौजूद होने से था. दरअसल, हरियाणा की कई कुख्यात खाप पंचायतों ने बकायदा बयान जारी कर अन्ना के ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ आंदोलन को अपना समर्थन दिया था.

यही तंवर, जिनकी शह पर भगाना के दलित अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड रहे हैं और जिन्होंने मिर्चपुर के दलितों के लिए न्याय की अनवरत लड़ाई लडी है, एक बार फिर पिछले 16 अगस्त से जेल में हैं. आरोप है, कि उन्होंने अपने फार्म पर रह रहे दलितों में से एक को सांप के डस लेने पर उसका अंग्रेजी ईलाज नहीं करवाया और उसे देशी दवाएं दीं, जिससे उसकी मौत हो गयी!  जाहिर है, फिजा और गीतिका शर्मा के हत्यारों को पकडने में नाकाम रही हरियाणा पुलिस की यह ‘कामयाबी’ हास्यास्पद ही है. वेदपाल तंवर की गिरफ्तारी के बाद भगाना गांव के दलितों का आंदोलन भले ही मृतप्राय हो गया है लेकिन इस प्रकरण ने स्पष्ट रूप से यह संकेत कर दिया है कि हरियाणा की दलित समस्या सिर्फ सामाजिक नहीं है, वहां दलित-दमन में प्रशासन और सरकार प्रत्यक्ष सहयोगी की भूमिका में हैं.

फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2012 अंक से साभार

Sunday, January 26, 2014

Partner, what is your politics?


Emaan mujhe roke hai, jo hai khiche mujhe kufr 
Kaba mere piche hai, Kalisa mere aage-Mirza Ghalib
(Faith holds me back, impiety lures me/Kaaba is behind me, the church is before me)

Partner, Tumhari Politics Kya Hai? (Partner, what is your politics?) was the question the great Hindi poet Muktibodh used to ask his friends when he wanted to know their ideological leanings. That was in the 1960s. Today, we want to put the same question to the Aam Aadmi Party (AAP).
AAP, which came into being about a year ago, performed unexpectedly well in the Delhi Legislative Assembly elections held in December 2013. Nearly 30 per cent of the votes fell into its kitty and it won 28 of the 70 seats up for grabs. In the 2008 polls, the Bahujan Samaj Party (BSP) had garnered 14.5 per cent votes and 2 of its candidates had won. It was hoping  to perform better this time. However, it got only 5 per cent of the votes and lost both its seats. On the other hand, AAP emerged victorious in 9 of the 12 constituencies reserved for SCs in Delhi. It is thus clear that Dalits and OBCs sided with AAP in a big way. AAP is not only admitting this but is enthused by the development. On the basis of this strength, it is planning to take a plunge into the Lok Sabha elections.
Delhi Legislative Assembly polls – Vote share
Vote percentage

While forming its government in Delhi, AAP kept social equations in mind. On 28 December 2013, six ministers were sworn in along with the chief minister Arvind Kejriwal. Of them, two – Rakhi Birla and Girish Soni – are Dalits. Somnath Bharati is an OBC from Bihar. Besides, Satyendra Jain, a minority community member, has also been made a minister. As no Muslim candidate of the party had won, AAP could not have a Muslim in the council of ministers.
Thus, AAP followed the old ritual of Indian politics – of balancing the ministry in terms of caste and community. Through its Dalit-bahujan workers, it also publicised this fact among the communities concerned.

Caste/ Varna / Community
Home state
Arvind Kejriwal
Chief Minister and Home, Finance, Power and Vigilance.
Vaishya – General
(equivalent to Agarwal)
Hisar, Haryana
Manish Sisodia
Education, Public Works Department, Urban Development.
Pilkhuwan, Uttar Pradesh
Somnath Bharati
Administrative Reforms, Law.
Vaishya – OBC
Nawada, Bihar
Satyendra Jain
Health, Industries and Gurdwara Elections
Baghpat, Uttar Pradesh
Saurabh Bhardwaj
Transport, Food Supply and Environment.
Rakhi Birla
Social Welfare and Women and Child Development.
Girish Soni
Labour, Development, Scheduled Castes and Scheduled Tribes.


AAP Dalit-bahujan mask?
But what is the reality? The Dalit-OBC ministers of AAP believe that ‘caste’ cannot be the basis of any discourse. They are not only unacquainted with the ideology and thoughts of Phule, Ambedkar and Lohia but also think that this kind of discourse is a bottleneck in the development of the country and of the so-called ‘aam aadmi’.
Twenty-six-year-old minister Rakhi Birla refuses to describe herself as a Dalit leader. Every time any question regarding caste is put to her, she becomes uneasy. This was palpable in an interview of hers, aired by NDTV, after she became minister. On a caste-related question she said, “I am proud that I am a daughter of the Valmiki community, the members of which get up at 6 in the morning and instead of cleaning their own homes, clean the homes of others ... you people should rise above this politics of caste and religion.”
Another Dalit AAP minister Girish Soni comes from a Communist background. He was associated with the Democratic Youth Federation of India. This organization has been demanding reservations for the economically weak sections of the upper castes. His own political career has been limited to the issues of power and water. Dalits figure nowhere is his social concerns.
The OBC minister of the new government Somnath Bharati comes from the Baranwal caste of the Vaishya community. His caste is listed as OBC in his home state Bihar but in Delhi and in many other states, it is included in the general category. Bharati has never had anything to do with the ideological stream of social justice. Though he is a lawyer by profession he does not express any faith in the Indian Constitution and judiciary. He prefers ‘direct action’ to solve all problems. After taking over as minister, at midnight of 16 January, he, along with his workers, kept several African men and women captive for hours on the charge that they were drug addicts and indulged in prostitution. One of them was forced to give his urine sample in public. A Patiala house court had held him guilty of tampering with evidence during his lawyer days. The truth is that he, along with other ministers and MLAs of AAP, satisfies the yearning of the Indian middle class for harum-scarum musclemen, donning the cloak of Robin Hood.
The constitution of AAP says that at least five members of  ‘deprived social groups’ like SCs, STs, OBCs and minorities would be compulsorily represented among the district, state and national level executives of the party. If any such group does not get adequate representation, the executive committee concerned will co-opt up to 5 such members. If the co-opted members are not active members, they will be treated as such. Once they are co-opted, these members will enjoy the same rights as elected members.
From the Dalit-bahujan perspective, there are other positive aspects of AAP, in so far as its documentation is concerned. The ‘sankalp patra’ (resolution document) of the party, issued during the Delhi Legislative Assembly elections has a long section on ‘Social Justice’. In this section, there are many populist assurances which fit in perfectly with the theoretical concepts of social justice. One of the assurances is that if voted to power, the government of AAP will “ensure proper implementation of the reservations for SCs, STs and OBCs in services and educational institutions under the Delhi government”. We all know that AAP was born from the womb of an NGO during the anti-corruption movement of Anna Hazare in April 2011. The movement was anti-reservation in its orientation and its leaders and supporters were of the firm view that “reservation is the biggest corruption”. At that time, the main leaders of the movement were Anna Hazare, Shanti Bhushan, Ram Jethmalani, Santosh Hegde, Kiran Bedi and Arvind Kejriwal. Of them, the former Supreme Court judge Santosh Hegde and Arvind Kejriwal were openly associated with ‘Youth For Equality’ – an organization of anti-reservation students. Hegde was infamous for giving judgments against and making unwarranted comments about reservations.
 Congress hand behind AAP?
There are reasons to believe that the Congress had sponsored the movement and hyped it up in the media to deflect attention from the proposed ‘Bring back black money’ agitation of Govindacharya and yoga guru Baba Ramdev and from the involvement of heavy-weight union ministers in various scams – and the party succeeded in this endeavour too. (See my article ‘Media aur Anna Ka Andolan’ [Media and Anna’s movement] in the collection ‘Anna Se Arvind Tak’ [From Anna to Arvind] edited by Sandeep Meel and published by Ananya Prakashan, Delhi 2013). It is another matter that the party born out of the movement proved to be the Congress’ nemesis. Anna disassociated himself from this party. 
Be that as it may, Anna’s urban middle-class movement, which sought to challenge the Indian Constitution, Parliament and the pro-social justice democratic polity, has faded away and now before us stands a gleaming new political party called AAP. It has entered the democratic political arena with a bang and is trying to find its place in parliament within the constitutional framework. This is definitely a good sign and a victory for Indian democracy. But given the social base of the party and its intent, an eagle eye needs to kept on its activities. Has it really accepted Indian democracy along with its concept of social justice? Or, has the enemy, after losing the war, infiltrated into our territory in disguise?
The claims, policies and assurances regarding social justice, made in the various documents of the party, at least so far, seem to be meant only to remain on paper. To date, the party has confined its agenda to implementing policies that would benefit the working middle class and small traders.
During the run-up to government formation in Delhi, AAP had posed 18 questions to the BJP and the Congress and had said that only if the two parties assured it of their support on these 18 issues, it would form the government. These questions related to the end of VIP culture, passage of Jan Lokpal bill, auditing of the accounts of power companies, regularization of illegal colonies, provision of basic facilities in industrial areas, opposing FDI in retail, improving the education system,, etc. No question was even remotely related to social justice. If AAP really intended to fulfil its promises regarding social justice, reservations and filling up of the backlog posts then it would have asked the BJP and the Congress that in light of the reservation backlog in government jobs in Delhi being so large, that if only backlog posts are filled, no general vacancy will be advertised for the next several years, would they support AAP in just addressing the reserved positions backlog. In his emotional maiden speech in the Vidhan Sabha, Kejriwal reiterated all the points of his party’s political agenda but nowhere did social justice figure.

            Where does AAP really stand on reservations?
On the issue of reservations, AAP seems to be wearing two masks. During the Anna movement, Arvind Kejriwal used to say that reservations should be given but not to well-off Dalits. And no one should get the benefit of reservations twice (He has been a supporter of reservations on economic basis). But after the formation of AAP, he has maintained a stoic silence on the issue, thus sending out a message to the upper castes that his party would uproot the system of reservations while at the same time assuring the communities covered by reservations that their solution to problems related to corruption, water, power and other civic amenities would benefit them too. But when the issue of reservations in promotions held centre stage in Uttar Pradesh, it became necessary for the party to take a stand on it. Breaking its silence on the issue, AAP, on 15 December, 2012, made its stand clear through its Rajput leader Manish Sisodia. In the only official statement on reservations put on the party’s website, Sisodia vehemently opposed reservations in promotions and termed it as an instrument to divide society: “It is not logical to promote a junior, ignoring his senior, on the basis of reservations. This will vitiate the atmosphere.”
On the other hand, AAP leader Yogendra Yadav, who is considered a protagonist for social justice told The Economic Times on 6 January, 2014, that “We [AAP] didn’t have clarity about it until recently. However, we are now clear about it. We will work for more reservation for disadvantaged groups.”
Two or three points are important in this respect. First, AAP chose a Rajput, Sisodia, to oppose reservations in promotions but since it did not want to antagonize the pro-reservationists, especially with the Lok Sabha elections round the corner, it propped up a ‘Yadav’ to support the measure. Secondly, this is not the official statement of the party and has not been put on its website. It is only something said in the course of conversation with a newspaper reporter. And lastly, when The Economic Times tried to seek the views of other party leaders on this issue, they remained non-committal. Those who declined comment included some who have joined AAP to “serve the nation” after quitting their lucrative jobs. They want to establish the rule of ‘meritocracy’ in India. 
News pouring in from different parts of north India indicates that the AAP is expanding at a rapid pace. People are making a beeline to join the party. Many honest Bahujan leaders in different states are also being drawn towards it. They are the people who are disgusted with the nepotism and hypocrisy of ‘their’ political parties where ‘their’ leaders have been relegated to the sidelines. If AAP has to find a place in Indian politics, it will not be able to do so without the support of Bahujans. It owes its success in Delhi to the massive support extended by these communities.
When media persons tried to corner Yogendra Yadav on the issue of him supporting reservations in promotions, he came out with several interesting pieces of information and made revealing claims on Headlines Today which need to be taken into consideration. He demolished the interviewer’s contention that AAP was a party of the middle classes. He was asked whether supporting reservations would not dent AAP’s basic constituency. He said that the party had got the maximum number of votes from slum clusters, illegal colonies and the rural areas of Delhi and that the voters of posh areas of the city had not contributed significantly to its success.  
Yogendra’s utterances reflect the ongoing tug-of-war within AAP. In fact, the political arena of north India is witnessing many a tug-of-war. The Bahujan intellectuals and social-political activists are on the horns of a dilemma. They cannot decide whether to side with ‘their’ political formations like BSP, SP, RJD, JDU, etc or to jump on the AAP bandwagon. AAP is also yet to decide the direction it wants to take. On the one hand are its mentors – the upper caste, middle-class city dwellers – who shaped it initially and who want to replace the plebeian democracy with a sanitized meritocracy, entirely free from corrupt babus. On the other hand are the Bahujan voters, who have the potential of bringing it to power but who, as a compensation for their repression for centuries, seek affirmative action for the creation of equal opportunities for them.
In the words of Ghalib, it remains to be seen whether AAP chooses ‘emaan’ (faith) or ‘kufr’ (impiety). In fact, what is to be seen is which stream they consider ‘emaan’ and which ‘kufr’.
            As of now, everyone is waiting to see on which side the camel settles down. Or whether the heavy load of expectations breaks its back the moment it leaves Delhi. 

Published  in Forward Press, February,2014.  

Pramod Ranjan is active in Hindi journalism for the last 15 years, Presently Consulting Editor of Forward Press.                       

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

-प्रमोद रंजन 

इमां मुझे रोके हैं, जो है खींचे मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे! 
- मिर्जा गालिब

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ हिंदी के महान कवि मुक्तिबोध 1960 के दशक में अपने मित्रों से यह सवाल उनकी विचारधारा के संबंध में पूछते थे। आज हम यही सवाल आम आदमी पार्टी (आप) से पूछना चाहते हैं। 
लगभग एक साल पहले बनी इस पार्टी को गत दिसंबर में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता मिली। इसकी झोली में कुल 30 फीसदी वोट गए तथा इसने दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में से 28 पर जीत हासिल की। वर्ष 2008 के दिल्‍ली विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 14.5 फीसदी वोट मिले थे और उसके दो उम्मीदवार जीते थे। बसपा को इस बार बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन उसे महज 5 फीसदी वोट मिले और अपनी 2 सीटों से भी हाथ धोना पड़ा। इसके विपरीत, आपने दिल्ली में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 12 में से 9 सीटों पर जीत हासिल की। दिल्ली में दलित और अन्य पिछडा वर्ग ने आम आदमी पार्टी का बड़े पैमाने पर साथ दिया। आपइसे न सिर्फ स्वीकार कर रही है बल्कि घोषित रूप से इससे उत्साहित है और इसी बूते लोकसभा चुनावों में उतरने की तैयारी कर रही है।

दिल्ली में सरकार बनाने में आम आदमी पार्टी ने सामाजिक समीकरणों का भी ख्याल रखा है। 28 दिसंबर, 2013 को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ छःह मंत्रियों ने शपथ ली, जिनमें से दो राखी बिरलानगिरीश सोनी दलित समुदाय के हैं। सोमनाथ भारती बिहार के ओबीसी हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के सत्येंद्र जैन को भी इनके साथ मंत्री बनाया गया। पार्टी का कोई भी मुसलमान उम्मीदवार नहीं जीता इसलिए वह मंत्रिमंडल में किसी मुसलमान को जगह नहीं दे सकती थी। 

इस प्रकार आप की सरकार ने भारतीय राजनीति में जाति, संप्रदाय के आधार पर मंत्रिमंडल गठित करने की रूढ़ि का पालन किया तथा अपने दलित-बहुजन कार्यकर्ताओं के माध्यम से इन तबकों के बीच इसका प्रचार भी किया।

लेकिन वास्तविकता क्या है? ‘आपके दलित-ओबीसी मंत्री जातिको किसी विमर्श के काबिल नहीं मानते। वे फुले-आम्बेडकर-लोहियावाद से न सिर्फ अपरिचित हैं बल्कि इस तरह के विमर्श को देश और कथित आमआदमी की बेहतरी में बाधा मानते हैं। 

26 वर्षीय मंत्री राखी बिरला खुद को दलित नेता मानने से इंकार करती हैं। वे जाति से संबंधित हर सवाल पर असहज हो जाती हैं तथा उससे बचने की हरसंभव कोशिश करती हैं। जाति विमर्श पर उनकी समझ का एक नमूना मंत्री बनने के बाद एनडीटीवी द्वारा लिए गए उनके एक इंटरव्यू में दिखा। इसमें जाति के सवाल पर राखी ने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं वाल्मीकि समाज की बेटी हूं, जिस समाज के लोग सुबह  छःह बजे उठकर अपना घर नहीं साफ करते लेकिन दूसरों के घरों की सफाई करते हैं...आप लोग इस जाति-धर्म की राजनीति से ऊपर उठिए!

आप के दूसरे दलित मंत्री गिरीश सोनी की राजनीतिक पृष्ठभूमि भारत की जनवादी नौजवान सभा’ (डीवाईएफआइ) नामक कम्युनिस्ट संगठन की रही है। यह संगठन उच्च जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिएआरक्षण की मांग करता रहा है। खुद गिरीश का राजनीतिक सफर भी बिजली-पानीआंदोलन तक सीमित रहा है। उनके सरोकारों में दलितकहीं से भी शामिल नहीं हैं। 

नई सरकार के ओबीसी मंत्री सोमनाथ भारती वैश्‍य समुदाय की बरनवाल जाति से आते हैं। यह जाति उनके गृह राज्य बिहार में ओबीसीसूची में है, जबकि दिल्ली समेत अधिकांश राज्यों में सामान्य सूचीमें है। भारती का सामाजिक न्याय की किसी भी वैचारिक धारा से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं रहा है। वे पेशे से वकील हैं लेकिन भारत के संविधान और न्यायपालिका पर वे भरोसा नहीं जतलाते। वे समस्याओं के समाधान के लिए डायरेक्ट एक्‍शनके हिमायती हैं। मंत्री बनने के बाद गत 16 जनवरी की आधी रात को उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली में  अफ़्रीकी महिलाओं-पुरुषों को कथित रूप से  ड्रग्स का उपयोग करने और वेश्‍यावृत्ति के आरोप में कई घंटों तक बंधक बनाए रखा तथा इनमें एक को सार्वजनिक रूप से मूत्र का नमूना देने के लिए विवश किया। दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें वकील के रूप में एक मुकदमे के दौरान सबूतों से छेडछाड का भी आरोपी पाया है। वास्तव में,  अन्य आप विधायकों-मंत्रियों की ही तरह वे भारतीय मध्यमवर्ग की विचारहीन और लंपट तत्वों की रॉबिन हुड नुमा छवि की चाहत को संतुष्‍ट करते हैं ।

आप के संविधान में  प्रावधान है कि पार्टी संगठन के जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक की सर्भी इकाइयों में वंचित सामाजिक समूहों,  जैसे कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकके कम से कम 5 सदस्य अनिवार्य रूप से होंगे। यदि इन समूहों में से किसी का प्रतिनिधित्व कम हो तो उन्हें उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए संबंधित कार्यकारिणी अधिकतम 5 सदस्यें तक सहयोजित (को-ऑप्ट) करेगी। यदि सहयोजित सदस्य पहले से ही पार्टी के सक्रिय सदस्य नहीं हैं, तो उन्हें पार्टी का सक्रिय सदस्य  समझा जाएगा। सहयोजन के बादए, उनके अधिकार कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्यों के समान होंगे।’ 

दलित-बहुजन कोण से देखें तो आम आदमी पार्टी की लिखत-पढतमें सकारात्मक पक्ष और भी हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान जारी संकल्प पत्रमें सामाजिक न्याय नाम से एक लंबा खंड रखा गया है। इस खंड में सामाजिक न्याय की सैद्धांतिक अवधारणाओं पर खरे उतरने वाले अनेक लोकलुभावन वादे हैं। इनमें एक प्रमुख वादा यह है कि पार्टी की सरकार बनने पर ‘दिल्ली सरकार के तहत आने वाली नौकरियों व षिक्षण संस्थाओं में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण को कायदे से लागू किया जाएगा।

हम सब यह जानते हैं कि आम आदमी पार्टीका जन्म अप्रैल, 2011 में शुरू हुए अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान एक एनजीओ के गर्भ से हुआ। उस आंदोलन का रूख स्पष्ट रूप से आरक्षण विरोधी था तथा उसके नेता और समर्थक इस मत के थे कि आरक्षण सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है। उस दौरान आंदोलन के मुख्य नेता अन्ना हजारे, शांतिभूषण, रामजेठमलानी, संतोश हेगड़े, किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल थे। इनमें से दोए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े और अरविंद केजरीवाल सीधे तौर पर आरक्षण विरोधी विद्यार्थियों के संगठन यूथ फॉर इक्वलिटी के समर्थक थे। न्यायाधीश हेगडे तो अपने कार्यकाल के दौरान आरक्षण विरोधी फैसले देने और उस पर अनावश्‍यक टिप्पणियां करने के लिए कुख्यात रहे हैं। 

‘आप’ की जन्‍मकथा

ऐसे पुख्ता संकेत हैं कि गोविंदाचार्य और योगगुरु रामदेव द्वारा प्रस्तावित काला धन वापस लाओ आंदोलनऔर केंद्र सरकार के तत्कालीन मंत्रियों के बडे घोटालों से ध्यान हटाने के लिए कांग्रेस ने एक रणनीति के तहत उस आंदोलन को प्रायोजित किया था तथा उसे मीडिया हाइपदेने की कोशिश की थी। इसमें वह सफल भी हुई (देखें, अन्ना से अरविंद तक संपादक: संदीप मील, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, २०१३ में संकलित मीडिया और अन्ना का आंदोलन शीर्षक से मेरा लेख)। बाद में, आंदोलन के गर्भ से निकली पार्टी कांग्रेस के लिए ही भस्मासुर साबित हुई । यह अनायास नहीं है कि अन्ना ने इस नयी पार्टी से खुद को अलग कर लिया।

बहरहाल, भारत के संविधान, संसद और उससे उपजे सामाजिक न्याय के हिमायती लोकतंत्र को चुनौती देने वाला शहरी मध्यमवर्गीय अन्ना आंदोलन अब पृष्ठभूमि में जा चुका है और आम आदमी पार्टी के रूप में एक नया राजनीतिक दल हमारे सामने है, जिसने भारतीय राजनीति में धमाके के साथ प्रवेश किया है और इसी संविधान और संसद के भीतर अपनी जगह तलाशने की कोशिश कर रहा है। इसे भारतीय लोकतंत्र की सर्वस्वीकार्यता की दृष्टि से एक शुभ संकेत माना जा सकता है। लेकिन इस पार्टी के मूल सामाजिक आधार और मंशा को देखते हुए इसके कार्यकलापों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है। क्या इन्होंने सचमुच भारतीय लोकतंत्र और इसकी सामाजिक न्याय की अवधारणा को स्वीकार कर लिया है ? या कहीं बाहर से वार कर हार चुका दुष्मन सिर्फ वेश बदलकर तो भीतर नहीं आ गया है?

ऊपर हमने आप द्वारा उनके विभिन्न दस्तावेजों में किए सामाजिक न्याय के संबंध में किए गए दावों, नीतियों को देखा। आपके वे दावे और नीतियां सिर्फ नयनाभिराम और कर्णप्रिय हैं। पार्टी ने अपने इन दावों को हाशिए पर रखा है तथा अपने राजनीतिक एजेंडे में सिर्फ नौकरीपेशा मध्यम वर्ग की नागरिक सुविधाओं और देशी व्यापारियों के हितों को जगह दी है। कम से कम अभी तक तो यही लगता है। दिल्ली में सरकार बनाने की कशमकश के दौरान आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा से 18 सवाल पूछे थे और कहा था अगर इन सवालों पर दोनों पार्टियां उसे समर्थन का भरोसा दें तभी वे सरकार बनाएंगे। ये सवाल वीआईपी कल्चर बंद करने, जन लोकपाल विधेयक पारित करने, बिजली कंपनियों का ऑडिट करवाने, अनाधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने, औद्योगिक क्षेत्र को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने, खुदरा बाजार में विदेशी निवेश का विरोध करने, शिक्षा व्यवस्था ठीक करने आदि के संबंध में थे। इन सवालों में सामाजिक न्याय का सवाल कहीं नहीं था। अगरआप सामाजिक न्याय, आरक्षण नियमों का पालन करने व सभी बैकलॉग नियुक्तियों को भरने सम्बन्धी अपने वायदों को पूरा करने के प्रति संकल्पबद्ध होती तो जाहिर है वह कांग्रेस और भाजपा से यह सवाल भी पूछती कि दिल्ली में सरकारी नौकरियों में आरक्षित तबकों का इतना बैकलॉग है कि अगर सिर्फ बैकलॉग पद भी भरे जाएं तो कई सालों तक सामान्यतबकों के लिए कोई  पद विज्ञापित  नहीं होगा। क्या आपलोग इस मुद्दे पर हमारा साथ देंगें?’

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में अपने पहले भाषण के दौरान भावपूर्ण वक्तव्य दिया तथा अपनी पार्टी के  सभी राजनीतिक एजेंडे एक बार फिर गिनवाए, लेकिन सामाजिक न्याय का एजेंडा उनके इस वक्तव्य में  कहीं नहीं था। 

आरक्षण के मुद्दे पर कहाँ खड़ी है 'आप

आरक्षण  के मुद्दे पर आम आदमी पार्टीएक साथ दो विपरीत  मुखौटों के साथ दिखती है। अन्ना आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल इस आशय की बात कहते नजर आते थे कि आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन संपन्न दलितों को नहीं। इसके अलावा जिसको एक बार आरक्षण का लाभ मिल जाए, उसे दुबारा न मिले (वे आर्थिक आधार पर आरक्षण के पक्षधर रहे हैं)। आम आदमी पार्टी बनाने के बाद आरक्षण जैसे संवेदनषील मुद्दे पर उन्होंने चुप्पी साधे रखी है। इस प्रकार जहां कथित ऊंची जाति के लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी पार्टी आरक्षण की व्यवस्था को चुपचाप जड़-मूल से खत्म कर देगी, वहीं आरक्षित तबकों को यह बताया कि उनकी भी मुख्य समस्या भ्रष्टाचार, पानी, बिजली और अन्य नागरिक सुविधाएं है, जिन्हें दूर करने के लिए वे कटिबद्ध हैं। 
लेकिन जब उत्तर प्रदेश में प्रोन्नति में आरक्षण के मामले ने तूल पकड़ा तो पार्टी के लिए कोई स्टैंड लेना अनिवार्य हो गया तो पार्टी ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए 15 दिसंबर, 2012 को अपने राजपूत नेता मनीष सिसोदिया को आगे किया। आरक्षण पर अब तक आप की वेबसाईट पर जारी इस एकमात्र आधिकारिक बयान में सिसोदिया ने प्रमोशन में आरक्षण का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरी में प्रमोशन में रिजर्वेशन का शगूफा समाज को बांटने की कोशिश है...किसी सीनियर को नज़रंदाज़ कर जूनियर को रिजर्वेशन के आधार पर प्रमोट किया  जानो  तार्किक नहीं है। इससे माहौल खराब होगा।’ 

इसके विपरीत, सामजिक न्याय के पक्षधर माने जाने वाले आप नेता योगेंद्र यादव ने गत 6 जनवरी, 2014 को ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ से कहा है कि ‘हाल तक हमारी (आप) इस मामले में कोई स्पष्ट राय नहीं थी। परन्तु अब हमारी राय स्पष्ट है। हम वंचित समूहों को और अधिक आरक्षण दिलाने के लिए काम करेंगें।’ योगेंद्र यादव के इस बयान के संबंध में दो-तीन बातें गौर करने लायक हैं। पहली तो यह कि प्रमोशन में आरक्षण का विरोध करने के लिए आपने राजपूत सिसोदिया को आगे किया और चूंकि लोकसभा चुनाव में जाने के लिए आरक्षण जैसे विषय पर अपना स्टैंड साफ करना आवश्‍यक हो गया तो इसका पक्ष लेने के लिए यादवयोगेंद्र सामने आए। दूसरी बात, योगेंद्र यादव का यह बयान पार्टी का आधिकारिक वक्तव्य नहीं है। इसे पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर जगह नहीं दी है। यह एक अखबार से की गई बातचीत के क्रम में कही गई बातहै। तीसरे,  जब ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ ने इस संबंध में पार्टी के अन्य लोगों से बातचीत की तो उन्होंने इस पर कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। टिप्पणी करने से इंकार करने वाले वे लोग हैं जो बड़ी-बड़ी  नौकरियां छोडकर, देशसेवा का जज्बा लिए आप में शामिल हुए हैं और भारत में मेरिटोक्रेसी स्थापित करना चाहते हैं।

उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों से मिल रही सूचनाएं बताती हैं कि आपका प्रभाव तेजी से बढ रहा है। बडी संख्या में उसके कार्यकर्ता व समर्थक बन रहे हैं। विभिन्न राज्यों में अनेक ईमानदार बहुजन नेता भी उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। ये वे लोग हैं, जो अपने राजनतेओं और राजनीतिक पार्टियों के पाखंड और भाई-भतीजावाद से त्रस्त होकर राजनीतिक हाशिये पर पडे थे। आपको अगर भारतीय राजनीति में जगह बनानी है तो यह बिना बहुजन तबकों के सहयोग के न हो सकेगा। दिल्ली में उनकी जीत की वजह भी इसी तबके से मिला व्यापक समर्थन रहा है। आरक्षण का समर्थन करने पर जब योगेंद्र यादव को मीडिया ने घेरने की कोशिश की तो उन्होने हेडलाइंस टुडेपर कुछ रोचक दावे किए और कई अनूठी जानकारियां दीं, जिन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। एक तो उन्होंने साक्षात्कारकर्ता के इस दावे का पुरजोर खंडन किया कि आपमध्यमवर्ग की पार्टी है। साक्षात्कारकर्ता ने जब उनसे पूछा कि क्या आरक्षण जैसी व्यवस्था का समर्थन करने से आपके परंपरागत समर्थक नाराज नहीं होंगे, तो योगेंद्र ने बताया कि पार्टी को स्लम कॉलोनियों, अनाधिकृत कॉलोनियों तथा दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों से सबसे अधिक वोट मिले हैं, जबकि पॉशइलाकों से बहुत कम वोट मिले हैं।

योगेंद्र का यह बयान पार्टी के भीतर और बाहर चल रही रस्साकशी को बयान करता है। वास्तव में, इन दिनों उत्तर भारत के राजनीतिक आकाश में कई किस्म की रस्साकशी चल रही है। एक ओर बहुजन तबकों के बौद्धिक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता आपऔर अपनीविभिन्न राजनीतिक पार्टियों, बसपा, सपा, राजद, जदयू, लोजपा आदि के नेतृत्व की तुलना करते हुए खुद को असमंजस में पा रहे हैं। दूसरी ओर, खुद आम आदमी पार्टी भी यह तय नहीं कर पाई है कि वह किस ओर जाए। एक तरफ आरंभिक तौर पर उसे पार्टी के रूप में स्थापित करने वाले मेंटर और उच्चवर्णीय कार्यकर्ता हैं, जो मौजूदा धूल-धुसरित लोकतंत्र की जगह, सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार से मुक्त साफ-सुथरी मेरिटोक्रेसी चाहते हैं, तो दूसरी तरफ, उनके लिए सत्ता की सीढी बन सकने वाले बहुजन वोटर हैं, जो सदियों से उनके साथ हुए अन्याय के मुआवजे के तौर पर अफिरर्मेटिव एक्‍शन पर आधारित समान अवसर वाली व्यवस्था के हिमायती हैं। 
महान उर्दू शायर गालिब के शब्दां में कहें तो देखना यह है कि वे इमां और कुफ्र में किसे चुनते हैं? वास्तव में देखना तो यह भी है कि अंततः वे किस धारा को अपना इमां मानते हैं और किसे कुफ्र?  सब इंतजार में हैं कि ऊंट किस करवट बैठेगा? किसी करवट बैठेगा भी या खुद पर लाद ली गयी असंख्य उम्मीदों की भार से दिल्ली से बाहर निकलते ही दम तोड़ देगा

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2014 अंक में प्रकाशित)

प्रमोद रंजन फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं।