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Sunday, May 05, 2013

किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन?


- प्रेमकुमार मणि 
क्ति के विविध रूपों, यथा योग्यता, बल, पराक्रम, सामर्थ्‍य व ऊर्जा की पूजा सभ्यता के आदिकालों से होती रही है। न केवल भारत में बल्कि दुनिया के तमाम इलाकों में। दुनिया की पूरी मिथॉलॉजी के प्रतीक देवी-देवताओं के तानों-बानों से ही बुनी गयी है। आज भी शक्ति का महत्व निर्विवाद है। अमेरिका की दादागीरी पूरी दुनिया में चल रही है, तो इसलिए कि उसके पास सबसे अधिक सामरिक शक्ति और संपदा है। जिसके पास एटम बम नहीं हैं, उसकी बात कोई नहीं सुनता, उसकी आवाज का कोई मूल्य नहीं है। गीता उसकी सुनी जाती है, जिसके हाथ में सुदर्शन हो। उसी की धौंस का मतलब है और उसी की विनम्रता का भी। कवि दिनकर ने लिखा है: ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।’
दंतहीन और विषहीन सांप सभ्यता का स्वांग भी नहीं कर सकता। उसकी विनम्रता, उसका क्षमाभाव अर्थहीन हैं। बुद्ध ने कहा है – जो कमजोर है, वह ठीक रास्ते पर नहीं चल सकता। उनकी अहिसंक सभ्यता में भी फुफकारने की छूट मिली हुई थी। जातक में एक कथा में एक उत्पाती सांप के बुद्धानुयायी हो जाने की चर्चा है। बुद्ध का अनुयायी हो जाने पर उसने लोगों को काटना-डंसना छोड़ दिया। लोगों को जब यह पता चल गया कि इसने काटना-डंसना छोड़ दिया है, तो उसे ईंट-पत्थरों से मारने लगे। इस पर भी उसने कुछ नहीं किया। ऐसे लहू-लुहान घायल अनुयायी से बुद्ध जब फिर मिले तो द्रवित हो गये और कहा ‘मैंने काटने के लिए मना किया था मित्र, फुफकारने के लिए नहीं। तुम्हारी फुफकार से ही लोग भाग जाते।’
भारत में भी शक्ति की आराधना का पुराना इतिहास रहा है। लेकिन यह इतिहास बहुत सरल नहीं है। अनेक जटिलताएं और उलझाव हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता के समय शक्ति का जो प्रतीक था, वही आर्यों के आने के बाद नहीं रहा। पूर्व वैदिक काल, प्राक् वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में शक्ति के केंद्र अथवा प्रतीक बदलते रहे। आर्य सभ्यता का जैसे-जैसे प्रभाव बढ़ा, उसके विविध रूप हमारे सामने आये। इसीलिए आज का हिंदू यदि शक्ति के प्रतीक रूप में दुर्गा या किसी देवी को आदि और अंतिम मानकर चलता है, तब वह बचपना करता है। सिंधु घाटी की जो अनार्य अथवा द्रविड़ सभ्यता थी, उसमें प्रकृति और पुरुष शक्ति के समन्वित प्रतीक माने जाते थे। शांति का जमाना था। मार्क्‍सवादियों की भाषा में आदिम साम्यवादी समाज के ठीक बाद का समय। सभ्यता का इतना विकास तो हो ही गया था कि पकी ईंटों के घरों में लोग रहने लगे थे और स्नानागार से लेकर बाजार तक बन गये थे। तांबई रंग और अपेक्षाकृत छोटी नासिका वाले इन द्रविड़ों का नेता ही शिव रहा होगा। अल्हड़ अलमस्त किस्म का नायक। इन द्रविड़ों की सभ्यता में शक्ति की पूजा का कोई माहौल नहीं था। यों भी उन्नत सभ्यताओं में शक्ति पूजा की चीज नहीं होती।
शक्ति पूजा का माहौल बना आर्यों के आगमन के बाद। सिंधु सभ्यता के शांत-सभ्य गौ-पालक (ध्यान दीजिए शिव की सवारी बैल और बैल की जननी गाय) द्रविड़ों को अपेक्षाकृत बर्बर अश्वारोही आर्यों ने तहस-नहस कर दिया और पीछे धकेल दिया। द्रविड़ आसानी से पीछे नहीं आये होंगे। भारतीय मिथकों मे जो देवासुर संग्राम है, वह इन द्रविड़ और आर्यों का ही संग्राम है। आर्यों का नेता इंद्र था। शक्ति का प्रतीक भी इंद्र ही था। वैदिक ऋषियों ने इस देवता, इंद्र की भरपूर स्तुति की है। तब आर्यों का सबसे बड़ा देवता, सबसे बड़ा नायक इंद्र था। वह वैदिक आर्यों का हरक्युलस था। तब किसी देवी की पूजा का कोई वर्णन नहीं मिलता। आर्यों का समाज पुरुष प्रधान था। पुरुषों का वर्चस्व था। द्रविड़ जमाने में प्रकृति को जो स्थान मिला था, वह लगभग समाप्त हो गया था। आर्य मातृभूमि का नहीं, पितृभूमि का नमन करने वाले थे। आर्य प्रभुत्व वाले समाज में पुरुषों का महत्व लंबे अरसे तक बना रहा। द्रविड़ों की ओर से इंद्र को लगातार चुनौती मिलती रही।
गौ-पालक कृष्ण का इतिहास से यदि कुछ संबंध बनता है, तो लोकोक्तियों के आधार पर उसके सांवलेपन से द्रविड़ नायक ही की तस्वीर बनती है। इस कृष्ण ने भी इंद्र की पूजा का सार्वजनिक विरोध किया। उसकी जगह अपनी सत्ता स्थापित की। शिव को भी आर्य समाज ने प्रमुख तीन देवताओं में शामिल कर लिया। इंद्र की तो छुट्टी हो ही गयी। भारतीय जनसंघ की कट्टरता से भारतीय जनता पार्टी की सीमित उदारता की ओर और अंतत: एनडीए का एक ढांचा, आर्यों का समाज कुछ ऐसे ही बदला। फैलाव के लिए उदारता का वह स्वांग जरूरी होता है। पहले जार्ज और फिर शरद यादव की तरह शिव को संयोजक बनाना जरूरी था, क्योंकि इसके बिना निष्कंटक राज नहीं बनाया जा सकता था। आर्यों ने अपनी पुत्री पार्वती से शिव का विवाह कर सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की। जब दोनों पक्ष मजबूत हो तो सामंजस्य और समन्वय होता है। जब एक पक्ष कमजोर हो जाता है, तो दूसरा पक्ष संहार करता है। आर्य और द्रविड़ दोनों मजबूत स्थिति में थे। दोनों में सामंजस्य ही संभव था। शक्ति की पूजा का सवाल कहां था? शक्ति की पूजा तो संहार के बाद होती है। जो जीत जाता है वह पूज्य बन जाता है, जो हारता है वह पूजक।
हालांकि पूजा का सीमित भाव सभ्य समाजों में भी होता है, लेकिन वह नायकों की होती है, शक्तिमानों की नहीं। शक्तिमानों की पूजा कमजोर, काहिल और पराजित समाज करता है। शिव की पूजा नायक की पूजा है। शक्ति की पूजा वह नहीं है। मिथकों में जो रावण पूजा है, वह शक्ति की पूजा है। ताकत की पूजा, महाबली की वंदना।
लेकिन देवी के रूप में शक्ति की पूजा का क्या अर्थ है? अर्थ गूढ़ भी है और सामान्य भी। पूरबी समाज में मातृसत्तात्मक समाज व्यवस्था थी। पश्चिम के पितृ सत्तात्मक समाज-व्यवस्था के ठीक उलट। पूरब सांस्कृतिक रूप से बंग भूमि है, जिसका फैलाव असम तक है। यही भूमि शक्ति देवी के रूप में उपासक है। शक्ति का एक अर्थ भग अथवा योनि भी है। योनि प्रजनन शक्ति का केंद्र है। प्राचीन समाजों में भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जो यज्ञ होते थे, उसमें स्त्रियों को नग्न करके घुमाया जाता था। पूरब में स्त्री पारंपरिक रूप से शक्ति की प्रतीक मानी जाती रही है। इस परंपरा का इस्तेमाल ब्राह्मणों ने अपने लिए सांस्कृतिक रूप से किया। गैर-ब्राह्मणों को ब्राह्मण अथवा आर्य संस्कृति मे शामिल करने का सोचा-समझा अभियान था। आर्य संस्कृति का इसे पूरब में विस्तार भी कह सकते हैं। विस्तार के लिए यहां की मातृसत्तात्मक संस्कृति से समरस होना जरूरी था। सांस्कृतिक रूप से यह भी समन्वय था। पितृसत्तात्मक संस्कृति से मातृसत्तात्मक संस्कृति का समन्वय। आर्य संस्कृति को स्त्री का महत्त्व स्वीकारना पड़ा, उसकी ताकत रेखांकित करनी पड़ी। देव की जगह देवी महत्वपूर्ण हो गयी। शक्ति का यह पूर्व-रूप (पूरबी रूप) था जो आर्य संस्कृति के लिए अपूर्व (पहले न हुआ) था।
महिषासुर और दुर्गा के मिथक क्या है?
लेकिन महिषासुर और दुर्गा के मिथक हैं, वह क्या है? दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब तक हमने अभिजात ब्राह्मण नजरिये से ही इस पूरी कथा को देखा है। मुझे स्मरण है 1971 में भारत-पाक युद्ध और बंग्लादेश के निर्माण के बाद तत्कालीन जनसंघ नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अभिनव चंडी दुर्गा कहा था। तब तक कम्युनिस्ट नेता डांगे सठियाये नहीं थे। उन्होंने इसका तीखा विरोध करते हुए कहा था कि ‘अटल बिहारी नहीं जान रहे हैं कि वह क्या कह रहे हैं और श्रीमती गांधी नहीं जान रही हैं कि वह क्या सुन रही हैं। दोनों को यह जानना चाहिए कि चंडी दुर्गा दलित और पिछड़े तबकों की संहारक थी।’ डांगे के वक्तव्य के बाद इंदिरा गांधी ने संसद में ही कहा था ‘मैं केवल इंदिरा हूं और यही रहना चाहती हूं।’
महिषासुर और दुर्गा की कथा का शूद्र पाठ (और शायद शुद्ध भी) इस तरह है। महिष का मतलब भैंस होता है। महिषासुर यानी महिष का असुर। असुर मतलब सुर से अलग। सुर का मतलब देवता। देवता मतलब ब्राह्मण या सवर्ण। सुर कोई काम नहीं करते। असुर मतलब जो काम करते हों। आज के अर्थ में कर्मी। महिषासुर का अर्थ होगा भैंस पालने वाले लोग अर्थात भैंसपालक। दूध का धंधा करने वाला। ग्वाला। असुर से अहुर फिर अहीर भी बन सकता है। महिषासुर यानी भैंसपालक बंग देश के वर्चस्व प्राप्त जन रहे होंगे। नस्ल होगी द्रविड़। आर्य संस्कृति के विरोधी भी रहे होंगे। आर्यों को इन्हें पराजित करना था। इन लोगों ने दुर्गा का इस्तेमाल किया। बंग देश में वेश्याएं दुर्गा को अपने कुल का बतलाती हैं। दुर्गा की प्रतिमा बनाने में आज भी वेश्या के घर से थोड़ी मिट्टी जरूर मंगायी जाती है। भैंसपालक के नायक महिषासुर को मारने में दुर्गा को नौ रात लग गयी। जिन ब्राह्मणों ने उन्हें भेजा था, वे सांस रोक कर नौ रात तक इंतजार करते रहे। यह कठिन साधना थी। बल नहीं तो छल। छल का बल। नौवीं रात को दुर्गा को सफलता मिल गयी, उसने महिषासुर का वध कर दिया। खबर मिलते ही आर्यों (ब्राह्मणों) में उत्साह की लहर दौड़ गयी। महिषासुर के लोगों पर वह टूट पड़े और उनके मुंड (मस्तक) काटकर उन्होंने एक नयी तरह की माला बनायी। यही माला उन्होंने दुर्गा के गले में डाल दी। दुर्गा ने जो काम किया, वह तो इंद्र ने भी नहीं किया था। पार्वती ने भी शिव को पटाया भर था, संहार नहीं किया था। दुर्गा ने तो अजूबा किया था। वह सबसे महत्त्वपूर्ण थीं। सबसे अधिक धन्या शक्ति का साक्षात अवतार!
(प्रेमकुमार मणि। हिंदी के प्रतिनिधि कथाकार, चिंतक व राजनीति कर्मी। जदयू के संस्‍थापक सदस्‍यों में रहे। इन दिनों बिहार परिवर्तन मोर्चा के बैनर तले मार्क्‍सवादियों, आंबेडकरवादियों और समाजवादियों को एक राजनीति मंच पर लाने में जुटे हैं। उनसे manipk25@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

  1. उपरोक्‍त लेख  विकल्‍प के अक्‍टूबर, 2007 और फारवर्ड प्रेस के अक्‍टूबर, 2011 में   प्रकाशित हुआ था। 


क्‍या बिहार के मुखिया सांपों को दूध पिला रहे हैं?


बिहार में नीतीश सरकार द्वारा उच्च जाति आयोग के गठन के फैसले पर ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम (एआईबीएसएफ), जेएनयू ने कड़ा विरोध जताया है। संगठन ने इस संबंध में एक पुस्तिका ‘नीतीश के सवर्ण आयोग का सच’ जारी कर उत्तर भारत के छात्र संगठनों का आंदोलन के लिए आह्वान किया है।
संगठन द्वारा जारी पुस्तिका में संकलित लेख में जदयू के बागी विधान पार्षद व साहित्यकार प्रेमकुमार मणि ने बिहार सरकार को आडे़ हाथों लेते हुए कहा है कि ‘नीतीश सरकार बड़ी होशियारी से सामाजिक न्याय के आंदोलन और विचारघारा को हमेशा-हमेशा के लिए दफन करना चाहती है और बिहार में दक्षिणपंथी व दकियानूस राजनीति की स्थापना करना चाहती है’। पुस्तिका में प्रमोद रंजन व दिलीप मंडल के भी लेख संकलित हैं, जिनमें नीतीश कुमार की सामाजिक न्याय विरोधी गतिविघियों को विस्तार से बताया गया है। पुस्तिका को देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों के अलावा पिछड़े व दलित तबकों के सांसदों को पहुंचाया जा रहा है।
ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम (एआईबीएसएफ), के संयोजक अरुण कुमार, जितेंद्र कुमार यादव व अनूप पटेल ने बताया कि जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्रों का एक जत्था 23 फरवरी से 5 मार्च, 2011 तक बिहार का दौरा करेगा। इस दौरान संगठन के सदस्य विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिघियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा आयोग के गठन के विरोघ में पटना, छपरा व मुजफ्फरपुर में कॉलेजों में छात्रों की सभाएं आयोजित की जाएंगी।
उन्होंने बताया कि एआईबीएसएफ नीतीश सरकार के इस कदम की असलियत से बिहार और देश की जनता को अवगत कराएगा। संगठन का मानना है कि उच्च जाति आयोग का गठन कर बिहार की राजग सरकार ने इतिहास के चक्र को उलटने की कोशिश की है। यह राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक प्रतिक्रांति की भी शुरुआत है। इस फैसले का प्रभाव पूरे देश पर पड़ेगा तथा सामाजिक न्याय की ताकतें दिग्भ्रमित होंगी। उन्होंने कहा कि फोरम नीतीश कुमार के इस कदम का विरोघ करने के लिए हरसंभव कदम उठाएगा।

मोहल्‍ल लाइव, 22 फरवरी, 2011 

महिषासुर विवाद : जेएनयू प्रशासन झुका, मांगी लिखित माफी


नई दिल्‍ली। 5 नवंबर, 2011 : देश के जाने माने बुद्धिजीवियों और एकडमिशियनों के दबाव में जेएनयू प्रसाशन ने महिषासुर-दुर्गा विवाद में अनावश्‍यक हस्‍तेक्षप की अपनी गलती स्‍वीकार कर ली है। शनिवार को जेएनयू प्रशासन ने खुद इससे संबंधित नोटिस जेएनयू के सभी हॉस्‍टलों व स्‍टडी सेंटर में चिपकाया है। चीफ प्रोक्‍टर एचबी बोहिदार की ओर से जारी इस नोटिस में उन्‍होंने साफ शब्‍दों में कहा है एआइबीएसएफ पर इस मुददे पर अब कोई प्रोक्‍टोरियल जांच नहीं चल रही है। उन्‍होंने एक अंग्रेजी अखबार को दिये गये अपने बयान के लिए जेएनयू कम्‍यूनिटी से मांगते हुए है कि अखबार ने उनके बयान गलत ढंग से प्रकाशित किया गया था, लेकिन इससे जिन लोगों की भावनाएं आहत हुई है, उनके प्रति वे खेद प्रकट करते हैं। जेएनयू के छात्र आंदोलनों के इतिहास में प्रशासन की ओर से ऐसा माफीनाम पहली बार आया है।
गौरतलब है कि जेएनयू के छात्र संगठन 'ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंटस फोरम' (एआइबीएसएफ) ने दुर्गा पूजा के दौरान 'फारवर्ड प्रेस' में प्रकाशित लेख 'किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन?' के अंश को पोस्‍टर के रूप में कैंपस में जारी किया था। उक्‍त लेख में नये शोधों से हवाले से कहा गया था कि महिषासुर बहुजन तबके का न्‍यायप्रियऔर प्रतापी राजा था, आर्यों ने शूद्र कुल की ही कन्‍या दुर्गा के हाथों उनका छल पूर्वक वध करवाया था। एआइबीएसएफ ने बहुजन तबके के लोगों का आह्वान किया था वे महिषासुर को अपना नायक मानें न कि आर्यों (सवर्णों) का साथ देने वाली दुर्गा को। इस बात पर आखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एवीवीपी) के कार्यकर्ताओं ने एआइबीएसएफ के कार्यकर्ताओं पर हमला बोल दिया था, जिसकी रिपोर्ट वसंत कुंज थाने में की गयी थी। बाद में इस पर यूनिवर्सिटी की ओर, प्रोक्‍टेरियल जांच शुरू हुई, जिसमें उलटे एआइबीएसएफ के अध्‍यक्ष जितेंद्र कुमार यादव को ही 'धार्मिक भावनाओं को आहत' करने के आरोप में  नोटिस जारी कर दिया गया । साथ ही चीफ प्रोक्‍टर ने एक अंग्रेजी अखबार (संडे स्‍टैंडर्ड, 31 अक्‍टूबर) का दिये गये बयान में एआइबीएसएफ को जातिवादी संगठन करार देते हुए यूथ फॉर यूक्विलिटी और एबीवीपी जैसे संगठनों को क्लिन चिट दे दी। इसके बाद एआइबीएसएफ समेत सभी वाम संगठनों ने विरोध प्रदर्शन कर चीप प्रोक्‍टर से लिखित माफी मांगने की मांग की थी।
इस संबंध में आयोजित  जेएनयू प्रशासन की एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक में चीफ प्रोक्‍टर द्वारा दिये गये बयान को आपत्तिजनक पाया गया तथा उन्‍हें लिखित माफी मांगने के लिए कहा गयाविश्‍वविद्यालय प्रशासन के सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान 'फारवर्ड प्रेस', जिस द्विभाषिक पत्रिका में उक्‍त लेख छपा था, उसकी विश्‍वसनीयता पर भी विचार किया गया। बैठक में उपस्थित अधिकारियों व प्राध्‍यापकों  ने पाया कि पत्रिका का संपादकीय बोर्ड और नियमित लेखकों  में भारत के प्राय: सभी  प्रमुख बहुजन समर्थक एकडमिशयन और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल है, जिनकी सहमति से ही कोई भी सामग्री पत्रिका में प्रकाशित की जाती है। इनमें प्रमुख हैं इग्‍नू की आंबेडकर पीठ की अध्‍यक्ष गेल ऑमवेट, हैदाराबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफसर व चर्चित किताब  'मैं हिंदू क्‍यों नहीं हू?' के लेखक कांचा अयलैया, आयवन कोस्‍का, दिलीप मंडल, प्रमोद रंजन  व यूरोप में रहकर शोध कार्यों से जुडे  प्रभुगुप्‍त तारा, विशाल मंगलवादी आदि  हैं। इसके अलावा दिल्‍ली स्थित कई अन्‍य लेखकों व इतिहासकारों ने भी जेएनयू प्रशासन के इस कदम का विरोध किया था। खुद जेएनयू के कई प्रोफेसरों का मानना था कि जेएनयू वाद-विवाद और संवाद का केंद्र रहा है, जिससे नये शोधों को बढ्वा मिलता है। चीप प्रोक्‍टर का यह कदम अलोकतांत्रिक और जेएनयू की अकादमिक गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाला है।
चीफ प्रोक्‍टर के माफीनामे को जेएनयू प्रशासन द्वारा सार्वजनिक रूप से जारी किये जाने से जेएनयू के विद्याथिैयों में खुशी की लहर दौड गयी है। इस विषय पर सभी विद्यार्थी संगठनों की बैठक के बाद विजय जुलूस निकाला जाएगा। एआइबीएसएफ के अध्‍यक्ष जितेंद्र यादव, उपाध्‍यक्ष विनय कुमार, प्रवक्‍ता जिग्‍मी वांग्‍दी और आकाश टिर्की ने कहा कि संगठन हर वर्ष जेएनयू समेत अपने प्रभाव वाली सभी यूनिवर्सिटियों  25 अक्‍टूबर को महिषासुर की शहादत दिवस मानाएगा।
फोरम से प्रतिबंध हटाने की मांगएआइबीएसएफ ने मांग की है कि जेएनयू प्रशासन 'जेनयू फोरम अगेंस्‍ट वार एंड पीपुल' पर लगा प्रतिबंध भी जल्‍दी हटाये। संगठन के अध्‍यक्ष जितेंद्र कुमार यादव ने कहा कि प्रतिबंध हटाने के मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे विद्यार्थियों की लडाई में एआइबीएसएफ भी साथ है। गौरतलब है कि जेएनयू में इस फोरम द्वारा अरूंधति राय का एक कार्यक्रम करवाने के बाद से ही इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। फोरम पर राष्‍ट्र ध्‍वज का अपमान करने का आरोप है। एआइबीएएसएफ रविवार को अपनी आंतरिक बैठक आयोजित करेगा। बैठक में आगे की रणनीति पर विचार करने के साथ ही संगठन में नये सक्रिय हुए कार्यकर्ताओं को पदभार दिया जाएगा। संगठन के प्रवक्‍ता आकाश टिर्की ने बताया कि संगठन में पहले से पदभार संभाल रहे लोगों में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इस दौरान सिर्फ कुछ नये नाम जोडे जाएंगे।
http://bhadas4media.com/article-comment/303-2011-11-05-08-27-23.html

प्रमोद रंजन

प्रमोद रंजन 
15 वर्षो से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय प्रमोद रंजन विचारों की त्‍वरा और मौलिक विश्‍लेषण के लिए जाने जाते हैं। रंजन ने उत्‍त्‍र भारत के समाज, राजनीति, मीडिया के आंतरिक जनतंत्र आदि विषयों पर अपने शोधपूर्ण लेखन के माध्‍यम से हिंदी प‍त्रकारिता को समृद्ध बनाया है तथा हिंदी पत्रकारिता में हाशिए पर रहे दलित-ओबीसी मुद्दों को विमर्श के केंद्र लाने में योगदान किया है। पत्रकारिता के अलावा, हिंदी आलोचना में भी उन्‍होंने सशक्‍त हस्‍क्षेप किया है। 'बहुजन साहित्‍य'/ 'गैर द्विज साहित्‍य' की अवधारणा इन्‍हीं के आरंभिक लेखन की नींव पर खडी हुई है। जन्‍म : 22 फरवरी, 1980, पटना में। संप्रति : फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक।

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Pramod Ranjan

Pramod Ranjan

Active in Hindi journalism for the last 15 years, Pramod Ranjan is known for his simple, lucid and yet piercing language, quick thought-process and and original analyses. Shri Ranjan has enriched Hindi journalism through his well-researched writings on society, politics and internal democracy in media in North India. He has immensely contributed to bringing the discourse on Dalit-OBC issues from the margins of Hindi literature to its centre stage. He is credited with the re-interpretation of many Hindu legends from the Bahujan angle. Because of these reasons, he has gained considerable popularity among the youth, intellectuals and politicians of this class. Besides Journalism, this young critic has also dwelt in Hindi literature. His initial writings were the foundation on which the concept of Bahujan / Non-Brahmanical literature is based. Born on 22nd February 1980 in Patna. Presently Managing Editor of "Forward Press".