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Saturday, May 10, 2014

आरक्षण के बारे में अनेक भ्रांतियां हैं : प्रमोद रंजन

1. प्रमोद रंजन से प्रभात खबर की बातचीत 


क्या आरक्षण की मौजूदा प्रणाली सही है?
आरक्षण की मौजूदा प्रणाली तो सही है लेकिन समाज में इस प्रणाली के दार्शनिक आधार के बारे में बडे पैमाने पर भ्रांतियां फैली हुई हैं। सामान्‍यत: तो लोग यही समझते हैं कि आरक्षण महज एक राजनैतिक ऐजेंडा है, जिससे राजनीति दलों का हित सधता है। दूसरी भ्रांति यह है कि आरक्षण कोई बेराजगारी अथवा गरीबी उन्‍मूलन का कार्यक्रम है। वास्‍तव में आरक्षण का दर्शन प्रतिनिधित्‍व का दर्शन है और व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में समानता का दर्शन है। भारत में सभी ऊंचे ओहदों पर एक छोटा सा सामाजिक समूह काबिज रहा है। इस स्थिति को बदले बिना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता। यह लोकतंत्र के दर्शन में ही निहित है कि वह हर व्‍यक्ति को उसकी व्‍यक्तिगत गरिमा और सत्‍ता के सभी केंद्रों में विभिन्‍न सामाजिक समूहों की भागीदारी सुनिश्चित करेगा। अपनी मूल अवधारणा में आरक्षण गरीब हटाने या किसी वंचित-पिछडे सामाजिक समूह की बेरोजगारी दूर करने का माध्‍यम  नहीं है। इन कामों के लिए राज्‍य, दूसरे कार्यक्रम जो सभी जातियों के लिए उपलब्‍ध होते हैं, जैसे आजकल की मनरेगा, इंदिरा आवास योजना या उत्‍त्‍र प्रदेश की बेरोजगारी भत्‍ता योजना आदि, चलाता है। आरक्षण का एकमात्र  उद्देश्‍य है प्रतिनिधित्‍व, जिसे मौजूदा संवैधानिक प्रणाली के तहत, धीमी गति से ही सही, लेकिन पूरा किया जा रहा है। 


सामाजिक के बदले आर्थिक विसंगतियों को आरक्षण का आधार बनाना कहां तक जायज है?
भारत में सत्‍ता के केंद्रों में प्रतिनिधित्‍व का असंतुलन सामाजिक आधार पर रहा है, न कि आर्थिक आधार पर। महाभारत के एक कथा-प्रसंग को आप एक उदाहरण के रूप में ले सकते हैं। गरीब ब्राह्मण सुदामा की एक याचना उसे मालामाल कर देती है। बस उसे इसकी इच्‍छा करने भर की देर होती है लेकिन दूसरी ओर वंचित तबके का एकलव्‍य जब एक छोटी की आकांक्षा पालता है तो उसका अंगूठा काट लिया जाता है। अज्ञातकुल कर्ण भले ही आर्थिक संपन्‍नता पा लेता है लेकिन उसे ऊंचे लोगों के बीच अपने शौर्य का प्रदर्शन करने नहीं दिया जाता। उसका कवच-कुंडल छीन कर उसका सामाजिक अपमान किया जाता है। आज भी आज देखेंगे कि कथित ऊंची जातियों की गरीबी श्रम नहीं करने के कारण है और नीची जातियों में गरीबी अवसर नहीं मिलने के कारण है। पूरे देश के खेतों में बंटाइदारी पर काम कौन सा समूह करता है? खेतीहर मजदूर कौन है? जमीनों के मालिक कौन हैं? बिहार में शोषित समाज दल के नेता जगदेव प्रसाद ने नारा दिया था – अगले सावन भादो में, गोरी कलाई कादो में’। आने वाले सावन में उन्‍हें गोली मार दी गयी। वे तो सिर्फ इतना कह रहे थे कि वंचित तबकों के लोग ऊंची जातियों के खेतों में काम नहीं करेंगे और इस कारण उनके घरों की औरतों को खुद खेतों में काम करना पडेगा। उन्‍हें मार डाला गया। शारीरिक श्रम के प्रति ऐसी नफरत?
दूसरी ओर वंचित तबके लोगों को काम का अवसर नहीं मिलता। ये शारीरिक श्रम से भागने वाले लोग नहीं है, लेकिन इन्‍हें श्रम का उचित मूल्‍य नहीं मिलता। इनके पास बहुत कमी जमीनें और अन्‍य भौतिक संसाधन हैं। ऐतिहासिक रूप से शोषण का शिकार होने के कारण शिक्षा का स्‍तर बहुत नीचा है। इसी कारण से भीमराव आंबेदकर ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर किया है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करने वाले यह क्‍यों नहीं कहते कि जमीन समेत व्‍यक्तिगत मिलिकियत वाली सभी प्रकार की अतिरक्‍त संपत्ति का बिना जाति का भेदभाव देखे, गरीबों में वितरण कर दिया जाए?

   क्रिमी लेयर के साथसाथ आरक्षण का पर्याप्त लाभ ले चुकी जातियों को हटाने की मांग कितनी जायज है। 
क्रीमी लेयर की व्‍यवस्‍था अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए किये गये आरक्षण के प्रावधान में नहीं है। इसे अन्‍य पिछडा वर्ग (ओबीसी) पर अुनुचित तरीके से थोपा गया है। इस तरह की बातें एससी-एसटी के कोटे में भी क्रिमी लेयर लगाने के षडयंत्र के तहत उठायी जा रही हैं। देखिए, जो आर्थिक रूप से संपन्‍न होगा वही पढ भी पाएगा और वही लड भी पाएगा। यह जो ऊपरी तबका है उसे अनुसूचित जाति से पहले कम परेशानी थी, जैसे-जैसे वे आरक्षण के कारण ऊंचे पदों पर पहुंच रहे हैं, ऊपरी तबके की परेशानी बढती जा रही है। ओबीसी चुंकि ऊपरी तबके के ठीक नीचे था, इसलिए यही तबका उन्‍हें अपदस्‍थ कर सकता था, इसलिए इनसे उन्‍हें ज्‍यादा खतरा है। क्रीमी लेयर की बातें दरअसल इसलिए की जा रही हैं ताकि शोषित तबकों में कोई हिरावल दस्‍ता नहीं तैयार हो सके।

दूसरी बात, क्‍या सचमुच कोई ऐसी जाति है जो कथित तौर आरक्षण का ‘पर्याप्‍त’ लाभ ले चुकी है? केंद्र सरकार ने खुद बताया है कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लोग महज 9 फीसदी हैं। एससी-एसटी के पदों में भी भारी बैकलॉग है। देश की सरकारी नौकरियों में लगभग 60-70 फीसदी अपर कास्‍ट के लोग हैं, जिसमें अकेले ब्राह्मणों ने सबसे अधिक जगह घेर रखी है। तो पहले यह मांग क्‍यों न कि जाए कि आने वाले कुछ सालों तक इस जाति का सरकारी नौकरी से बाहर रखा जाए? वे कुछ सालों तक रोजी-रोजगार के दूसरे काम करें।
 
आरक्षण को लेकर समीक्षा की बात जो संविधान बनते वक्त कही गयी थी उसका पालन क्यों नहीं हो पा रहा है? 

यह भी एक भ्रांति है कि संविधान में सरकारी नौकरी में आरक्षण की व्‍यवस्‍था की समीक्षा की बात की गयी है। समीक्षा की बात राजनीतिक आरक्षण के संदर्भ की गयी है। इसे किया जाना चाहिए। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जातियों को राजनीतिक आरक्षण है। यानी उनके लिए‍ विधायिका में सीटें निर्धारित हैं। समीक्षा करके इसका दायरा महिलाओं, हिंदू पिछडों, अतिपिछडों, दलितों और महादलितों तथा पिछडे मुसलमानों व अन्‍य अल्‍पसंख्‍यक समूहों तक किया जाना चाहिए। किन्‍नरों तथा अन्‍य प्रकार के अशक्‍त समूहों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्‍व दिया जाना चाहिए।