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Sunday, April 13, 2014

बहुजन साहित्‍य के सिद्धांतकार

 मुझे लगता है क कालक्रम में गुम हो गये बहुजन दार्शनिकों की छवि को मूर्त करना एक आवश्‍यक काम है। कल मैंने इसी सिलसिले में चित्रकार डॉ. लाल रत्‍नकार से मुलाकात की तथा उनसे आग्रह किया कि वे कौत्‍स, मक्‍खली गोशाल और अजित केशकंबली के चित्र बना दें। इन दार्शनिकों की कुछ छवि तो मेरे मन में भी थी, इसके अलावा रत्‍नाकर जी की इन दार्शनिकों के प्रमुख अध्‍येताओं से फोन पर बात करवायी, ताकि इनकी छवि को वे ठीक-ठीक अपने चित्र में रख सकें। डॉ. रत्‍नाकर ने लगभग 2 घंटों में इन तीनों दार्शनिकों के चित्र बना दिये। इन चित्रों को देखकर मुझे महसूस हो रहा है कि एक बडा काम संपन्‍न हुआ है। -प्रमोद रंजन


कौत्‍स
कौत्स ( सातवीं शताब्दी ई.पू.) एक आंदोलन के नेता थे, जिसका दर्शन को भौतिक बुद्धिवाद से मिलता-जुलता है। कौत्स की चर्चा यास्क ने निरुत के प्रथम अध्याय के पंद्रहवें खंड में की है। निरुत का यह अध्याय पूरी तरह से कौत्स के विचारों पर आधारित है। वे वरतंतु के शिष्य थे। वरतंतु बुनकर (तंतुवाय) परिवार से आते थे जबकि कौत्स का परिवार किसान परिवार किसान (आज ओबीसी की कृषक जातियों के समकक्ष) था। कौत्स वेद विरोधी थे। वे सिर्फ वेदों की मान्यिता का ही विरोध नहीं करते थे, बल्कि यह भी कहते थे कि वैदिक मंत्र अर्थहीन हैं। यह दुर्भाग्यस की बात है कि कौत्सव का पूरा साहित्यक आज उपलब्धस नहीं है। बावजूद इसके उनका लिखा हुआ जो भी साहित्यर मिलता है, उससे पता चलता है कि कौत्सक बहुजन साहित्य के प्रथम मौलिक सिद्धांतकार थे। कालक्रम के अनुसार बुद्ध का स्थान उनके बाद आता है। बुद्ध और कबीर से लेकर आधुनिक काल में फुले और अर्जक संघ तक के जो वेद विरोधी सिद्धांत हैं, उसकी बुनियाद कौत्य ने ही डाली थी।

मक्खली गोशाल
मक्खली गोशाल जाति से कुम्हाकर थे। उन्हों ने आजीवक संप्रदाय का पुनरूद्धार किया था। सम्राट अशोक ने अपने अभिलेख में इस संप्रदाय की चर्चा की है। इतिहास की पुस्तकों में यह भ्रमवश कहा गया है कि उनकी शिक्षा का मूल आधार अक्रियावाद या नियतिवाद था। इतिहासकारों को यह भ्रम उनके बारे में पाणिनी और पतंजलि के द्वारा उल्लिखित मस्कारी नामक दार्शनिक के साथ घालमेल करने के कारण हुआ है। वास्तकव में चार्वाक दर्शन के अनुयायी ‘आजीवक’ कहलाते हैं। आजीवकों की मान्यता रही है कि आत्मा जैसी कोई चीज नहीं है और जो कुछ है, वह शरीर ही है, जो कृषि, पशुपालन और वाणिज्य जैसे क्रियाकलापों का मुख्य आधार है। इस तरह हम पाते हैं मक्खली गोशाल बहुजन अवधारणा के एक महत्वयपूर्ण सिद्धांतकार माने जाते हैं।

अजित केशकंबली
बुद्ध के समकालीन अजित केशकंबली जाति के पशुचारक थे। वे उम्र में बुद्ध से बडे थे और इनका चिंतन लोकायत परंपरा को पुष्टन करता है। ये स्वार्ग-नरक, ईश्व र, आत्मात जैसी ब्राह्मणवादी बातों पर विश्वास नहीं रखते थे। ये मानते थे कि पृथ्वीष, जल, अग्नि, तथा वायु से शरीर निर्मित है। मृत्यु के उपरांत ये सभी तत्व अपने संबंधित स्रोतों में विलीन हो जाते हैं। जब शरीर का अंत होता है तो मुर्ख और बुद्धिमान दोनों एक ही प्रकार से खत्म हो जाते हैं। अजित केशकंबली के सिद्धांतों को बहुजनों के बहुचर्चित सांस्कृतिक आंदोलन ‘अर्जक संघ’ ने भी अंगीकार किया है।