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Friday, February 14, 2014

एक और मिथक को भेदकर निकला सच

- सुरेश पंडित

मिथक रचना और उन्हें धर्म के साँचे में ढालकर अतिमानवीय स्थिति तक पहुंचाना तथा उनसे जुड़ी घटनाओं को पराभौतिक गतिविधियों के रूप में पेश करना संभवत: प्रत्येक धर्माधिकारी, पंडों, पुरोहितों की मजबूरी रहा है क्योंकि इसी विधि से वे सामान्य जन के विवेक को अपनी गिरफ्त में रखते हुए अपने व्यावसायिक हित साधते रह सकते हैं। उनके  आस्तित्त्व पर सवाल उठाना तथा उनके क्रियाकलाप की आलोचना करना व्यक्ति को धर्मद्रोही बना सकता है। यही वह डर है जो अनादिकाल से धर्म के हर अविश्वसनीय पहलू को यथावत् बनाये रखने में सफल हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि संख्या या मात्रा में चाहे जितना कम हो इस तरह के पाखंडी कर्मकांडों के विरुद्ध विवेक शील लोगों की आवाजें भी समय समय पर उठती रही हैं और उन्हें जन समर्थन भी मिलता रहा है। ज्योति राव फुले, पेरियार और अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के अनेकों मिथकों को बेदर्दी से चीर फाडक़र उनमें अन्तर्निहित सचाइयों को बेनकाब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उसी परम्परा में प्रेम कुमार मणि और राजेन्द्र यादव का नाम भी रखा जा सकता है। यादव तो बार बार यह कहते रहे हैं कि हिन्दू धर्म का सबसे अधिक नुकसान गंगा और रामायण ने किया है। सारी दुनिया की गन्दगी अपने में समेटकर बहती गंगा आज भी परम पवित्र, पतित पावनी बनी हुई है और पाप के पंक में डूबे लोगों को साफ, शुद्ध कर उन्हें मृत्यु उपरान्त मोक्ष दिलाने की गारंटी भी दे रही है। इसी तरह उस  रामायण की सर्वश्रेष्ठता भी अक्षुण्ण बनी हुई है जिसके द्वारा रची गई धर्मसत्ता व राजसत्ता के आदर्श और मर्यादा की मानसिकता सदा प्रश्नों, शंकाओं से घिरी रही है। हिन्दी के प्रमुख विचारक प्रेमकुमार मणि ने महिषासुर मर्दिनी दुर्गा की सचाई की खोज करते हुए लगभग एक दशक पहले जो लेख लिखा था वह पहले पटना के दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ में फिर ‘जन विकल्प’ में और उसके बाद अक्टूबर 2011 में ‘फारवर्ड प्रेस’ मासिक में छपा था। उसी लेख पर कुछ बुद्धिजीवियों और जे एन यू के छात्रों की नजर पड़ी और उन्होंने इसका एक पोस्टर यूनिवर्सिटी में लगाया। उसमें दुर्गा को महिषासुर पर किये गये अत्याचार और नृशंस हत्या का अपराधी घोषित किया गया था। इस पर सवर्ण छात्रों की हिंसक प्रतिक्रिया हुई। लेकिन महिषासुर के पक्ष में खड़ा किया गया वह आन्दोलन अभी थमा नहीं है। उसी के बारे में विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित नौ लेेखों का संग्रह ‘महिषासुर: एक पुनर्पाठ’ नामक पुस्तक के रूप में प्रमोद रंजन ने संपादित किया है

इस पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि आखिर महिषासुर नाम से शुरू किया गया यह आन्दोलन है क्या? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके निहितार्थ क्या हैं और हम इस आन्दोलन को किस नजरिये से देखें? संपादक का मानना है कि इस आन्दोलन की महत्ता इसी में है कि यह हिन्दू धर्म की जीवन-शक्ति पर गहरी चोट करने की क्षमता रखता है। जैसे जैसे यह प्रभावी व व्यापक होता जायेगा हिन्दू धर्म द्वारा उत्पीडि़त अन्य हाशियागत सामाजिक समूह भी धर्म ग्रन्थों के पाठों का विखंडन शुरू करेंगे और अपने पाठ निर्मित करेंगे। इन पाठों के स्वर जितने तीव्र और उग्र होंगे बहुजनों की सांस्कृतिक गुलामी के बंधन उतनी ही शीघ्रता से टूटेंगे।

इस आन्दोलन के बीज प्रेम कुमार मणि के अनुसार देवासुर संग्राम में देखे जा सकते हैं। वह दरअसल द्रविड़ और आर्यों का ही संग्राम था। आर्यों का नेता इन्द्र था जो उस समय शक्ति का केन्द्र माना जाता था। आर्यों का समाज पुरुष प्रधान था इसीलिये वे मातृभूमि की जगह पितृभूमि का नमन करते थे। उन्होंने अपने समाज के विस्तार के लिये पूरब अर्थात् बंगाल और असम से अपना तालमेल बढ़ाया। वह समाज मातृ सत्तात्मक था इसलिये आर्यों ने शक्ति के रूप में दुर्गा को भी अपनी देवी मान लिया। आज भी उत्तर भारत के अधिकतर हिन्दू जिन राम, कृष्ण, शिव, हनुमान आदि देवताओं की पूजा करते हैं वे पौरुष के प्रतीक हैं। लेकिन देवी के रूप में दुर्गा काली भी अब उन्हें मान्य हो गई है। दुर्गा को स्री शक्ति का प्रतीक बनाने के लिये ही महिषासुर की कल्पना की गई और उसे इस रूप में चित्रित किया गया जिससे वह समाज का शत्रु दिखाई दे और देवी दुर्गा उसका संहार कर धर्मानुयायियों के लिये पूज्य बन जाये। लेकिन मणि के अनुसार इस कथा का शुद्ध पाठ कुछ और तरह का है-महिष अर्थात् भैंस, महिषासुर अर्थात् महिष का असुर। असुर का मतलब जो सुर नहीं है। सुर का अर्थ देवता अर्थात् वे लोग जो कोई काम नहीं करते। परजीवी होते हैं। इसके अनुसार असुर वे हुए जो काम करके पेट भरते हैं। इस तरह महिषासुर का अर्थ होता है भैंस को पालकर धन्धा करने वाले=ग्वाले=अहीर। ये भैंस पालक अहीर बंगदेश में वर्चस्व प्राप्त लोग थे और द्रविड़ थे इसलिये आर्य संस्कृति के विरोधी थे। आर्यों ने इन्हें पराजित करने के लिये दुर्गा का अनुसंधान किया। बंगदेश में वेश्यायें दुर्गा को अपने कुल का मानती थी इसीलिये आज भी दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिये वेश्याओं के घर से थोड़ी सी मिट्टी जरूर लाई/मंगाई जाती है। भैंस पालकों के नायक या सामन्त की हत्या करने में दुर्गा को नौ दिन लगे। इसी की याद में नवरात्र मनाये जाते हैं। इस तरह एक पशुपालक समुदाय के नायक का वध करने वाली दुर्गा को शक्ति की देवी की प्रतिष्ठा मिली है। यह कैसा संयोग है कि विजयादशमी का पर्व दुर्गा को महिषासुर से हुए युद्ध में मिली विजय की स्मृति में तो मनाया जाता ही है राम के रावण पर विजय पाने की याद में भी मनाया जाता है।

लेखक और नाटककार अश्विनी कुमार पंकज तो यह सगर्व घोषणा करते हैं कि वे महाप्रतापी महिषासुर के वंशज हैं इसलिये विजयादशमी या दशहरा उनके लिये खुशियां मनाने का दिन नहीं है। वे कहते हैं कि सदियों से असुरों का वध किये जाते रहने के बावजूद आज भी झारखण्ड और छत्तीसगढ के कुछ इलाकों में असुरों का अस्तित्त्व बना हुआ है। लेकिन वे असुर किसी भी कोण से देखने पर राक्षस जैसे दिखाई नहीं देते। भारत सरकार ने इन्हें आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा है। अभी तक वे विकास के हाशिये पर हैं। 1981 की जनगणना के अनुसार उनकी कुल जनसंख्या 9100 थी जो वर्ष 2003 में घटकर 7793 रह गई जबकि आज की तारीख में छत्तीसगढ़ में उनकी कुल संख्या 301 मात्र है। कारपोरेट निगम जिस धरती पर ये असुर विचरते हैं उसके नीचे से बॉक्साइट निकालने को उतावले हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के निवासी अगरियां जाति के लोगों को भी को भी वैरियर आल्विन ने असुरों की श्रेणी में दिखाया है। जलपाईगुड़ी जिले के अलीपुर द्वार स्टेशन के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाले दहारू असुर कहते हैं कि महिषासुर दोनों लोकों अर्थात् स्वर्ग और पृथ्वी पर सबसे अधिक शक्तिशाली थे। देवताओं को लगता था कि जब तक ये जीवित रहेंगे उनको महत्त्व नहीं मिलेगा। इसीलिये उन्होंने दुर्गा के नेतृत्त्व में महिषासुर को ही नहीं उनके सहचरों को भी मार डाला और उनके गले काटकर एक मुंडमाला बनाई और दुर्गा को पहना दी। चित्रों में दुर्गा को महिषासुर की छाती पर चढ़े रौद्र रूप में ही दिखलाया जाता है।

अधिकतर आदिवासी रावण को भी अपना पूर्वज मानते हैं। दक्षिण के अनेक द्रविड़ समुदायों में रावण का पूजन आज भी किया जाता है। झारखण्ड और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में तो बाकायदा नवरात्र अर्थात् दशहरे पर रावणोत्सव मनाया जाता है। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन आज भी रावण को अपना कुल गुरू मानते हैं।

‘इन्डिया टुडे’ हिन्दी के संपादक दिलीप मंडल  इसी प्रसंग में यह सवाल उठाते हैं कि क्या धार्मिक ग्रन्थों की वैकल्पिक व्याख्या नहीं की जा सकती? सचाई यह है कि इसी पद्धति से उनमें वर्णित चरित्रों और घटनाओं के नये नये पहलू सामने आ सकते हैं और इससे वैज्ञानिक चिन्तन को बढ़ावा मिल सकता है। प्राचीन काल में शास्त्रों की व्याख्याओं को लेकर जो शास्त्रार्थ होते थे उन्होंने ही हिन्दू धर्म के अनेकों मतों, पन्थों, समुदायों और विचार परम्पराओं को जन्म दिया था। लेकिन जैसे जैसे समाज ज्ञान और विज्ञान से अधिक समृद्ध होता गया है लोगों की मानसिकता संकीर्ण होती गई है। उन्हें जो पाठ जिस तरह समझाया गया है वे उसी रूप में उसे अपनाना चाहते हैं। न स्वयं कोई नवीन चिन्तन करते हैं तथा न दूसरों के नये विचारों को अपनाने के लिये अपने मस्तिष्क के खिडक़ी दरवाजे खोलते हैं। वास्तव में पुनर्पाठ की प्रक्रिया तो लोकतांत्रिक विचार पद्धति को जीवन्त रखती है और उसे समृद्ध बनाती है। वे इस प्रसंग में फुले की कालजयी कृति ‘गुलाम गीरी’ और अम्बेडकर की ‘रिडल्ज आफ हिन्दूइज्म’ के उदाहरण सामने रखते है। फुले के अनुसार हिन्दुओं के धर्म ग्रन्थ ब्राह्मण पुरोहितों ने अपने हितों के संरक्षण के लिये निर्मित किये हैं और उन पर नई व्याख्याओं का इसलिये वे विरोध करते हैं ताकि समाज पर उनकी पकड़ बदस्तूर बनी रहें।

जे एन यू में आल इन्डिया बैकवर्ड स्टूडेन्ट्स फोरम द्वारा वर्ष 2011 में महिषासुर शहादत दिवस मनाने से देशभर में  एक नई बहस शुरू हुई। पूरी निर्भीकता के साथ अब यह प्रश्न किया जाने लगा है कि यदि दुर्गा इतनी बलशालिनी थी तो उसने गोरी, गजनी, बाबर, हिटलर जैसे लोगों का वध क्यों नहीं किया? जिस महिषासुर को एक ऐसे नृशंस राक्षस के रूप में चित्रित किया गया है जो लोगों को भयभीत व आतंकित करने वाला था वह वास्तव में इसी देश का सामान्य नागरिक था जो स्वभाव से हिंसा विरोधी और प्रकृति पूजक था। उसे असुर बताकर मारा गया। जबकि स्वयं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कष्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र ने जनवरी 2011 में अपने एक निर्णय मे कहा था- ‘राक्षस और असुर कहे जाने वाले लोग ही इस देश के मूल नागरिक हैं।’ अन्य विद्वानों का भी मत है कि असुर आर्यों से श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे सुरा-शराब का सेवन नहीं करते। ब्राह्मणवादी ग्रन्थों के अनुसार यज्ञ विरोधी महिषासुर के पिता रंभासुर असुरों के राजा थे तथा उनकी माँ का नाम श्यामला राजकुमारी था। इस देश के मूल निवासी जिन्हें आर्यों ने साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी की सभ्यता को नष्ट कर हजारों वर्ष चले युद्ध में छल, कपट से परास्त कर असुर, अछूत, शुद्र, राक्षस आदि बनाकर समााजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर एवं गुलाम बना लिया था उनके नायकों की हत्या कर उन्हें असुर व राक्षस घोषित कर दिया गया। कहा जाता है कि महिषासुर इतना पराक्रमी राजा था कि उसने देवताओं के राजा इन्द्र को भी युद्ध में परास्त कर दिया था, ऐसे राजा का वध करवाने के लिये देवताओं ने दुर्गा को भेज कर इस काम को सम्पन्न करवाया था। उधर लेखक जितेन्द्र यादव का कहना है कि पिछड़ी जाति बहुल उनके गांव में महिषासुर जैसी कद-काठी के तो कई व्यक्ति आज भी देखने को मिल जाते हैं पर दुर्गा जैसी कोई महिला कभी दिखाई नहीं दी है। ये जितेन्द्र यादव वही महानुभाव हैं जिन्हें जे एन यू के प्रशासन ने ‘महिषासुर का सच’ पर विमर्श के लिये परिसर में गोष्ठी आयोजित करने और पोस्टर लगा कर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में नोटिस थमाया था और बाद में देशभर के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बढ़ते विरोध प्रदर्शन के कारण क्षमा याचना करते हुए वह नोटिस वापिस ले लिया था। 2011 से यह आन्दोलन चालू है और सन् 2013 में देश के लगभग 60 नगरों में इसका आयोजन हुआ है जो इसको मान्यता मिलते जाने का प्रमाण है।

दरअसल इतिहास का कथ्य किसी ऐसे सत्य को प्रकट नहीं करता जिस पर पुनर्विचार किया ही नहीं जा सकता। हर पीढी अपने अर्जित ज्ञान और संचित अनुभवों के आधार पर अपना इतिहास निर्मित करती है। इस प्रक्रिया में अक्सर पूर्व में प्रतिष्ठित नायक खलनायक बन जाते हैं और खलनायक सम्मान के पात्र। जिन असुरों व राक्षसों को मानवता के शत्रु के रूप में निन्दनीय बनाया जाता है वे देश के मूल निवासी के रूप में सामने आते हैं और अपनी पहचान स्थापित करने के लिये अपनी गाथा स्वयं लिखने को तत्पर हो जाते हैं। महिषासुर की एक अमर शहीद के रूप में प्रतिष्ठा आदिवासी संस्कृति के पुनरोदय का परिचायक है। हो सकता है प्रचलित इतिहास के उत्खनन से ऐसे और महानायक सामने आयें जो मनुवादी पूर्वाग्रहों के शिकार हुए हों इसलिये उन्हें अब तक ध्यान देने योग्य समझा ही नहीं गया हो।

संपर्क : सुरेश पंडित 383 स्कीम नं. 2, लाजपत नगर, अलवर - 301001, मो. 8058725639

पुस्तक का नाम :  महिषासुर : एक पुनर्पाठ,
संपादक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : आल इन्डिया बैकवर्ड स्टूडेन्ट्स फोरम, जे एन यू, नई दिल्ली
मूल्य :  30 रुपये

Wednesday, January 22, 2014

Mahishasur : The need for reinterpretation



A booklet ‘Kiski Puja Kar Rahe Hain Bahujan? Mahishasur: Ek Punarpath’ (Whom are the Bahujans worshipping? Mahishahur: a reinterpretation), published by Baliraja Cultural Movement, is before me. In about two hours, I am done with the around 40 pages of the booklet, but it has already altered many of my established notions. Edited by Pramod Ranjan, advisory editor of FORWARD Press, the booklet was released on 17 October, 2013, at a function organized by Backward Students Forum to observe Mahishasur martyrdom day at Delhi’s prestigious Jawaharlal Nehru University. The booklet contains articles by seven prominent writers, journalists and researchers including Prem Kumar Mani, Ashwini Kumar Pankaj and Dileep Mandal, managing editor of Hindi India Today. Most of these articles were published in the FORWARD Press magazine. In fact, it was the articles published in the magazine that brought this discourse into public domain in the Hindi belt.
After I read this booklet, in the evening, the TV channels carried the stomach-churning details of how North Korean dictator Kim Jong-un served his uncle and his six aides to 120 wild dogs, who were starved for three days. In about an hour, the dogs devoured the men. Nothing was left.  From balconies around the huge cage, the viewers of the horrendous scene, including Kim Jong-un, clapped. Similar was the scene of the US hanging Saddam Hussein. These victors declared that the  persons killed were barbarians, cruel, and inhuman. This was the victor’s justice for the vanquished.
This was exactly how Mahishasur was treated. Over the centuries, his image has been grossly distorted so as to justify the killing of the great king. The Aryans (Surs who drank liquor and sacrificed their cattle in the name of yagnas and consumed the meat) declared themselves gods and branded the original inhabitants of Bang Pradesh Asurs (demons). Mahishasur was the powerful and justice-loving ruler of these Asurs (Non-Aryans). The Aryans were notorious for looting the forests, subterranean wealth and flora and fauna of the non-Aryans and of sacrificing their milch cows in Havans. To put a stop to this depredation, Mahishasur and his non-Aryan subjects fought with and defeated Indra’s Aryan army so many times that its backbone was broken. An exasperated Indra, then, sought Vishnu’s intervention, who entrusted the enticing Durga with the responsibility of killing Mahishasur.
These victors have prescribed animal sacrifice as part of the rituals to worship Durga. They argue that the sacrificial animal is meant for the tiger, which Durga rides on. They call themselves as vegetarians so as to reserve the right to malign the Asurs by branding them meat-eaters.
To a great extent, this booklet presents the reinterpretation of the legend of Mahishasur and Durga but there is a need for a deeper and more extensive research on this issue, which will reveal some hidden truths – truths that will be impossible for the ‘Arya Putras’ (Descendants of Aryans) of today to deny.
Meanwhile, I have bought a book called ‘Durga Saptashati’ from a shop selling religious literature. It is published by Randhir Book Sales, Haridwar. Though the book tells the tale from the perspective of the Surs yet, it reveals the character of the Surs and the deceit employed to kill Mahishasur. “In ancient times, the war between Gods-Goddesses and demons raged for a full hundred years. At that time, the master of the demons was Mahishasur while the king of the Gods was Indra. In this war, the army of the Gods lost to the demons and Mahishasur, by defeating all Gods, became Indra. In the end, all the Gods, led by Brahmaji, reached the place where Vishnu and Shankar were seated. There the Gods related the tale of the depredations of Mahishasur and their own downfall. They said that Mahishasur had deprived Surya, Agni, Yam, Varun and all other Gods of their powers and he had become their master. He had driven the Gods out of heaven. Mahishasur is an evil soul. The Gods have been forced to dwell on earth like mortals. Do something to get Mahishasur killed. When Madhusudan (Vishnu) and Mahadev ji heard all this, they became furious”. Then they sent Durga to kill Mahishasur. During the battle between the two “Devi ji, using her arrows, blew up the mountains hurled at her by Mahishasur to smithereens. Then Chandikaji whose eyes were reddish due to consumption of liquor, said in a spluttering voice, ‘Oh fool. Till I drink Madhu, you can roar for a while. After I have killed you in the battleground, it is the Gods who will roar”. Despite this threat, the demon did not give up the battle. “Then Deviji severed his head with her sharp sword. His head fell on the ground. The Gods were overjoyed. They  offered prayers along with celestial Maharishis. Gandharvas began singing and Apsaras began dancing”. Be that as it may, the Devi’s ‘Surapan’ (drinking of liquor) in itself gives rise to many speculations.
The story has many subtexts, which cannot be dealt with in a small piece; these need extensive research. The hidden meanings and the asides in the story can be construed as a comment on the current Indian politics as well. If Indra was the prime minister then who were Vishnu, Shiva, etc before whom Gandharvas sang and Apsaras danced? Can it be linked with the state of Backwards, Dalits, women and the deprived in today’s India? Can it be linked with how tribals are being driven out from their lands and their forests in the name of Naxalism? What all a reinterpretation and study of this story will reveal can well be imagined. Now, the Aryans coming from the West do not even need armies. Their capital is enough to drive out the non-Aryans and the rulers of our country are already the slaves of that capital.
As for now, I wish any Backward-Dalit scholar comes forward to launch an extensive research by placing the tragedy of tribals, especially Asur tribe, as described in Ranendra’s much-talked-about novel ‘Global Gaon Ke Devta’ (Gods of Global Village), in the context of this story. Mahishasur has thrown down the gauntlet.        

           
Editor :  Pramod Ranjan

Publisher :  Baliraja Cultural movement, P-22, South Ex-2, New Delhi – 110049
                        Tel: 011-26250778

Price :   Rs 30

 
( Book review published in Forward Press, February, 2014)

Tuesday, April 09, 2013

In Office

Pramod Ranjan in Forward Press office
Pramod Ranjan :  Forward Press office.