Monday, May 12, 2014

भगाना की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर अब भी आपकी राह देख रही हैं !

हरियाणा की जाट राजनीति का डर   

साथियों , भगाना की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर अब भी आपकी  राह देख रही हैं !

-प्रमोद रंजन 

जानते हैं पिछले 14 अप्रैल से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना पर बैठे भगाना के लगभग 100 गरीब दलित परिवारों की महिलाओं, पुरुषों, बच्चों के साथ दिल्ली पहुंचने के पीछे क्या मनोविज्ञान रहा होगा ? उन्हें लगता है कि यहां का मीडिया उनका दर्द सुनेगा और उन्हें न्याय दिलवाएगा। उन्होंने निर्भया कांड के बारे में सुन रखा है। उन्हें लगा कि उनकी बच्चियों को भी दिल्ली पहुंचे बिना न्याय नहीं मिलेगा। यही कारण था कि वे अपनी किशोरावस्था को पार कर रही गैंग-रेप पीड़ित चारों लड़कियों को साथ लेकर आए। अन्यथा, चेहरा ढंककर घर से बाहर निकलने वाली इन महिलाओं को अपनी बेटियों की नुमाइश के कारण भारी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है।

जानता हूं, ऊंची जातियों के परिवारों में पैदा हुए मेरे पत्रकार साथी एक बार फिर कहेंगे कि हमने तो उनकी खबर नहीं रोकी। इस आंदोलन में जितनी भीड़ थी, उसके अनुपात में उन्हें जगह तो दी ही। लेकिन साथी! क्या आपका दायित्व इतना भर ही है ? क्या किसी खबर को कितना स्थान मिले, यह सिर्फ भीड़ और बिकने की क्षमता पर निर्भर होना चाहिए ? क्या मीडिया का समाज के वंचित तबकों के प्रति कोई अतिरिक्त नैतिक दायित्व नहीं बनता ? क्या अपनी छाती पर हाथ रखकर आप बताएंगे कि अन्ना आंदोलन के पहले ही दिन जो विराट देशव्यापी कवरेज आपने उसे दिया था, उस दिन कितने लोग वहां मौजूद थे ? क्या निर्भया की याद में कैंडिल जलाने वालों की संख्या कभी भी भगाना के आंदोलनकारियों से ज्यादा थी ?  वर्ष 2012 में  इसी जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के आंदोलन के बगल में ही भगाना से बहिष्कृत ये दलित-पिछड़े भी सैकड़ों की संख्या में धरना पर बैठे थे। लेकिन मीडिया ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि अगर उस समय इन्हें मीडिया की पर्याप्त तवज्जो? मिली होती तो कम से कम बलात्कार की यह घटना तो नहीं ही होती।

जब भगाना के आंदोलनकारियों को धरने पर बैठे चार दिन हो गए और आपने कोई कवरेज नहीं दी तो उन्हें लगा कि शायद निर्भया को न्याय जेएनयू के छात्र-छात्राओं के आंदोलन की वजह से मिला। वे 19 अप्रैल को जेएनयू पहुंचे और वहां के छात्र-छात्राओं से इस आंदोलन को अपने हाथ में लेने के लिए गिड़गिड़ाए। 22 अप्रैल को जेएनयू छात्र संघ (जेएनएसयू) ने अपने पारंपरिक तरीके के साथ जंतर-मंतर और हरियाणा भवन पर जोरदार प्रदर्शन किया। लेकिन क्या हुआ ? कहां  थे आजतक, एबीपी न्यूज और एनडीटीवी ? सबको सूचना दी गई, लेकिन पहुंचे सिर्फ हरियाणा के स्थानीय चैनल और उन्होंने भी आंदोलन के बहिष्कार की घोषणा कर आंदोलनकारियों के मनोबल को तोड़ा ही। उसी शाम, बहिष्कार करने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों के दफ्तर से आंदोलनकारियों को फोन आया कि वे आंदोलन का बहिष्कार नहीं कर रहे। खबर दिखाएंगे। संभवत: उनका ऐसा फैसला मीडिया संस्थानों में खूब पढे जाने वाले भड़ास फॉर मीडिया व अन्य सोशल साइट्स पर बहिष्कार की खबर प्रसारित होने के कारण हुआ।

साथी, चुनाव का मौसम है। हरियाणा में कांग्रेस की सरकार है। भगाना के चमार और कुम्हार जाति के लोग पिछले दो सालों से जाटों द्वारा किए गए सामाजिक बहिष्कार के कारण अपने गांव से बाहर रहने को मजबूर हैं। धानुक जाति के लोगों ने बहिष्कार के बावजूद गांव नहीं छोड़ा। ये चार बच्चियां, जिनमें दो तो सगी बहनें हैं, इन्हीं धानुक परिवारों की हैं, जिन्हें एक साथ उठा लिया गया तथा दो दिन तक लगभग एक दर्जन लोग इनके साथ गैंग-रेप करते रहे। यह सामाजिक बहिष्कार को नहीं मानने की खौफनाक सजा थी। 23 मार्च को हुए इस गैंग-रेप की एफआईआर, धारा 164 का बयान, मेडिकल रिपोर्ट आदि सब मौजूद है। ऐसे में, क्या यह आपका दायित्व नहीं था कि आप कांग्रेस के बड़े नेताओं से यह पूछते कि आपके राज में दलित-पिछड़ों के साथ यह क्या हो रहा है ? किस दम पर आप दलित-पिछड़ों का वोट मांग रहे हैं ? आप मोदी के पिछड़ावाद की लहर पर सवार भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की बाइट लेते कि पिछले चार-पांच सालों से हरियाणा से दलित और पिछड़ी लड़कियों के रेप की खबरें लगातार आ रही हैं लेकिन इसके बावजूद आपकी राजनीति सिर्फ जाटों के तुष्टिकरण पर ही क्यों टिकी हुई है ? आप अरविंद केजरीवाल से पूछते कि भाई, अब तो बताओ कौन है आपकी नजर में आम आदमी ? अरविंद केजरीवाल तो उसी हिसार जिले के हैं, भगाणा और मिर्चपुर गांव हैं। लेकिन क्या आपने कभी आम आदमी पार्टी को हरियाणा के दलितों के लिए आवाज उठाते देखा। जबकि उनके हरियाणा के मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार योगेंद्र यादव यह कहते नहीं थकते कि दिल्ली में उन्हीं सीटों पर उनकी पार्टी को सबसे अधिक वोट मिले जहां गरीबों, दलितों और पिछड़ों की आबादी थी। आप क्यों नहीं उनसे पूछते कि दलित-पिछड़ों के वोटों का क्या यही इनाम आप उन्हें दे रहे हैं ? बात-बात पर आंदोलन करने वाला दिल्ली आप का कोई भी विधायक जंतर-मंतर क्यों नहीं जा रहा ? क्यों आपके समाजवादी प्रोफेसर आनंद कुमार ने जेएनयू में 19 अप्रैल को इन लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए बुलाई गई सभा में शिरकत नहीं की, जबकि उन्हें बुलाया गया था और वे वहीं थे।
साथी, अब भी समय है। भगाना की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर आपकी राह देख रही हैं।

फारवर्ड प्रेस के जून, 2014 अंक में भी प्रकाशित 

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