Friday, April 15, 2016

Monday, May 12, 2014

भगाना की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर अब भी आपकी राह देख रही हैं !

हरियाणा की जाट राजनीति का डर   

साथियों , भगाना की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर अब भी आपकी  राह देख रही हैं !

-प्रमोद रंजन 

जानते हैं पिछले 14 अप्रैल से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना पर बैठे भगाना के लगभग 100 गरीब दलित परिवारों की महिलाओं, पुरुषों, बच्चों के साथ दिल्ली पहुंचने के पीछे क्या मनोविज्ञान रहा होगा ? उन्हें लगता है कि यहां का मीडिया उनका दर्द सुनेगा और उन्हें न्याय दिलवाएगा। उन्होंने निर्भया कांड के बारे में सुन रखा है। उन्हें लगा कि उनकी बच्चियों को भी दिल्ली पहुंचे बिना न्याय नहीं मिलेगा। यही कारण था कि वे अपनी किशोरावस्था को पार कर रही गैंग-रेप पीड़ित चारों लड़कियों को साथ लेकर आए। अन्यथा, चेहरा ढंककर घर से बाहर निकलने वाली इन महिलाओं को अपनी बेटियों की नुमाइश के कारण भारी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है।

जानता हूं, ऊंची जातियों के परिवारों में पैदा हुए मेरे पत्रकार साथी एक बार फिर कहेंगे कि हमने तो उनकी खबर नहीं रोकी। इस आंदोलन में जितनी भीड़ थी, उसके अनुपात में उन्हें जगह तो दी ही। लेकिन साथी! क्या आपका दायित्व इतना भर ही है ? क्या किसी खबर को कितना स्थान मिले, यह सिर्फ भीड़ और बिकने की क्षमता पर निर्भर होना चाहिए ? क्या मीडिया का समाज के वंचित तबकों के प्रति कोई अतिरिक्त नैतिक दायित्व नहीं बनता ? क्या अपनी छाती पर हाथ रखकर आप बताएंगे कि अन्ना आंदोलन के पहले ही दिन जो विराट देशव्यापी कवरेज आपने उसे दिया था, उस दिन कितने लोग वहां मौजूद थे ? क्या निर्भया की याद में कैंडिल जलाने वालों की संख्या कभी भी भगाना के आंदोलनकारियों से ज्यादा थी ?  वर्ष 2012 में  इसी जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के आंदोलन के बगल में ही भगाना से बहिष्कृत ये दलित-पिछड़े भी सैकड़ों की संख्या में धरना पर बैठे थे। लेकिन मीडिया ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि अगर उस समय इन्हें मीडिया की पर्याप्त तवज्जो? मिली होती तो कम से कम बलात्कार की यह घटना तो नहीं ही होती।

जब भगाना के आंदोलनकारियों को धरने पर बैठे चार दिन हो गए और आपने कोई कवरेज नहीं दी तो उन्हें लगा कि शायद निर्भया को न्याय जेएनयू के छात्र-छात्राओं के आंदोलन की वजह से मिला। वे 19 अप्रैल को जेएनयू पहुंचे और वहां के छात्र-छात्राओं से इस आंदोलन को अपने हाथ में लेने के लिए गिड़गिड़ाए। 22 अप्रैल को जेएनयू छात्र संघ (जेएनएसयू) ने अपने पारंपरिक तरीके के साथ जंतर-मंतर और हरियाणा भवन पर जोरदार प्रदर्शन किया। लेकिन क्या हुआ ? कहां  थे आजतक, एबीपी न्यूज और एनडीटीवी ? सबको सूचना दी गई, लेकिन पहुंचे सिर्फ हरियाणा के स्थानीय चैनल और उन्होंने भी आंदोलन के बहिष्कार की घोषणा कर आंदोलनकारियों के मनोबल को तोड़ा ही। उसी शाम, बहिष्कार करने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों के दफ्तर से आंदोलनकारियों को फोन आया कि वे आंदोलन का बहिष्कार नहीं कर रहे। खबर दिखाएंगे। संभवत: उनका ऐसा फैसला मीडिया संस्थानों में खूब पढे जाने वाले भड़ास फॉर मीडिया व अन्य सोशल साइट्स पर बहिष्कार की खबर प्रसारित होने के कारण हुआ।

साथी, चुनाव का मौसम है। हरियाणा में कांग्रेस की सरकार है। भगाना के चमार और कुम्हार जाति के लोग पिछले दो सालों से जाटों द्वारा किए गए सामाजिक बहिष्कार के कारण अपने गांव से बाहर रहने को मजबूर हैं। धानुक जाति के लोगों ने बहिष्कार के बावजूद गांव नहीं छोड़ा। ये चार बच्चियां, जिनमें दो तो सगी बहनें हैं, इन्हीं धानुक परिवारों की हैं, जिन्हें एक साथ उठा लिया गया तथा दो दिन तक लगभग एक दर्जन लोग इनके साथ गैंग-रेप करते रहे। यह सामाजिक बहिष्कार को नहीं मानने की खौफनाक सजा थी। 23 मार्च को हुए इस गैंग-रेप की एफआईआर, धारा 164 का बयान, मेडिकल रिपोर्ट आदि सब मौजूद है। ऐसे में, क्या यह आपका दायित्व नहीं था कि आप कांग्रेस के बड़े नेताओं से यह पूछते कि आपके राज में दलित-पिछड़ों के साथ यह क्या हो रहा है ? किस दम पर आप दलित-पिछड़ों का वोट मांग रहे हैं ? आप मोदी के पिछड़ावाद की लहर पर सवार भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की बाइट लेते कि पिछले चार-पांच सालों से हरियाणा से दलित और पिछड़ी लड़कियों के रेप की खबरें लगातार आ रही हैं लेकिन इसके बावजूद आपकी राजनीति सिर्फ जाटों के तुष्टिकरण पर ही क्यों टिकी हुई है ? आप अरविंद केजरीवाल से पूछते कि भाई, अब तो बताओ कौन है आपकी नजर में आम आदमी ? अरविंद केजरीवाल तो उसी हिसार जिले के हैं, भगाणा और मिर्चपुर गांव हैं। लेकिन क्या आपने कभी आम आदमी पार्टी को हरियाणा के दलितों के लिए आवाज उठाते देखा। जबकि उनके हरियाणा के मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार योगेंद्र यादव यह कहते नहीं थकते कि दिल्ली में उन्हीं सीटों पर उनकी पार्टी को सबसे अधिक वोट मिले जहां गरीबों, दलितों और पिछड़ों की आबादी थी। आप क्यों नहीं उनसे पूछते कि दलित-पिछड़ों के वोटों का क्या यही इनाम आप उन्हें दे रहे हैं ? बात-बात पर आंदोलन करने वाला दिल्ली आप का कोई भी विधायक जंतर-मंतर क्यों नहीं जा रहा ? क्यों आपके समाजवादी प्रोफेसर आनंद कुमार ने जेएनयू में 19 अप्रैल को इन लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए बुलाई गई सभा में शिरकत नहीं की, जबकि उन्हें बुलाया गया था और वे वहीं थे।
साथी, अब भी समय है। भगाना की दलित बच्चियां जंतर-मंतर पर आपकी राह देख रही हैं।

फारवर्ड प्रेस के जून, 2014 अंक में भी प्रकाशित 

Sunday, May 11, 2014

Friends, Dalit daughters of Bhagana are still waiting to be heard at Jantar-Mantar



Afraid of Haryana’s Jat politics?
Friends, Dalit daughters of Bhagana are still waiting to be heard at Jantar-Mantar

 -PRAMOD RANJAN
The men, women and children of 100-odd poor, Dalit families of Bhagana have staged a sit-in at Delhi’s Jantar-Mantar since 14 April. Can you guess what must have prompted them to travel all the way to Delhi? They thought that the media of the national capital would lend its ears to their pain, secure justice for them. They had heard about the Nirbhaya incident. They thought that they would not get justice till they reach Delhi. That is why they also brought their four teenage daughters, who were victims of gang- rape, with them. Just spare a thought for the women of their families – the mental trauma they must be going through, as the girls are not allowed to leave their homes without covering their faces. And here, they are sitting in public, as if they are part of an exhibition!
I know, my journalist friends born in upper-caste families would insist that they never ignored the sit-in. The protestors were given coverage in proportion to their numbers. But my friend, does your responsibility end here? Should only the size of the crowd and its saleability be the determinants of the space a news story will get in the media? Does the media not have an additional moral responsibility towards the deprived sections of society? Can you put your hand on your heart and say that on the first day of Anna agitation, the number of people present at the venue qualified it for the massive nationwide coverage it got? Was the number of those who lit candles in memory of Nirbhaya more than the number of Bhagana protestors? In 2012, at the same Jantar-Mantar, just next to the Anna Hazare protestors, sat hundreds of Dalit-OBCs who were victims of social boycott in their villages. But the media took no notice of them. Needless to say, had the media given them adequate coverage then, these gang rapes would not have happened.
When the Bhagana protestors did not get any coverage for four days, they thought that maybe, Nirbhaya got justice because of the protest by JNU students. They reached the JNU campus on 19 April and begged the students to take up their cause. On 22 April, JNU Students’ Union (JNUSU) held a big demonstration at Jantar-Mantar and in front of the Haryana Bhawan. But what happened? Aaj Tak, ABP News and NDTV were nowhere to be seen. All were informed but only the representatives of local TV channels of Haryana turned up and they only broke the morale of the protestors by announcing their boycott of the sit-in! The same evening, they telephoned the demonstrators to tell them that they were not boycotting the demonstration and that visuals of the demonstration would be aired. That probably was a face-saving move because the news of the boycott had been posted on the widely read Bhadas for media and other websites.
Friends, this is the season of elections. Haryana is being ruled by a Congress government. Socially boycotted by the Jats, the Chamars and Kumhars of Bhagana have been forced to live outside their villages for more than two years. The members of the Dhanuk caste did not leave their villages despite the boycott. The four girls, two of whom are sisters, are from Dhanuk families. After being abducted together on 23 March, for two days, a dozen men gang-raped them. This was the horrific punishment for not complying with the diktat for boycott. FIRs were lodged, statements under section 164 of the CrPC recorded, medical examination done. Everything is on record. In this situation, was it not your duty to ask top Congress leaders how the Dalit-OBCs were being treated under the party’s rule? Should you not have asked them on what basis are they seeking the votes of the Dalits and OBCs? Shouldn’t you not have asked the BJP leaders, tom-tomming Modi’s OBC credentials, why they have been ignoring the series of incidents of rapes of Dalit and OBC girls in Haryana for the past four-five years and why their politics is still centred on the appeasement of Jats?
Bhai, at least now you can tell us who is the aam aadmi?” – you could have well asked Arvind Kerjriwal. Incidentally, Kejriwal hails from Hisar district and both Bhagana and Mirchpur are in Hisar. Have you ever seen AAP raising any issue related to the Dalits of Haryana? And, mind you, Yogendra Yadav, AAP’s probable chief ministerial candidate for Haryana, has been repeating ad nauseum that in Delhi, the party got the highest number of votes from areas where the poor, the Dalits and the OBCs reside in sizeable numbers. Why don’t you ask him if this was how AAP was rewarding the Dalit-OBCs for voting for the party? Why hasn’t a single MLA from AAP, which usually launches agitations at the drop of a hat, cared to visit Jantar-Mantar? Why did AAP’s socialist professor, Anand Kumar, not attend the meeting convened at JNU on 19 April to get justice for these girls, even though he was invited and was on campus at the time?
Friends, there is still time. Bhagana’s Dalit daughters are still waiting to be heard by you at Jantar-Mantar.

MEDIA ANALYSIS, Forward Press, JUNE 2014

Saturday, May 10, 2014

आरक्षण के बारे में अनेक भ्रांतियां हैं : प्रमोद रंजन

1. प्रमोद रंजन से प्रभात खबर की बातचीत 


क्या आरक्षण की मौजूदा प्रणाली सही है?
आरक्षण की मौजूदा प्रणाली तो सही है लेकिन समाज में इस प्रणाली के दार्शनिक आधार के बारे में बडे पैमाने पर भ्रांतियां फैली हुई हैं। सामान्‍यत: तो लोग यही समझते हैं कि आरक्षण महज एक राजनैतिक ऐजेंडा है, जिससे राजनीति दलों का हित सधता है। दूसरी भ्रांति यह है कि आरक्षण कोई बेराजगारी अथवा गरीबी उन्‍मूलन का कार्यक्रम है। वास्‍तव में आरक्षण का दर्शन प्रतिनिधित्‍व का दर्शन है और व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य में समानता का दर्शन है। भारत में सभी ऊंचे ओहदों पर एक छोटा सा सामाजिक समूह काबिज रहा है। इस स्थिति को बदले बिना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता। यह लोकतंत्र के दर्शन में ही निहित है कि वह हर व्‍यक्ति को उसकी व्‍यक्तिगत गरिमा और सत्‍ता के सभी केंद्रों में विभिन्‍न सामाजिक समूहों की भागीदारी सुनिश्चित करेगा। अपनी मूल अवधारणा में आरक्षण गरीब हटाने या किसी वंचित-पिछडे सामाजिक समूह की बेरोजगारी दूर करने का माध्‍यम  नहीं है। इन कामों के लिए राज्‍य, दूसरे कार्यक्रम जो सभी जातियों के लिए उपलब्‍ध होते हैं, जैसे आजकल की मनरेगा, इंदिरा आवास योजना या उत्‍त्‍र प्रदेश की बेरोजगारी भत्‍ता योजना आदि, चलाता है। आरक्षण का एकमात्र  उद्देश्‍य है प्रतिनिधित्‍व, जिसे मौजूदा संवैधानिक प्रणाली के तहत, धीमी गति से ही सही, लेकिन पूरा किया जा रहा है। 


सामाजिक के बदले आर्थिक विसंगतियों को आरक्षण का आधार बनाना कहां तक जायज है?
भारत में सत्‍ता के केंद्रों में प्रतिनिधित्‍व का असंतुलन सामाजिक आधार पर रहा है, न कि आर्थिक आधार पर। महाभारत के एक कथा-प्रसंग को आप एक उदाहरण के रूप में ले सकते हैं। गरीब ब्राह्मण सुदामा की एक याचना उसे मालामाल कर देती है। बस उसे इसकी इच्‍छा करने भर की देर होती है लेकिन दूसरी ओर वंचित तबके का एकलव्‍य जब एक छोटी की आकांक्षा पालता है तो उसका अंगूठा काट लिया जाता है। अज्ञातकुल कर्ण भले ही आर्थिक संपन्‍नता पा लेता है लेकिन उसे ऊंचे लोगों के बीच अपने शौर्य का प्रदर्शन करने नहीं दिया जाता। उसका कवच-कुंडल छीन कर उसका सामाजिक अपमान किया जाता है। आज भी आज देखेंगे कि कथित ऊंची जातियों की गरीबी श्रम नहीं करने के कारण है और नीची जातियों में गरीबी अवसर नहीं मिलने के कारण है। पूरे देश के खेतों में बंटाइदारी पर काम कौन सा समूह करता है? खेतीहर मजदूर कौन है? जमीनों के मालिक कौन हैं? बिहार में शोषित समाज दल के नेता जगदेव प्रसाद ने नारा दिया था – अगले सावन भादो में, गोरी कलाई कादो में’। आने वाले सावन में उन्‍हें गोली मार दी गयी। वे तो सिर्फ इतना कह रहे थे कि वंचित तबकों के लोग ऊंची जातियों के खेतों में काम नहीं करेंगे और इस कारण उनके घरों की औरतों को खुद खेतों में काम करना पडेगा। उन्‍हें मार डाला गया। शारीरिक श्रम के प्रति ऐसी नफरत?
दूसरी ओर वंचित तबके लोगों को काम का अवसर नहीं मिलता। ये शारीरिक श्रम से भागने वाले लोग नहीं है, लेकिन इन्‍हें श्रम का उचित मूल्‍य नहीं मिलता। इनके पास बहुत कमी जमीनें और अन्‍य भौतिक संसाधन हैं। ऐतिहासिक रूप से शोषण का शिकार होने के कारण शिक्षा का स्‍तर बहुत नीचा है। इसी कारण से भीमराव आंबेदकर ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर किया है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करने वाले यह क्‍यों नहीं कहते कि जमीन समेत व्‍यक्तिगत मिलिकियत वाली सभी प्रकार की अतिरक्‍त संपत्ति का बिना जाति का भेदभाव देखे, गरीबों में वितरण कर दिया जाए?

   क्रिमी लेयर के साथसाथ आरक्षण का पर्याप्त लाभ ले चुकी जातियों को हटाने की मांग कितनी जायज है। 
क्रीमी लेयर की व्‍यवस्‍था अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए किये गये आरक्षण के प्रावधान में नहीं है। इसे अन्‍य पिछडा वर्ग (ओबीसी) पर अुनुचित तरीके से थोपा गया है। इस तरह की बातें एससी-एसटी के कोटे में भी क्रिमी लेयर लगाने के षडयंत्र के तहत उठायी जा रही हैं। देखिए, जो आर्थिक रूप से संपन्‍न होगा वही पढ भी पाएगा और वही लड भी पाएगा। यह जो ऊपरी तबका है उसे अनुसूचित जाति से पहले कम परेशानी थी, जैसे-जैसे वे आरक्षण के कारण ऊंचे पदों पर पहुंच रहे हैं, ऊपरी तबके की परेशानी बढती जा रही है। ओबीसी चुंकि ऊपरी तबके के ठीक नीचे था, इसलिए यही तबका उन्‍हें अपदस्‍थ कर सकता था, इसलिए इनसे उन्‍हें ज्‍यादा खतरा है। क्रीमी लेयर की बातें दरअसल इसलिए की जा रही हैं ताकि शोषित तबकों में कोई हिरावल दस्‍ता नहीं तैयार हो सके।

दूसरी बात, क्‍या सचमुच कोई ऐसी जाति है जो कथित तौर आरक्षण का ‘पर्याप्‍त’ लाभ ले चुकी है? केंद्र सरकार ने खुद बताया है कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लोग महज 9 फीसदी हैं। एससी-एसटी के पदों में भी भारी बैकलॉग है। देश की सरकारी नौकरियों में लगभग 60-70 फीसदी अपर कास्‍ट के लोग हैं, जिसमें अकेले ब्राह्मणों ने सबसे अधिक जगह घेर रखी है। तो पहले यह मांग क्‍यों न कि जाए कि आने वाले कुछ सालों तक इस जाति का सरकारी नौकरी से बाहर रखा जाए? वे कुछ सालों तक रोजी-रोजगार के दूसरे काम करें।
 
आरक्षण को लेकर समीक्षा की बात जो संविधान बनते वक्त कही गयी थी उसका पालन क्यों नहीं हो पा रहा है? 

यह भी एक भ्रांति है कि संविधान में सरकारी नौकरी में आरक्षण की व्‍यवस्‍था की समीक्षा की बात की गयी है। समीक्षा की बात राजनीतिक आरक्षण के संदर्भ की गयी है। इसे किया जाना चाहिए। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जातियों को राजनीतिक आरक्षण है। यानी उनके लिए‍ विधायिका में सीटें निर्धारित हैं। समीक्षा करके इसका दायरा महिलाओं, हिंदू पिछडों, अतिपिछडों, दलितों और महादलितों तथा पिछडे मुसलमानों व अन्‍य अल्‍पसंख्‍यक समूहों तक किया जाना चाहिए। किन्‍नरों तथा अन्‍य प्रकार के अशक्‍त समूहों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्‍व दिया जाना चाहिए।